मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ | मृच्छकटिकम्
संवाहकः—कुदो मे पिदा ? (कुतो मे पिता ?)
माथुरः—मादरं विक्किणिअ पअच्छ । ( मातरं विक्रीय प्रयच्छ । )
संवाहकः—कुदो मे मादा ? ( कुतो मे माता ? )
माथुरः—अप्पाणं विक्किणिअ पअच्छ । ( आत्मानं विक्रीय प्रयच्छ । )
संवाहकः—कलेध पशादं, णेध मं लाजमग्गं । ( कुरुत प्रसादम् । नयत मां राजमार्गम् । )
माथुरः—पसरु । ( प्रसर )
संवाहकः—एव्वं भोदु । ( परिक्रामति ) अज्जा विक्किणिध मं इमश्श शहिशअश्श हत्यादो दशोहि शुवण्णकेहिं । (दृष्ट्वा आकाशे) कि भणाध ! 'किं कलइश्शि' त्ति । गेहे दे कम्मकले हुविशं । कथं अदइअ पडिवअणं गदे । भोदु, एव्वं इमं अण्णं भणइश्शं । ( पुनस्तदेव पठति ) कथं एशे वि मं अवधीलिअ गदे । हा ! अज्जचारुदत्तश्श विभवे विहडिदे एशे वड्ढामि मंदभाए । ( एवं भवतु । आर्य्याः! क्रीणीध्वं माम् अस्य सभिकस्य हस्तात् दशभिः सुवर्णैः । किं भणथ ? किं करिष्यसि ? इति । गेहे ते कर्मकरो भविष्यामि ।
कस्मिन् हेतौ वा, अबलम् = दुर्बलम्, धूर्तयामि = धूर्तताम् आचरामि = करोमि, प्रयच्छ=देहि ।
**विमर्श—गण्ड—**आजकल के 'वादा' के अर्थ में प्रयुक्त होता था । एक निश्चित समय पर देने की प्रतिज्ञा । साम्प्रतं गमिष्यामि — संवाहक अपनी चतुरता प्रकट करता है क्योंकि जो दश सुवर्ण उधार थे उनमें से पाँच माथुर से छुड़वा लिये और पाँच द्यूतकर से । इस प्रकार अब एक भी देय नहीं है । अतः संवाहक कहता है कि अब जा सकता हूँ । **धूर्तयामि—**आत्मानं धूर्तं करोमि इस अर्थ में 'तत्करोति तदाचष्टे' वार्तिक से धूर्त शब्द से णिच् होकर नामधातु प्रयोग है ।
**अर्थ—संवाहक—**मेरे बाप कहाँ है ।
**माथुर—**अपनी माँ को बेच दो ।
**संवाहक—**मेरी माँ कहाँ है ?
**माथुर—**तो अपने को बेच कर दो ।
**संवाहक—**मुझ पर (यह) कृपा करिये । मुझे राजपथ पर ले चलिये ।
**माथुर—**चलो ।
**संवाहक—**ऐसा हो अर्थात् चलिये । ( घूमता है ) सज्जनों ! इस प्रधान जुआरी के हाथों से मुझे दश सुवर्णों में खरीद लीजिये । ( ऊपर आकाश की ओर देखकर ) 'क्या कह रहे हो' 'क्या काम कर सकते हो ?' मैं आपके घर काम करने वाला नौकर बन सकता हूँ । कैसे, बिना उत्तर दिये हीं चला गया । ( कोई