मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽङ्कः १४५
संवाहकः—( प्रकाशम् ) अज्ज ! अद्धे तुए मुक्के ? ( आर्य ! अर्द्धं त्वया मुक्तम् ? )
माथुरः—मुक्के । ( मुक्तम् । )
संवाहकः—(द्यूतकरं प्रति) अद्धे तुए वि मुक्के ? । (अर्द्धं त्वयापि मुक्तम् ? )
द्यूतकरः—मुक्के । ( मुक्तम् । )
संवाहकः—संपदं गमिश्शं । ( साम्प्रतं गमिष्यामि । )
माथुरः—पअच्छ तं दशसुवण्णं, कहिं गच्छसि ? ( प्रयच्छ तत् दश-सुवर्णम्, कस्मिन् गच्छसि ? )
संवाहकः—पेक्खध पेक्खध भट्टालआ ! हा संपदं ज्जेव एक्काह अद्धे गण्डे कडे, अवलाह अद्धे मुक्के; तह वि मं अवलं संपदं ज्जेव मग्गदि । ( प्रेक्षध्वं प्रेक्षध्वं भट्टारकाः ! हा ! साम्प्रतमेव एकस्य अर्द्धे गण्डः कृतः अपरस्य अर्द्धं मुक्तम्; तथापि मामबलं साम्प्रतमेव याचते । )
माथुरः—( गृहीत्वा ) धुत्तु ! माथुरु अहं णिउणु । एत्थ तुए ण अहं धुत्तिज्जामि । ता पअच्छ तं लुत्तदण्डआ ! सव्वं सुवण्णं संपदं । ( धूर्त ! माथुरोऽहं निपुणः । अत्र त्वया नाहं धूर्त्यामि, तत् प्रयच्छ तं लुप्तदण्डक ! सर्वं सुवर्णं साम्प्रतम् । )
संवाहकः—कुदो दइश्शं ? । ( कुतो दास्यामि ? )
माथुरः—पिदरं विक्किणिअ पअच्छ । ( पितरं विक्रीय प्रयच्छ । )
संवाहक—( प्रकट रूप से ) आर्य ! आधा तुमने छोड़ दिया, क्षमा कर दिया ?
**माथुर—**हाँ, छोड़ दिया ।
संवाहक—( द्यूतकर से ) आधा आपने भी छोड़ दिया ?
**द्यूतकर—**हाँ, छोड़ दिया ।
संवाहक—( तो ) अब जाता हूँ ।
**माथुर—**वे दश सुवर्ण तो दे, कैसे जा रहे हो ?
**संवाहक—**श्रीमान् जी देखिये, देखिये । हाय ! अभी आधे के लिये वादा किया है और आधा छोड़ दिया है । तो भी मुझ दुर्बल से इसी समय मांगते हैं ।
माथुर—( पकड़ कर ) धूर्त ! मैं चतुर माथुर हूँ । मैं तुम्हारे साथ धूर्तता नहीं कर रहा हूँ । तो अरे दण्डयोग्य अपराधी ! मेरा वह सारा सोना दे ।
**संवाहक—**कहाँ से दूँ ।
**माथुर—**अपने बाप को बेच कर दे ।
**टीका—**गण्डः=निश्चयः, उपस्पृश्य=उपगम्य, मुञ्चतु=त्यजतु, कस्मिन्=कुत्र,
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