मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ मृच्छकटिकम्
न गणयति पराभवं कुतश्चिद् हरति ददाति च नित्यमर्थजातम् । नृपतिरिव निकाममायदर्शी विभववता समुपास्यते जनेन ॥ ७ ॥
अन्वयः-—(द्यूतं कर्तृ) कुतश्चित्, (अपि), पराभवम्, न, गणयति, नित्यम्, अर्थजातम्, हरति, ददाति, च, विभववता (अपि), जनेन, निकामम्, आयदर्शी, राजा, इव, समुपास्यते ॥ ७ ॥
शब्दार्थः-—द्यूतम् = जुआ, कुतश्चित् = किसी से, भी, पराभवम् = पराजय, या अपमान को, न = नहीं, गणयति = गिनता है, मानता है, नित्यम् = रोज, प्रतिदिन, अर्थजातम् = धन-समुदायको, हरति = ले लेता है, च = और, ददाति = दे देता है, विभववता = धनवान्, भी, जनेन = पुरुष के द्वारा, निकामम् = प्रचुर, आयदर्शी = धनलाभ दिखलाने वाले, राजा इव = राजा के समान, समुपास्यते = सेवित होता है, खेला जाता है ॥ ७ ॥
अर्थ-—संवाहक—जुआ, आदमी के लिये विना सिंहासन का राज्य है ।
(यह जुआ) किसी से भी (होने वाले) अपमान की गणना = परवाह नहीं करता है, प्रतिदिन बहुत धन ले लेता है (हरा देता है), और दे देता है (जिता देता है)। धनवान व्यक्ति के द्वारा (भी) नित्य प्रचुर आय दिखाने वाले राजा के समान सेवित होता है ॥ ७ ॥
टीका-—द्यूतम्, कुतश्चित् = कस्माच्चिद् अपि, पराभवम् = पराजयम्, अपमानम्, न = नैव, गणयति = विचिन्तयति, नित्यम् = प्रतिदिनम्, अर्थजातम् = धनसमूहम्, हरति = पराजयरूपेण हरति, ददाति = विजयरूपेण प्रयच्छति, च, विभववता = धनादिसम्पन्ने-नापि, जनेन = पुरुषेण, निकामम् = प्रचुरम्, आयदर्शी = आयप्रदर्शकः, राजा इव = भूपतिरिव, समुपास्यते = सेव्यते । यथा राजा मानापमाने न विचारयति, कस्यापि सर्वस्वं हरति, कस्मैचिच्च विपुलं धनं ददाति । तथैवेदं द्यूतमपि अस्ति । यथा प्रचुरायप्रदर्शकस्य राज्ञः आराधना अन्येन धनवतापि पुरुषेण क्रियते तथैव द्यूतस्यापि सेवनमधिकायप्रदर्शकमतो धनवतापि पुरुषेण द्यूतमुपसेव्यते । एवञ्च द्यूतस्य राज्ञश्च तुल्यत्वादुपमालंकारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ ७ ॥
विमर्शः-—दर्दुरक ने द्यूत को राजा के समान माना है। जैसे राजा किसी से हार नहीं मानता है बार बार युद्ध करता रहता है वैसे ही द्यूत में ही होता है। राजा किसी पर अप्रसन्न होकरं सब कुछ ले लेता है और प्रसन्न होने पर बहुत कुछ दे देता है, उसी प्रकार द्यूत भी कभी फकीर बना देता है और कभी मालामाल । जो राजा धनलाभ दिखाने वाला होता है उसकी सेवा में धनी भी, ओर अधिक धनलाभ की कामना से, लगे रहते हैं, वैसे ही लोग जुआ में भी लगे रहते हैं। निकामम् आयदर्शी—इस पुंल्लिङ्ग के स्थान पर 'आयदर्शि' यह नपुंसकलिङ्ग पाठ द्यूत के साथ और अधिक संगत होता है । अथवा—निकाम-मायदर्शि— यह मानकर विविध