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मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

१४८ मृच्छकटिकम्

न गणयति पराभवं कुतश्चिद् हरति ददाति च नित्यमर्थजातम् । नृपतिरिव निकाममायदर्शी विभववता समुपास्यते जनेन ॥ ७ ॥

अन्वयः-—(द्यूतं कर्तृ) कुतश्चित्, (अपि), पराभवम्, न, गणयति, नित्यम्, अर्थजातम्, हरति, ददाति, च, विभववता (अपि), जनेन, निकामम्, आयदर्शी, राजा, इव, समुपास्यते ॥ ७ ॥

शब्दार्थः-—द्यूतम् = जुआ, कुतश्चित् = किसी से, भी, पराभवम् = पराजय, या अपमान को, न = नहीं, गणयति = गिनता है, मानता है, नित्यम् = रोज, प्रतिदिन, अर्थजातम् = धन-समुदायको, हरति = ले लेता है, च = और, ददाति = दे देता है, विभववता = धनवान्, भी, जनेन = पुरुष के द्वारा, निकामम् = प्रचुर, आयदर्शी = धनलाभ दिखलाने वाले, राजा इव = राजा के समान, समुपास्यते = सेवित होता है, खेला जाता है ॥ ७ ॥

अर्थ-संवाहक—जुआ, आदमी के लिये विना सिंहासन का राज्य है ।

(यह जुआ) किसी से भी (होने वाले) अपमान की गणना = परवाह नहीं करता है, प्रतिदिन बहुत धन ले लेता है (हरा देता है), और दे देता है (जिता देता है)। धनवान व्यक्ति के द्वारा (भी) नित्य प्रचुर आय दिखाने वाले राजा के समान सेवित होता है ॥ ७ ॥

टीका-—द्यूतम्, कुतश्चित् = कस्माच्चिद् अपि, पराभवम् = पराजयम्, अपमानम्, न = नैव, गणयति = विचिन्तयति, नित्यम् = प्रतिदिनम्, अर्थजातम् = धनसमूहम्, हरति = पराजयरूपेण हरति, ददाति = विजयरूपेण प्रयच्छति, च, विभववता = धनादिसम्पन्ने-नापि, जनेन = पुरुषेण, निकामम् = प्रचुरम्, आयदर्शी = आयप्रदर्शकः, राजा इव = भूपतिरिव, समुपास्यते = सेव्यते । यथा राजा मानापमाने न विचारयति, कस्यापि सर्वस्वं हरति, कस्मैचिच्च विपुलं धनं ददाति । तथैवेदं द्यूतमपि अस्ति । यथा प्रचुरायप्रदर्शकस्य राज्ञः आराधना अन्येन धनवतापि पुरुषेण क्रियते तथैव द्यूतस्यापि सेवनमधिकायप्रदर्शकमतो धनवतापि पुरुषेण द्यूतमुपसेव्यते । एवञ्च द्यूतस्य राज्ञश्च तुल्यत्वादुपमालंकारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ ७ ॥

विमर्शः-—दर्दुरक ने द्यूत को राजा के समान माना है। जैसे राजा किसी से हार नहीं मानता है बार बार युद्ध करता रहता है वैसे ही द्यूत में ही होता है। राजा किसी पर अप्रसन्न होकरं सब कुछ ले लेता है और प्रसन्न होने पर बहुत कुछ दे देता है, उसी प्रकार द्यूत भी कभी फकीर बना देता है और कभी मालामाल । जो राजा धनलाभ दिखाने वाला होता है उसकी सेवा में धनी भी, ओर अधिक धनलाभ की कामना से, लगे रहते हैं, वैसे ही लोग जुआ में भी लगे रहते हैं। निकामम् आयदर्शी—इस पुंल्लिङ्ग के स्थान पर 'आयदर्शि' यह नपुंसकलिङ्ग पाठ द्यूत के साथ और अधिक संगत होता है । अथवा—निकाम-मायदर्शि— यह मानकर विविध

द्वितीयोऽङ्कः १४७

अपि च—

द्रव्यं लब्धं द्यूतेनैव दारा मित्रं द्यूतेनैव ।
दत्तं भुक्तं द्यूतेनैव सर्वं नष्टं द्यूतेनैव ॥ ८ ॥

अपि च—

त्रेता-हृतसर्वस्वः पावर-पतनाच्च शोषितशरीरः ।
नर्दित-दर्शितमार्गः कटेन विनिपातितो यामि ॥ ९ ॥


छल प्रपञ्च दिखाने वाला द्यूत और राजा । इसमें उपमा अलंकार और पुष्पिताग्रा छन्द है। लक्षण

'अयुजि न युगरेफतो यकारो युजि च नजौ जरगाश्च पुष्पिताग्रा' ॥ ७ ॥

**अन्वयः—**द्यूतेन, एव, द्रव्यम्, लब्धम्, दाराः, मित्रम्, च, द्यूतेन, एव, दत्तम्, भुक्तम्, द्यूतेन एव, सर्वम्, नष्टम् ॥ ८ ॥

**शब्दार्थः—**द्यूतेन = जुआ के द्वारा, एव = ही, द्रव्यम् = धन, लब्धम् = मिला, द्यूतेन एव = जुआ के द्वारा ही, दाराः = स्त्रियाँ, मिलीं, मित्रम् = मित्र, मिला, द्यूतेन एव = जुआ के द्वारा ही, दत्तम् = दिया गया, भुक्तम् = भोग किया गया, द्यूतेन एव = जुआ के द्वारा ही, सर्वम् = सब कुछ, नष्टम् = नष्ट हो गया ॥ ८ ॥

**अर्थ—**और भी,

(मैंने) जुआ से ही धन पाया, जुआ से ही स्त्री (मिली), मित्र मिला, जुआ ने ही (सब कुछ) दिया, भोग किया और जुआ से ही सब कुछ नष्ट हो गया ॥ ८ ॥

**टीका—**मया कर्त्रा, द्यूतेन एव = करणभूतेन द्यूतेन, द्रव्यम् = धनम्, लब्धम् = प्राप्तम्, द्यूतेन एव, दाराः = स्त्रियः, स्त्री वा, लब्धा, मित्रम् = सुहृद्, लब्धम्, द्यूतेनैव कर्त्रा, दत्तम् = प्रदत्तम्, द्यूतेनैव = हेतुना, करणेन वा, सर्वम् = निखिलम्, नष्टम् = विनष्टम् । अत्रैकस्यैव कारकस्यानेक-क्रिया-सम्बन्धात् कारकदीपकमलङ्कारः, विद्युन्मालावृत्तम् ॥ ८ ॥

**विमर्शः—**दर्दुरक यहाँ यह कहता है कि मुझे जो कुछ मिला या खोया वह सब द्यूत के कारण ही हुआ । द्यूतरूपी एक ही कारक का अनेक क्रियाओं के साथ सम्बन्ध होने से कारकदीपक अलंकार है। कुछ ने विषमालंकार माना है। विद्युन्माला छन्द है। लक्षण—मो मो गो गो विद्युन्माला ॥ ८ ॥

**अन्वयः—**त्रेताहृतसर्वस्वः, पावरपतनात्, च, शोषितशरीरः, नर्दितदर्शित-मार्गः, कटेन, विनिपातितः, यामि ॥ ९ ॥

**शब्दार्थ—**त्रेताहृत-सर्वस्वः = त्रेता (तीया नामक एक खास चाल) से सर्वस्व हार जाने वाला, च = और, पावर-पतनात् = पावर = दूआ नामक खेल की चाल गिरने से, शोषित-शरीरः = सूखे निश्चेष्ट शरीर वाला, नर्दित-दर्शित-मार्गः = नर्दित = नडका

१५० मृच्छकटिकम्

( अग्रतोऽवलोक्य ) अयमस्माकं पूर्वसभिको माथुर इत एवाभिवर्त्तते । भवतु, अपक्रमितुं न शक्यते । तदवगुण्ठयाम्यात्मानम् । ( बहुविधं नाट्यं कृत्वा स्थितः । उत्तरीय निरीक्ष्य )

अयं पटः सूत्रदरिद्रतां गतो ह्ययं पटश्छिद्रशतैरलङ्कृतः । अयं पटः प्रावरितुं न शक्यते ह्ययं पटः संवृत एव शोभते ॥ १० ॥


नामक खास चाल से ( हारने के कारण ) दिखाई गयी रास्ता वाला, कटेन=पूरा नामक चाल से, विनिपातितः=गिराया गया, ( मैं ), यामि=जा रहा हूँ ॥ ६ ॥

अर्थ— और भी,

तीया ( नाम की एक खास चाल ) से जिसका सारा धन हरण हो गया, दुआ ( नाम की खास चाल ) के चलने=गिरने से जिसका सारा शरीर सूखा = सुन्न=निश्चेष्ट हो गया, नक्का ( नाम की चाल ) से ( हारने के कारण भागने के लिये जिसे) रास्ता दिखा दिया गया, और पूरा (नामक चाल) से जो गिरा दिया गया, वैसा मैं ( दुःखी ) जा रहा हूँ ॥ ६ ॥

टीका— त्रेताहृत-सर्वस्वः त्रेताख्य-क्रीडा-प्रकार-विशेषेण 'तीया' इति प्रसिद्धेन, हृतम्=गतम् सर्वस्वम् = निखिलं धनं यस्य सः, पावरपतनात् = पावरस्य 'दुआ' इति प्रसिद्धस्य क्रीडनप्रकारस्य, पतनात् = भ्रंशात्, शोषित-शरीरः = शोषितम्=शुष्कताम् = निश्चेष्टतां नीतम्, शरीरम्=देहो यस्य सः तादृशः, नर्दित-दर्शितमार्गः = 'नक्का' इति क्रीडन-प्रकारेण पराजितत्वात् गृहगमनाय दर्शितः=प्रदर्शितः, मार्गः = पन्थाः, यस्य सः, कटेन = 'पूरा' इति ख्यातेन क्रीडनप्रकारेण, विनिपातितः = पराजयात् भूमौ प्रपातितः, यामि = असहायो भूत्वा व्रजामि । प्राचीनकाले द्यूतक्रीडायां त्रेता-पावर-नर्दित-कट-शब्दाः प्रचलिता आसन् तेषां कृतेऽधुना तीया-दुआ-नक्का-पूरा-शब्दाः प्रयुज्यन्ते । आर्यावृत्तम् ॥ ९ ॥

विमर्श— द्यूतक्रीडा में प्रयुक्त होने वाले चार पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग इसमें किया गया—( १ ) त्रेता=तीया ( आजकल तीन, सात, ग्यारह, पन्द्रह ) ( २ ) पावर=दुआ ( दो, छह, दश चौदह वगैरह ) ( ३ ) नर्दित=नक्का ( एक पाँच नौ तेरह ) ( ४ ) कट=पूरा ( चार, आठ, बारह, सोलह ) । इन चारों दावों ने उसे धोखा दिया है, यह उसका भाव है । इसमें आर्या छन्द है ॥ ६ ॥

अर्थ— ( आगे देखकर ) यह हमारा पुराना द्यूत-क्रीडाध्यक्ष माथुर इधर ही आ रहा है । अच्छा, भागना तो सम्भव नहीं है । अतः अपने को छिपा लेता हूँ । ( कई प्रकार से शरीर को ढकने का अभिनय करके खड़ा होता है । उस उत्तरीय वस्त्र को देखकर— )

अन्वयः— अयम्, पटः, सूत्रदरिद्रताम्, गतः, अयम्, पटः, छिद्रशतैः, अलङ्कृतः, अयम्, पटः, प्रावरितुम्, न, शक्यते, अयम्, पटः, संवृतः, एव, शोभते ॥१०॥

द्वितीयोऽङ्कः १५१

अथवा किमयं तपस्वी करिष्यति । यो हि—
पादेनैकेन गगने द्वितीयेन च भूतले ।
तिष्ठाम्युल्लम्बितस्तावद् यावत्तिष्ठति भास्करः ॥ ११ ॥

शब्दार्थ— अयम्=यह (मेरा), पटः=कपड़ा, सूत्रदरिद्रताम्=सूतों की जीर्णता को, गतः=प्राप्त हो चुका है, अयम्=यह, पटः=कपड़ा, छिद्रशतैः=सैकड़ों छेदों से, अलङ्कृतः=सजा हुआ, युक्त है, अयं पटः = यह कपड़ा, प्रावरितुम्=शरीर ढकने के लिये, न शक्यते=नहीं सम्भव है, अयं पटः=यह कपड़ा, हि=निश्चितरूप से, संवृतः= लपेटा, घरी किया हुआ, एव=ही, शोभते=अच्छा लगता है ॥ १० ॥

अर्थ — यह कपड़ा (मेरा दुपट्टा) जीर्ण शीर्ण सूतों वाला हो चुका है। यह कपड़ा सैकड़ों छिद्रों से युक्त है। यह कपड़ा (शरीर) ढकने में समर्थ नहीं है। यह कपड़ा, निश्चित रूप से, लपेटा हुआ ही अच्छा लगता है ॥ १० ॥

टीका— अयम् = हस्तस्थितः, मदीयः, पटः = उत्तरीयम्, सूत्रदरिद्रताम् = सूत्राणाम्=तन्तूनाम्, दरिद्रताम्=जीर्णताम्, गतः=प्राप्तः, अतीव जीर्णोऽभवदिति भावः, अयं पटः=इदमूत्तरीयम्, हि=निश्चयेन, छिद्रशतैः=शताधिकविवरैः, अलङ्कृतः= विभूषितः, युक्तः, अगणितछिद्रयुक्तः इति भावः, अयं पटः = इदमूत्तरीयम्, प्रावरितुम् = आच्छादयितुम्, न=नैव, शक्यते=समर्थ्यते, अयं पट = इदमूत्तरीयम्, संवृतः = परिवेष्टितः, एव, हि = निश्चयेन, शोभते = भाति । अत्र 'अयं पटः' इत्यस्यावृत्त्या अनवीकृतत्वदोषः । वंशस्थबिलं वृत्तम् ॥ १० ॥

विमर्श — प्रावरितुम् — प्र+आङ् + √वृ + तुमुन् ।
संवृतः— सम् + √वृ + क्त । इसमें 'अयं पटः' का चार बार प्रयोग होने से अनवीकृतत्वदोष है। साधारणपात्र का कथन होने से चिन्तनीय नहीं है। इसमें वंशस्थबिल छन्द है । लक्षण— 'जतो तु वंशस्थबिलं जतौ जरौ' ॥ १० ॥

अन्वयः— एकेन, पादेन, गगने, द्वितीयेन, च, भूतले, उल्लम्बितः, तावद्, तिष्ठामि, यावत्, भास्करः, तिष्ठति ॥ ११ ॥

शब्दार्थ— एकेन = एक, पादेन = पैर से, गगने = आकाश में च = और, द्वितीयेन=दूसरे से, भूतले=पृथ्वी पर, उल्लम्बितः=ऊपर लटका हुआ, तावत्=तब तक, तिष्ठामि=रह सकता हूँ, यावत्=जब तक, भास्करः=सूरज, तिष्ठति=[आकाश में लटका] रहता है ॥ ११ ॥

अर्थ— अथवा यह बेचारा (तुच्छ) माथुर मेरा क्या कर सकता है जो मैं— एक पैर से आकाश में [अर्थात् ऊपर करके] और दूसरे से पृथ्वी पर [अर्थात् नीचे करके] तब तक लटका हुआ रह सकता हूँ जब तक कि आकाश में सूरज (लटकता हुआ) रहता है ॥ ११ ॥

टीका— यो अहम्=दर्दुरकः-इति गद्यस्थेनान्वयः—एकेन पादेन=चरणेन,

१५२ मृच्छकटिकम्

माथुरः— देहि देहि । ( देहि देहि । ) ( दापय दापय । )
संवाहकः— कुदो दइश्शं ( कुतो दास्यामि ? )
( माथुरः कर्षति । )
दर्दुरकः— अये ! किमेतदग्रतः (आकाशे) किं भवानाह ? 'अयं द्यूतकरः सभिकेन खलीक्रियते, न कश्चिन्मोचयति' इति ? नन्वयं दर्दुरो मोचयति । ( उपसृत्य ) अन्तरमन्तरम् । ( दृष्ट्वा ) अये ? कथं माथुरो धूर्त्तः, अयमपि तपस्वी संवाहकः ।

यः स्तब्धं दिवसान्तमानतशिरा नास्ते समुल्लम्बितो
यस्योद्धर्षणलोष्टकैरपि सदा पृष्ठे न जातः किणः ।
यस्यैतच्च न कुक्कुरैरहरहर्जङ्घान्तरं चर्व्यते
तस्यात्यायतकोमलस्य सततं द्यूतप्रसङ्गेन किम् ॥ १२ ॥


गगने=आकाशे, च=तथा, द्वितीयेन=अपरेण, भूतले=पृथिव्याम्, एकं पादमूर्ध्वं कृत्वान्यं च पृथिव्यां संस्थाप्य उल्लम्बितः=ऊर्ध्वं लम्बमानः सन्, तावत्=तावत्कालपर्यन्तम्, तिष्ठामि=स्थातुं शक्नोमि, यावत्=यावत्कालपर्यन्तम्, भास्करः=सूर्यः, तिष्ठति=गगने विराजते, सायंकालं यावदनेनैव रूपेणाहं स्थातुं शक्नोमीत्येवं क्लेशसहस्य मम माथुरात् कुतो भियमिति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ११ ॥

विमर्श— उल्लम्बितः—उत् + लम्ब् + इट् + क्त । भाः करोति—इस अर्थ में—भाः + करः, विसर्ग का सत्त्व । यावत् तिष्ठति भास्करः—अर्थात् सायंकाल तक मैं इसी विचित्र रूप में लटका रह सकता हूँ अतः डरना बेकार है। बाद में रात हो जायगी और तब मुझे कोई भी नहीं पकड़ सकेगा, इस माथुर की तो बात ही क्या ? इसमें पथ्यावक्त्र छन्द है ॥११॥

अर्थ—माथुर— दो, दो, (अथवा दिलाओ, दिलाओ) ।
संवाहक— कहा से दूँ ।
( माथुर घसीटता है । )
दर्दुरक— अरे ! सामने यह क्या हो रहा है ? ( आकाश में ऊपर की ओर मुंह करके ) आपने क्या कहा ? 'सभिक [ द्यूत क्रीडाध्यक्ष ] इस द्यूतकर [संवाहक] को परेशान कर रहा है, कोई भी नहीं छुड़ाता है ?' तो लो यह दर्दुरक छुड़वाता है । ( पास जाकर ) रास्ता दीजिये, रास्ता दीजिये । ( देखकर ) अरे, अब कैसे ? यहाँ तो धूर्त माथुर है, और यह गरीब संवाहक ।

अन्वयः— यः, ( अहम् इव ) समुल्लम्बितः, आनतशिराः, (सन्), दिवसान्तम्, स्तब्धम्, न, आस्ते, यस्य, पृष्ठे, उद्धर्षणलोष्ठकैः, अपि, किणः, सदा, न, जातः, यस्य, च, एतत्, जङ्घान्तरम् कुक्कुरैः, अहरहः, न, चर्व्यते, अत्यायतकोमलस्य, तस्य, सततम्, द्यूतप्रसङ्गेन, किम् ॥ १२ ॥

द्वितीयोऽङ्कः १५३


शब्दार्थः-—यः= जो पुरुष [ अहम् इव = मेरे समान ], समुल्लम्बितः=ऊपर लटका हुआ, आनतशिराः=शिर को नीचे झुकाये हुये, दिवसान्तम्=दिन के अन्त=सायंकाल तक, स्तब्धम्=निश्चल रूप से, न=नहीं, आस्ते=रह सकता है, यस्य=जिसकी, पृष्ठे=पीठ पर, उद्घर्षणलोष्ठकैः=नुकीले ढेलों से, अपि=भी, किणः=चिह्न=ढट्ठा, न=नहीं, जातः=बना है, च=और, यस्य=जिसके, जंघान्तरम्=जाँघों के भीतरी भाग [ के मांस ] को, कुक्कुरैः=कुत्ते, अहरहः=रोज, न=नहीं, चर्व्यते=चबाते हैं, काटते हैं, अत्यायतकोमलस्य=बहुत अधिक कोमल, तस्य=उस व्यक्ति का, सततम्=निरन्तर, द्यूतप्रसङ्गेन=जुआ खेलने से, किम्=क्या लाभ ? अर्थात् जो मेरे समान ऐसा नहीं है उसे जुआ नहीं खेलना चाहिये ।। १२ ।।

अर्थ-—[ मेरे समान ] जो व्यक्ति ऊपर लटका हुआ नीचे शिरवाला होते हुये सायंकाल तक अर्थात् दिन भर निश्चल रूप से नहीं रह सकता है। जिसकी पीठ पर [हारा हुआ धनादि न देने के कारण] सदैव नुकीले ढेलों [ पर घसीटने ] के कारण चिह्न=ढट्ठे नहीं पड़े हैं। और [ हार कर या जीत कर भागते समय ] जिसकी जांघों के मध्य भाग [ के मांस ] को रोज कुत्ते नहीं चबाते हैं, ऐसे अत्यन्त कोमल [ शरीर वाले ] व्यक्ति को रोज जुआ खेलने से क्या लाभ ? [ अर्थात् मेरे समान जो उक्त स्थितियों को सह सकता है उसे ही जुआ खेलना चाहिये न कि सरल कोमल पुरुष को ] ।। १२ ।।

टीका-—यः=जनः, ( अहम् इव=दर्दुरक इव ), समुल्लम्बितः=ऊर्ध्वभागादधो-देशे लम्बमानः, अत एव, आनतशिराः=आनतम्=अधःकृतम्, शिरः=मस्तकम् यस्य सः तादृशः, अधोमुख इत्यर्थः, सन्, दिवसान्तम्=दिवसस्यान्तम्=सायङ्कालं यावत्, स्तब्धम्=निश्चलं यथा स्यात् तथा, न आस्ते=स्थातुं न शक्नोतीति भावः, यस्य=जनस्य, मम, इव, पृष्ठे=पृष्ठभागे, उद्घर्षणलोष्ठकैः=उद्घृष्यते एभिरिति ( करणे घञ् ) उद्घर्षणानि, तानि च=लोष्टकानि=इष्टिकादिखण्डानि, तैः, 'ढेला' इति नाम्ना हिन्द्यां प्रसिद्धैरिति भावः सदा=प्रतिदिनम्, किणः=घर्षणादिचिह्नम्, न=नैव, जातः=समुत्पन्नः, पराजितत्वात् धनादि-प्रतिदानेऽसमर्थतया सभिकादिभिःकृतेन घर्षणेन यस्य पृष्ठं किणाङ्कितं न जातमिति भावः, यस्य=जनस्य, च मम इव, एतत्, इदम्, जङ्घान्तरम् = जघनमध्यदेशः, कुक्कुरैः = श्वभिः, अहरहः=प्रतिदिनम्, न=नैव, चर्व्यते=भक्ष्यते, तस्य=पुरोवर्त्तिसंवाहकस्य, अत्यायतकोमलस्य=अतिशयकोमलस्य, यद्वा, अत्यायतः=विपुलशरीरश्चासौ, कोमलश्च, तस्य, सततम्=निरन्तरम्, द्यूतप्रसङ्गेन=द्यूतक्रीडानुरागेण, किम्=न किमपि प्रयोजनम् । एवञ्च संवाहकेन द्यूतं न क्रीडितव्यम् । अत्राप्रस्तुतप्रशंसालंकारः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।। १२ ।।

विमर्श-स्तब्धम्—√ स्तभ् + क्त । समुल्लम्बितः—सम् + उत् + लम्ब् +

१५४ मृच्छकटिकम्

भवतु, माथुरं तावत् सान्त्वयामि । ( उपगम्य ) माथुर ! अभिवादये।
( माथुरः प्रत्यभिवादयते । )
दर्दुरकः—किमेतत् ? ।
माथुरः—अअं दशसुवण्णं घालेदि । ( अयं दशसुवर्णं धारयति । )
दर्दुरकः—ननु कल्पवर्त्तमेतत् ।
माथुरः—(दर्दुरस्य कक्षतल-लुण्ठीकृतं पटमाकृष्य ) भट्टा ! पश्शत पश्शत-
जज्जरपडप्पावुदो अअं पुलिसो दससुवण्णं कल्लवत्तं भणादि । ( भर्तारः !
पश्यत पश्यत, जर्जरपटप्रावृतोऽयं पुरुषो दशसुवर्णं कल्पवर्त्तं भणति । )
दर्दुरकः—अरे मूर्ख ! नन्वहं दशसुवर्णान् कटकराणेन प्रयच्छामि । तत्,
किं यस्यास्ति धनम्, स किं क्रोडे कृत्वा दर्शयति ? । अरे—

दुर्वर्णोऽसि विनष्टोऽसि दशस्वर्णस्य कारणात् ।
पञ्चेन्द्रियसमायुक्तो नरो व्यापाद्यते त्वया ॥ १३ ॥


क्त । अत्यायतकोमलस्य=अत्यन्तकोमलस्य, अथवा, अत्यायतः=विपुलशरीरः चासौ, कोमलश्च=मृदुश्च, तस्य । द्यूतप्रसङ्गेन किम्—दर्दुरक का तात्पर्य यह है कि जो मेरे समान कष्ट नहीं सह सकता ऐसे व्यक्ति को जुआ नहीं खेलना चाहिये। बेचारा संवाहक तो फंस गया है। यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार और शार्दूलविक्रीडित छन्द है । लक्षण—सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ॥ १२॥

**अर्थ—**अच्छा, तो माथुर को राजी करता हूँ, ( मनाता हूँ )। ( समीप जाकर ) माथुर ! आपको प्रणाम करता हूँ ।

( माथुर प्रतिनमस्कार करता है । )

**दर्दुरक—**यह क्या ( कर रहे हो ) ?
**माथुर—**इस पर मेरे दश सुवर्ण ( खण्ड ) उधार हैं ।
**दर्दुरक—**अरे, इतना धन तो कलेवा ( के समान तुच्छ ) है ।
माथुर—( दर्दुरक के कांख=कक्ष में लपेट कर रखे हुये कपड़े को खींच कर ) सज्जनों ! देखो, देखो, फटे कपड़े से लिपटा ( आवृत ) यह आदमी सोने के दश सिक्कों को कलेवा के समान तुच्छ कहता है ।
**दर्दुरक—**अरे मूर्ख ! दश स्वर्ण सिक्के तो मैं एक कट ( दाँव ) से ही दे सकता हूँ । तो क्या, जिसके पास धन रहता है वह उसे गोद में लेकर दिखाता फिरता है ।

**अन्वयः—**अरे ! ( इति गद्यस्थम् ), त्वम्, दुर्वर्णः, असि, विनष्टः, असि, यत्, त्वया, दशस्वर्णस्य, कारणात्, पञ्चेन्द्रियसमायुक्तः, नरः, व्यापाद्यते ॥ १३ ॥

**शब्दार्थ—**अरे !=अरे !, त्वम्, दुर्वर्णः = निम्नवर्णवाले वर्णाधम, असि = हो, विनष्टः = पतित, असि = हो, यत् = जो कि, त्वया, = तुम्हारे द्वारा,

द्वितीयोऽङ्कः १५५

माथुरः—भट्टा ! तुए दशसुवण्णु कल्लवत्तु, मए एसु विहवु । ( भर्तः ! तव दशसुवर्णं कल्पवर्त्तं, मम एष विभवः । )

दर्दुरकः—यद्येवम्, श्रूयतां तर्हि; अभ्यान् तावत् दशसुवर्णानस्यैव प्रयच्छ । अयमपि द्यूतं शीलयतु ।

माथुरः—ता किं भोदु ? । ( तत् किं भवतु ? )

दर्दुरकः—यदि जेष्यति तदा दास्यति ।

माथुरः—अह ण जिणादि । ( अथ न जयति ? )

दर्दुरकः—तदा न दास्यति ।


दशस्वर्णस्य = दस सोने के सिक्कों के, कारणात् = कारण से, पञ्चेन्द्रियसमायुक्तः = पाँच इन्द्रियों से युक्त, नरः = प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य को, व्यापाद्यते = मार डाला जाता है ॥ १३ ॥

अर्थ—अरे ! ( माथुर ! ) तुम नीच एवं पतित हो जो कि दश स्वर्ण सिक्कों के कारण एक पाँच इन्द्रियों ( आँख, कान, नाक, जीभ, और त्वचा रूपी पाँच ज्ञानेन्द्रियों ) से युक्त मनुष्य को तुम मार डाल रहे हो ॥ १३ ॥

टीकाअरे = रे माथुर !, त्वम्, दुर्वर्णः = वर्णाधमः, हीनजातिकः असि, विनष्टः = पतितः, असि, यत् = यस्मात्, त्वया = माथुरेण, दशस्वर्णस्य = दशस्वर्णमुद्रायाः, कारणात् = हेतोः, पञ्चेन्द्रियैः = श्रोत्रत्वक्-चक्षूरसनाघ्राणैरिति पञ्चज्ञानेन्द्रियैः, अथवा पञ्चकर्मेन्द्रियैः, समायुक्तः = अलंकृतः, नरः = प्राणिषु श्रेष्ठः मानवः, व्यापाद्यते = हन्यते । काव्यलिङ्गमलङ्कारः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ १३ ॥

विमर्शदुर्वर्णः = दुष्टः = निकृष्टः वर्णः यस्य सः, नीच वर्णवाला । विनष्टः—यहाँ धर्मादि से पतित—यह अर्थ लेना चाहिये । पञ्चेन्द्रिय-समायुक्तः = पञ्च ज्ञानेन्द्रिय ( आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा ) अथवा कर्मेन्द्रिय ( पायु, उपस्थ, पाणि, पाद, वाक्) से युक्त । व्यापाद्यते—वि + पद + णिच्—कर्मवाच्य का रूप है। काव्यलिङ्ग अलंकार और अनुष्टुप् छन्द है ॥ १३ ॥

अर्थमाथुर—राजा साहब ! ( व्यङ्ग्य में है ) दश स्वर्ण सिक्के तुम्हारे लिये कलेवातुल्य तुच्छ हो सकते हैं किन्तु मेरे लिये तो यही सम्पत्ति है ।

दर्दुरक—यदि ऐसी बात है तो सुनो; इसे कुछ देर के लिये दस स्वर्ण सिक्के दे दो । यह ( उनके द्वारा ) फिर से जुआ खेले ।

माथुर—तो इससे क्या होगा ?

दर्दुरक—यदि जीत जायगा तो दे देगा ।

माथुर—यदि नहीं जीता ?

दर्दुरक—तब नहीं देगा ।

१५६मृच्छकटिकम्

**माथुरः—**अह ण जुत्तं जप्पिदुं । एवं अक्खन्तो तुमं पअच्छ धूत्त-आ ! अहं वि णाम माथुरो धुत्तु जूदं मिथ्या आदंसाअमि ? अण्णस्स वि अहं ण बिभेमि । धुत्ता ! खण्डिअवउत्तोसि तुमं । ( अथ न युक्तं जल्पितुम् । एवमाचक्षाणस्त्वं प्रयच्छ धूर्त्तक ! अहमपि नाम माथुरो धूर्त्तः द्यूतं मिथ्या आदर्शयामि ? अन्यस्मादपि अहं न बिभेमि । धूर्त्त ! खण्डितवृत्तोऽसि त्वम् । )

**दर्दुरकः—**अरे कः खण्डितवृत्तः ?

**माथुरः—**तुमं हु खण्डिअवउत्तो । ( त्वं खलु खण्डितवृत्तः । )

**दर्दुरकः—**पिता ते खण्डितवृत्तः । ( संवाहकस्य अपक्रमितुं संज्ञां ददाति । )

**माथुरः—**गोसाविआपुत्ता ! णं एवं जूदं तुए सेविदं ? (वेश्यापुत्र ! एवमेव द्यूतं त्वया सेवितम् ? )

**दर्दुरकः—**मया एवं द्यूतमासेवितम् ।

**माथुरः—**अले संवाहआ ! पअच्छ तं दशसुवण्णं । ( अरे संवाहक ! प्रयच्छ तत् दशसुवर्णम् । )

**संवाहकः—**अज्ज दइश्शं, दाव दइश्शं । (अद्य दास्यामि, तावत् दास्यामि ।)

( माथुरः कर्षति । )


**माथुर—**अब ( इस विषय में ) तुमसे बात करना ठीक नहीं है । रे धूर्त ! ऐसा कह रहे हो तो तुम्हीं दे दो । मैं भी माथुर, प्रसिद्ध धूर्त जुआरी बिना मतलब के जुआ का खेल दिखाऊँगा ? और किसी से डरता भी नहीं हूँ । धूर्त ! तुम खण्डितवृत्त ( बेईमान, चरित्रभ्रष्ट ) हो ।

**दर्दुरक—**अरे ! कौन बेईमान है ।

**माथुर—**तुम बेईमान ( चरित्रभ्रष्ट ) हो ।

**दर्दुरक—**तुम्हारा बाप बेईमान है । ( संवाहक को भाग जाने के लिये इशारा करता है ।)

**माथुर—**रण्डी के बच्चे ! तूने ऐसा ही जुआ खेलना सीखा ?

**दर्दुरक—**हाँ, मैंने ऐसे ही खेला है ।

**माथुर—**अरे संवाहक ! वह दश स्वर्ण दो ।

**संवाहक—**आज दूंगा । अभी दूंगा ।

( माथुर खींचता है । )

**टीका—**भतं: ! = राजन् ! इयं व्यङ्ग्योक्तिः । अस्य = अस्मै, प्रयच्छ = देहि, आचक्षाणः = कथयन्, मिथ्या = लाभादिकं विनैव, आदशंयामि = प्रदर्शयामि, अत्र काकुः । खण्डितवृत्तः = द्यूतकरस्य कृते निश्चिताचारणस्यावमन्ता अतः चरित्रहीन इति भावः । अपक्रमितुम् = तत्स्थानादन्यत्र पलायितुम्, संज्ञाम्=

द्वितीयोऽङ्कः १५७

दर्दुरकः—मूर्ख ! परोक्षे खलीकर्त्तुं शक्यते, न ममाग्रतः खलीकर्तुम्। (माथुरः संवाहकमाकृष्य घोणायां मुष्टिप्रहारं ददाति। संवाहकः सशोणितं मूर्च्छां नाटयन् भूमौ पतति। दर्दुरक उपसृत्य अन्तरयति। माथुरो दर्दुरकं ताडयति। दर्दुरको विप्रतीपं ताडयति।)

माथुरः—अले अले दुट्ट ! छिण्णालिआपूत्तअ ! फलं पि पाविहिसि। (अरे अरे दुष्ट ! पुंश्चलीपुत्रक ! फलमपि प्राप्स्यसि।)

दर्दुरकः—अरे मूर्ख ! अहं त्वया मार्गगत एव ताडितः; श्वो यदि राजकुले ताडयिष्यसि, तदा द्रक्ष्यसि।


संकेतम्, एवमेव = अनेनैव प्रकारेण ऋणं दत्त्वा हानिलाभौ परित्यज्येति भावः, आसेवितम् = क्रीडितम्।

विमर्श—भर्त्तः । (प्राकृतभट्टा) यह माथुर का व्यङ्ग्यभरा सम्बोधन है। अस्य = यहाँ सम्बन्धसामान्य मानकर षष्ठी है। अहमपि नाम माथुरो धूर्तः द्यूतं मिथ्याऽऽदर्शयामि ?—इसमें काकु का प्रयोग है। माथुर का यह तात्पर्य है कि मैं भी परमधूर्त जुआरी माथुर हूँ, बिना किसी लाभ के जुआ की प्रदर्शनी नहीं करता हूँ। कुछ लोगों ने दो वाक्यखण्ड माने हैं। और ‘जुआ को छल से खेलता हूँ’ तथा कुछ ने ‘अपने को व्यर्थ प्रधान माने फिरता हूँ’—यह अर्थ किया है। परन्तु ये परम्पराप्राप्त नहीं हैं। इस विषय में काले द्वारा उद्धृत वक्तव्य ध्यान देने योग्य है— “श्रीनिवासाचार्य—अहमपि नाम माथुरो धूर्तो द्यूतं मिथ्याऽऽदर्शयामिति काकुः। पणमप्रतियातितं त्यजन् हि द्यूतमेव वितथयति। नाहमेवं द्यूतस्य व्यपदेशं दूषयामीत्यर्थः। नेदं धनस्पृहया पीडनम्, किं तर्हि ? द्यूतधर्मरक्षार्थमिति भावः।” खण्डितवृत्त—जुआ में जो नियम निर्धारित हैं, उनका पालन न करने वाला।

अर्थ—दर्दुरक—मूर्ख ! मेरे पीठ पीछे (न होने पर) ही सता सकते हो। मेरे सामने नहीं सता सकते हो।

(माथुर संवाहक को खींच कर उसकी नाक पर घूंसा जमाता है। संवाहक खून से लथपथ होकर मूर्च्छा (बेहोशी) का अभिनय करता हुआ पृथ्वी पर गिर जाता है। दर्दुरक समीप पहुँच कर बीच-बचाव कर देता है, दोनों को अलग-२ कर देता है। माथुर दर्दुरक को (भी) पीटने लगता है। दर्दुरक भी जवाब में पीटने लगता है।)

माथुर—अरे अरे दुष्ट ! पुंश्चली=छिनार के बच्चे ! इसका मजा चखोगे (फल भी पाओगे)।

दर्दुरक—अरे मूर्ख ! तुमने सड़क पर जाते हुये (निरपराध) मुझे पीटा है। कल यदि राजदरवार में पीटोगे, तब देखना (उसका फल भोगना)।

३५८मृच्छकटिकम्

माथुरः— एसु पेक्खिस्सं । ( एष प्रेक्षिष्ये । ) दर्दुरकः— कथं द्रक्ष्यसि ? । माथुरः— (प्रसार्य चक्षुषी) एव्वं पेक्खिस्सं । ( एवं प्रेक्षिष्ये । ) ( दर्दुरको माथुरस्य पांशुना चक्षुषी पूरयित्वा संवाहकस्य अपक्रमितुं संज्ञां ददाति । माथुरोऽक्षिणी निगृह्य भूमौ पतति । संवाहकोऽपक्रामति । ) दर्दुरकः— ( स्वगतम् ) प्रधानसभिको माथुरो मया विरोधितः । तन्नात्र युज्यते स्थातुम् । कथितञ्च मम प्रियवयस्येन शर्विलकेन, यथा किल, 'आर्यकनामा गोपालदारकः सिद्धादेशेन समादिष्टो राजा भविष्यति इति सर्वश्च अस्मद्विधो जनस्तमनुसरति' । तदहमपि तत्समीपमेव गच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । ) संवाहकः— (सत्रासं परिक्रम्य दृष्ट्वा) एशे कस्सवि अणपावुदपक्खदुवालके गेहे । ता एत्थ पविशिश्शं । ( प्रवेशं रूपयित्वा वसन्तसेनामालोक्य ) अज्जे !


माथुर— मैं देख लूँगा । दर्दुरक— किस प्रकार देखोगे ? माथुर— (आंखें फैलाकर) इस प्रकार देखूँगा । ( दर्दुरक धूल से माथुर की आँखें भरकर=उसकी आंखों में धूल झोंक कर संवाहक को भागने का इशारा करता है । माथुर आंखें पकड़ कर जमीन पर बैठ जाता है । संवाहक भाग जाता है । ) दर्दुरक— ( अपने आप ) जुआ के प्रधान अध्यक्ष माथुर से मैंने विरोध कर लिया है अतः अब यहाँ रुकना ठीक नहीं है । मेरे प्रिय मित्र शर्विलक ने यह कहा है—'सिद्ध महात्मा के द्वारा बताया गया है कि आर्यक नामक गोपालपुत्र राजा बनेगा । मेरे जैसे सभी लोग उस (गोपालदारक) का अनुगमन (साथ) कर रहे हैं।' इस लिये मैं भी उसी के पास जा रहा हूँ । (ऐसा कह कर चला जाता है।)

टीका— खलीकर्तुम्=वञ्चितुम्, ताडयितुं वा, संशोणितम्—शोणितेन युक्तं यथा स्यात् तथा इति क्रियाविशेषणम् । विप्रतीपम्=विपरीतम् इदमपि क्रिया-विशेषणम् । पुंश्चलीपुत्र=कुलटायाः पुत्र, मार्गगतः=पथिकः सन् न तु अपराध्यन् सन्, पांशुना=धूल्यादिना, संज्ञाम्=संकेतम्, निगृह्य=गृहीत्वा अवलम्ब्य वा, विरोधितः = विरोधविषयीकृतः, शत्रुत्वं प्रापितः, युज्यते = युक्तं भवति, सिद्धा-देशेन = सिद्धिमतो महात्मनः भविष्यत्कथनेन, अस्मद्विधः = अस्मत्सदृशः निर्धनः असहायश्च लोकः।

अर्थ—संवाहक— (घबराहट के साथ घूमकर देखकर) यह किसी का घर है जिसका बगल का दरवाजा खुला है । तो इसमें प्रवेश करता हूँ । ( प्रवेश

द्वितीयोऽङ्कः १५९

शलगणागदे म्हि। (एतत् कस्यापि अनपावृतपक्षद्वारकं गेहम्। तदत्र प्रविशामि। आर्ये ! शरणागतोऽस्मि।)

वसन्तसेनाअभअं सरणागदस्स। हज्जे ! ढक्केहि पक्खदुआरं। (अभयं शरणागतस्य। हञ्जे ! पिधेहि पक्षद्वारकम्।)

(चेटी तथा करोति।)

वसन्तसेनाकुदो दे भअं ? (कुतस्ते भयम् ?)

संवाहकःअज्जे धणिकादो। (आर्ये ! धनिकात्।)

वसन्तसेनाहज्जे ! संपदं अवावुणु पक्खदुआरं। (हञ्जे ! साम्प्रतमपावृणु पक्षद्वारकम्।)

संवाहकः—(आत्मगतम्) कधं धणिकादो तुलिदं शे भअकारणं। शुट्ठु क्खु एवं वुच्चदि—(कथं धनिकात् तुलितमस्या भयकारणम्। सुष्ठु खल्वेवमुच्यते)

जे अत्तबलं जाणिअ भारं तुलिदं वहेइ माणुस्से।
ताह खलणं ण जायदि णअ कान्तालगदो विविज्जदि ॥ १४ ॥
य आत्मबलं ज्ञात्वा भारं तुलितं वहति मनुष्यः।
तस्य स्खलनं न जायते न च कान्तारगतो विपद्यते ॥ १४ ॥

एत्थ लक्खिदो म्हि। (अत्र लक्षितोऽस्मि।)


करने का अभिनय करके, वसन्तसेना को देख कर) आर्ये ! आपकी शरण में आया हूँ।

वसन्तसेना—शरण में आये तुमको अभयदान है। चेटी ! दरवाजा बन्द कर दो।

(चेटी दरवाज़ा बन्द करती है।)

वसन्तसेना—तुम्हें किससे भय है ?

संवाहक—आर्ये ! धनी आदमी से।

वसन्तसेना—चेटी ! अब दरवाजा खोल दो।

संवाहक—(अपने आप) क्यों, धनिक से होने वाले भय को हल्का (साधारण) समझ रही है ? यह ठीक ही कहा जाता है —

अन्वयः—यः, मनुष्यः, आत्मबलम्, ज्ञात्वा, तुलितम्, भारम्, वहति, तस्य, स्खलनम्, न, जायते, कान्तारगतः, च, सः, न, विपद्यते ॥ १४ ॥

शब्दार्थ—यः = जो, मनुष्यः = आदमी, आत्मबलम् = अपने बल को, सामर्थ्य को ज्ञात्वा = समझ कर, तुलितम् = तौले हुये, भारम् = बोझा को, वहति = ढोता है, तस्य = उसका, स्खलनम् = पतन, गिरना, न = नहीं, जायते = होता है, च = और, कान्तारगतः = वन अथवा दुर्गम मार्ग में फँसा हुआ, सः = वह व्यक्ति, न = नहीं, विपद्यते = नष्ट होता है, मरता है ॥ १४ ॥

१६०मृच्छकटिकम्

माथुरः-- ( अक्षिणी प्रमृज्य द्यूतकरं प्रति ) अरे ! देहि देहि। ( अरे ! देहि देहि। )

**द्यूतकरः--**भट्ठा ! जावदेव अम्हे दद्दुरेण कलहाइदा, तावदेव सो गोहो अवक्कन्तो। ( भर्तः ! यावदेव वयं दर्दुरेण कलहायिताः, तावदेव स पुरुषोऽपक्रान्तः। )

**माथुरः--**तस्स जूढकलस्स मुट्टिप्पहालेण णासिका भग्गा आसि। ता एहि, रुहिरपहं अणुसरेम्ह। ( तस्य द्यूतकरस्य मुष्टिप्रहारेण नासिका भग्ना आसीत्। तदेहि, रुधिरपथमणुसरावः )

( अनुसृत्य )

**द्यूतकरः--**भट्ठा। वसन्तसेणागेहं पविट्ठो सो। ( भर्तः ! वसन्तसेनागेहं प्रविष्टः सः। )


**अर्थ—**जो आदमी अपने सामर्थ्य को समझ कर ( उसके अनुसार ) तौले हुये बोझ को उठाता है वह न तो ( कहीं ) गिरता है और न दुर्गम मार्ग ( या जंगल ) में जाता हुआ मरता है = कष्ट भोगता है ॥ १४ ॥

मैं इस कथन का लक्ष्य = उदाहरण बन गया हूँ।

टीका—यः मनुष्यः = पुरुषः, आत्मबलम् = स्वकीयं सामर्थ्यम्, ज्ञात्वा = विदित्वा, विचिन्त्य वा, तुलितम् = तुलादिना परिमापितं स्वसामर्थ्यानुरूपमिति भावः, भारम् = भारभूतं पदार्थम्, वहति = धारयति, तस्य = जनस्य, स्खलनम् = मार्गे गर्त्तादौ पतनम्, न जायते = न भवति, च = तथा, कान्तारगतः = दुर्गममार्गं गच्छन्, वनं वा गच्छन्, न = नैव, विपद्यते = विनष्टो भवति, म्रियते इति यावत्। अत्राप्रस्तुतप्रशंसालङ्कारः। आर्यावृत्तम् ॥ १४ ॥

**विमर्श—**आत्मबलं ज्ञात्वा—संवाहक का आशय यह है कि जो व्यक्ति अपनी स्थिति को ठीक से न समझ कर भारतुल्य त्रुटियाँ कर डालता है। उसे उनका फल भोगना ही पड़ता है। तुलितम्—उन्मानार्थक √तुल् + क्त। विपद्यते --वि + पद् + श्यन् = य + लट् प्र. पु. ए. व. ॥१४॥

अर्थ—माथुर—( आँखें साफ करके, द्यूतकर से ) अरे ! दे, दे।

**द्यूतकर—**जब तक हम लोग दर्द्दुरक से लड़ रहे थे तब तक वह पुरुष ( संवाहक ) भाग गया।

**माथुर—**घूंसे के प्रहार से उस जुआरी की नाक फूट गयी थी ( अर्थात् खून निकलने लगा था )। इस लिये, चलो, खूनी रास्ते का अनुसरण करें।

( पीछे चलकर )

द्यूतकर— स्वामिन् ! वह वसन्तसेना के घर में घुस गया है।

द्वितीयोऽङ्कः । १६१

माथुरः--भूदाइं सुवण्णाइं । ( भूतानि सुवर्णानि । )

द्यूतकरः--लाअउलं गदुअ णिवेदेम्ह ? । ( राजकुलं गत्वा निवेदयावः ? )

माथुरः--एस धूत्तो अदो णिक्कमिअ अण्णत्त गमिस्सदि; ता उअरोधे-णेढव गेण्हेम्ह । ( एष धूर्त्त अतो निष्क्रम्य अन्यत्र गमिष्यति; तदुपरोधेनैव गृह्णीवः । )

( वसन्तसेना मदनिकायाः संज्ञां ददाति । )

मदनिका--कुदो अज्जो ? को वा अज्जो ? कस्स वा अज्जो ? किं वा वित्तिं अज्जो उवजीअदि ? कुदो वा भअं ? । (कुत आर्य्यः ? को वा आर्य्यः ? कस्य वा आर्य्यः ? किं वा वृत्तिम् आर्य्य उपजीवति ? कुतो वा भयम् ? )

संवाहकः-शुणादु अज्जआ । अज्जे ! पाडलिउत्ते मे जन्मभूमी, गहवइ-दालके हग्गे, संवाहअश्श वित्तिं उवजीआमि । ( शृणोतु आर्या । आर्ये ! पाटलिपुत्रं मे जन्मभूमिः, गृहपति-दारकोऽहम् । संवाहकस्य वृत्तिमुपजीवामि । )


माथुर--बहुत स्वर्ण ( मिलेंगे । )

द्यूतकर--क्या राजकुल ( पुलिस थाने में ) सूचित कर दें ?

माथुर--यह धूर्त यहां से निकल कर कहीं दूसरी जगह जायगा । अतः इसे निकलने का रास्ता घेरकर ही पकड़ें ।

( वसन्तसेना मदनिका को पूछने के लिये इशारा करती है । )

मदनिका--श्रीमन् आप कहाँ से आये हैं ? आप कौन हैं ? किसके सम्बन्धी हैं ? कौन सा व्यापार करके जीवन-यापन करते हैं ? तथा आपको किससे डर है ?

टीका--अत्र=श्लोक-प्रतिपादिताथंविषये, लक्षितः=लक्ष्यभूतः, कलहायिताः=कलहं कृतवन्तः इत्यर्थे 'शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्य करणे' ( पा. सू. ३.१.१७ ) इत्यनेन क्यङ्, ततो निष्पन्नात् नामधातोः क्त प्रत्ययः। भग्ना=विदीर्णा। रुधिरपथम्=पतितरक्तविन्दुयुक्तमार्गम्, अनुसृत्य=अनुसरणं कृत्वा । भूतानि सुवर्णानि=प्रचुराणि स्वर्णखण्डानि, मिलिष्यन्तीति शेषः । निवेदयावः=सूचयावः, अत्र काकुः । अतः=वसन्तसेनागृहात्, निष्क्रम्य=निर्गत्य, तत्=तस्मात्, उपरोधेनैव=निर्गममार्गावरोधेनैव, गृह्णीवः=धारयावः । संज्ञां ददाति=अस्य शरणागतस्य नामादिकं पृच्छेति कटाक्षेण सूचयतीत्यर्थः । कुतः=कस्मात् स्थानात् आगत इति शेषः, कस्य=कस्य सम्बन्धीतिभावः । वृत्तिम्=जीविकाम्, उपजीवति=आश्रयतीति भावः, कुतः=कस्मात् जनादिकात्, भयम्=भीतिः-इद सर्वं कथयतु इति भावः ।

अर्थ--संवाहक--आर्या ! सुनें । मेरी जन्मभूमि पटना है । मै गृहपति ( ग्रामप्रधान ) का पुत्र हूँ । संवाहक=शरीर दबाने की वृत्ति=नौकरी से जीविका चलाता हूँ ।

११ मृ०

१६२ | मृच्छकटिकम्

वसन्तसेना—सुउमारा क्खु कला सिक्खिदा अज्जेण । ( सुकुमारा खलु कला शिक्षिता आर्येण । )

संवाहकः—अज्जए ! कलेत्ति सिक्खिदा, आजीविआ दाणि संवृत्ता । ( आर्ये ! कलेति शिक्षिता, आजीविका इदानीं संवृत्ता । )

चेटो—अदिणिव्विणं अज्जेण पडिवअणं दिण्णं, तदो तदो ? ( अतिनिर्विष्णमार्येण प्रतिवचनं दत्तम् । ततस्ततः ? )

संवाहकः—तदो अज्जए ! एशे णिजगेहे आहिण्डकाणां मुहादो शुणिअ, अपुव्व-देश-दंशण-कुदूहलेण इह आगदे । इह वि मए पविशिअ उज्जइणि एक्के अज्जे शुश्शूशिदे, जे तालिशे पिअदंशणे पिअवादी, दइअ ण कित्तेदि, अवकिदं विशुमलेदि । किं बहुणा उत्तेण, दक्खिणदाए पलकेलअं विअ अत्ताणं अवगच्छदि, शलणागअवच्छले अ । ( तत आर्ये ! एष निजगृहे आहिण्डकानां मुखात् श्रुत्वा अपूर्वदेश-दर्शन-कुतूहलेन इहागतः । इहापि मया प्रविश्य उज्जयिनीम् एक आर्य्यः शुश्रूषितः, यस्तादृशः प्रियदर्शनः, प्रियवादी, दत्वा न कीर्त्तयति, अपकृतं विस्मरति । किं बहुना उक्तेन, दक्षिणतया परकीयमिव आत्मानमवगच्छति, शरणागतवत्सलश्च । )

चेटी--को दाणि अज्जआए मणोरहन्तरस्स गुणाइं चोरिअ उज्जइणिं अलंकरेदि ? । ( क इदानीमार्य्याया मनोरथान्तरस्य गुणान् चोरयित्वा उज्जयिनीमलङ्करोति ? )


वसन्तसेना—श्रीमन् ने बहुत कोमल कला सीखी है ।

संवाहक—आर्ये ! कला मान कर सीखी थी, किन्तु इस समय जीविका-साधन बन गयी है ।

चेटी—आपने बहुत ही दुःखपूर्वक उत्तर दिया है । इसके बाद ?

संवाहक—आर्ये ! इसके बाद, अपने घर पर आने वाले भ्रमणप्रिय लोगों के मुख से सुनकर इस अपूर्व ( अद्भुत ) नगरी को देखने की इच्छा से मैं यहाँ आया । यहाँ भी उज्जैन नगरी में प्रवेश करके मैंने एक आर्य=महापुरुष की सेवा ( नौकरी ) की, जो इतने सुन्दर, प्रियवक्ता, कि ( किसी को कुछ भी ) दान करके उसके बारे में प्रचार नहीं करते हैं, अपकार को भूल जाने वाले हैं । ( किसी से बदला लेने वाले नहीं है ।) अधिक कहने से क्या लाभ ? अत्यधिक उदार होने के कारण वे अपने को भी ( आत्मा को भी ) दूसरे का सा समझते हैं ( अर्थात् स्वार्थपरता का पूर्ण अभाव है ) और शरण में आने वालों की स्नेह से रक्षा करने वाले हैं ।

चेटी--आर्या ( वसन्तसेना ) के मनोभिलषित ( चारुदत्त ) के गुणों को चुरा कर इस समय कौन उज्जैन नगरी को सुशोभित कर रहा है ?

द्वितीयोऽङ्कः १६३

वसन्तसेना—साहु, हञ्जे ! साहु ! मए वि एव्वं ज्जेव हिअएण मन्तिदं ।
( साधु हञ्जे ! साधु । मयापि एवमेव हृदयेन मन्त्रितम् । )
चेटो—अज्ज ! तदो तदो ? ( आर्य्य ! ततस्ततः ? )
संवाहकः—अज्जए ! शे दाणि अणुकक्रोशकिदेहिं पदाणेहिं...... !
( आर्ये ! स इदानीमनुक्रोशकृतैः प्रदानैः...... ! )
वसन्तसेना—किं उवरदविहवो संवृत्तो ? ( किमुपरतविभवः संवृत्तः ? )
संवाहकः—अणाजक्खिदे ज्जेव कहं अज्जआए विण्णादं ? । ( अनाख्यात-
मेव कथमार्यया विज्ञातम् ? )
वसन्तसेना—किं एत्थ जाणीअदि । दुल्लहा गुणा विहवा अ । अपेएसु
तडाएसु बहुदरं उदअं भोदि ।
( किमत्र ज्ञायते । दुर्लभा गुणा विभवाश्च ।
आपेयेषु तडागेषु बहुतरमुदकं भवति । )
चेटी—अज्ज ! किंणामधेओ क्खु सो ? । ( आर्य ! किंनामधेयः खलु सः ? )


वसन्तसेना—वाह दासी ! वाह । मैंने भी मन में ऐसा ही सोचा ।

**टीका—पाटलिपुत्रम्=**एतन्नामकं स्थानम्, **गृहपतिदारकः=**गृहपतिर्ग्रामाध्यक्षः इति पृथ्वीधरः, तस्य ग्रामाध्यक्षस्य पुत्रः, **संवाहकस्य=**संवाहयति=मर्दयति-इति संवाहकः = शरीरयन्त्रमर्दकः तस्य, **सुकुमारा=**अतीवकोमला, **कला=**विद्या, **आजीविका=**आजीवयतीति, जीवनपालनसाधनम्, **अतिनिर्विण्णम्=**अति=अत्यधिकम्, **निर्विण्णः=**खेदो यस्मिन् तत् महाखेदयुतम्, **आहिण्डकानाम्=**स्वगृहपर्यटकानां जनानाम्, विभिन्नस्थानावलोकनार्थं भ्रमणप्रियाणां वा, **अपूर्वस्य=**अद्भुतस्य, **देशस्य=**नगरस्य, **दर्शनस्य=**अवलोकनस्य, **कुतूहलेन=**औत्सुक्येन, **इह=**अत्र उज्जयिन्याम्, **एकः=**पूज्यत्वात् अगृहीतनामा, **प्रियदर्शनः=**सुरूपः, **कीर्त्तयति=**प्रचारयति, **अपकृतम्=**अपकारम्, **दक्षिणतया=**उदारतया, **परकीयमिव=**अन्यदीयमिव, **शरणागतानाम्=**रक्षार्थमाश्रितानाम् **वत्सलः=**अनुरागी, **मनोरथान्तरस्य=**मनोरथस्यान्तरः, तस्य, मनोरथाभिमुखस्येत्यर्थः, **अलङ्करोति=**विभूषयतीत्यत्र काकुः, **मन्त्रितम्=**चिन्तितम् ।।

अर्थ--चेटी--आर्य ! इसके बाद ?

संवाहक--आर्ये ! वे इस समय करुणावश किये गये दानों के कारण...... ।

वसन्तसेना--क्या निर्धन हो गये ?

संवाहक--बिना कहे हुये ही आप कैसे समझ गयीं ?

वसन्तसेना--इसमें जानना क्या ? सद्गुणों और धन का ( एक व्यक्ति में ) मिलना कठिन है । जिनका पानी नहीं पीने योग्य=अपेय होता है उन्हीं तालाबों में खूब पानी रहता है ।

चेटी--आर्य ! उन महानुभाव का नाम क्या है ?

१६४ | मृच्छकटिकम्

संवाहकः—अज्जे ! के दाणिं तस्स भूतल-मिअंकस्स णामं ण जाणादि । शो क्खु सेट्ठिचत्तले पडिवशदि शलाहणिज्जणामधेए अज्जचालुदत्ते णाम । ( आर्ये ! क इदानीं तस्य भूतलम्गाङ्कस्य नाम न जानाति । स खलु श्रेष्ठिचत्वरे प्रतिवसति श्लाघनीयनामधेय आर्यचारुदत्तो नाम । )

वसन्तसेना—(सहर्षमासनादवतीर्य) अज्जस्स अत्तणकेरकं एदं गेहं ! हञ्जे ! देहि अस्स आसणं, तालवेण्ठअं गेण्ह । परिस्समो अज्जस्स बाधेदि । ( आर्यस्य आत्मीयमेतद्गेहम् । हञ्जे ! देहि अस्य आसनम्, तालवृन्तकं गृहाण, परिश्रम आर्यस्य बाधते । )

संवाहक—आर्ये ! पृथ्वीतल के चन्द्रमा उनका नाम कौन नहीं जानता है । (अर्थात् चन्द्रतुल्य सुख देने वाले चारुदत्त के नाम से सभी परिचित हैं।) वे सेठों (धनिकों) के चौक (बस्ती) में रहते हैं। प्रशंसनीय नामवाले वे पूज्य चारुदत्त जी हैं।

टीकाअनुक्रोशकृतैः=अनुक्रोशः=करुणा, तया सम्पादितैः, करुणाऽर्द्रतया विहितैरिति भावः, प्रदानैः=विपुलदानैः, उपरतविभवः=उपरतः=समाप्तः विभवः=धनादिकं यस्य सः निर्धन इत्यर्थः, अषाख्यातमेव=अकथितमेव, अत्र=अस्मिन् विषये, दुर्लभाः=एकस्मिन् पुरुषे सद्गुणानां धनादीनां च स्थितिर्दुष्प्राप्येति भावः, अपेयेषु=दूषणतया पातुमयोग्येषु, तडागेषु=जलाशयेषु, बहुतरम्=अत्यधिकम्, उदकम्=जलम्, भूतलम्गाङ्कस्य=मृगः छाया अङ्के यस्य सः मृगाङ्कः, भूतलस्य=पृथिव्याः चन्द्र इत्यर्थः, श्लाघनीयम्=प्रशंसनीयं नामधेयं यस्य सः, चारु=सुन्दर यथा स्यात् दत्तं येन सः चारुदत्तः इत्यन्वर्थकनामा महापुरुषो वर्तते ।

विमर्शअनुक्रोशकृतैः प्रदानैं...... । अनुक्रोश-करुणा, करुणावश किये गये अनवरत दानों से—यह बहुवचन साभिप्राय है। दुर्लभा गुणा विभवाश्च—संसार में गुणवान् अपने सद्गुणों के कारण नश्वर धन का संग्रह नहीं करते हैं। धन सदैव उसी के पास रहता है जो कंजूस है। भूतलम्गाङ्कस्य—पृथ्वी के चन्द्रमा । चन्द्रमा जिस प्रकार सभी को सुख देना है उसी प्रकार ये भी सभी को सुख देने वाले ही हैं। दूसरे की सुखचिन्ता ही प्रधान मानने वाले । श्लाघनीय-नामधेयः=जिनका नाम प्रशंसा करने योग्य, चारुदत्तः—चारु=अच्छा, सन्तोष-जनक, दत्त=दान है जिनका, अर्थात् जो सभी को सन्तुष्ट करने लायक दान देने वाले अन्वर्थक नाम वाले-चारुदत्त हैं।

वसन्तसेना—(प्रसन्नता के साथ अपने आसन से उतर कर) आर्य ! यह आपका अपना ही घर है। दासी ! इन्हें बैठने के लिये आसन दो । पंखा लो (इन पर हवा करो ।) आर्य ! आपको थकावट कष्ट दे रही है। (अतः आराम कर लो।)

द्वितीयोऽङ्कः १६५

( चेटी तथा करोति )

संवाहकः—(स्वगतम्) कथं अज्जचारुदत्तस्स णामशङ्कोत्तणेण ईदिशे मे आदले । शाहु, अज्जचारुदत्त ! शाहु, पुहवीए तुमं एक्के जीवशि शेशे उण जणे शशदि । ( इति पादयोर्निपत्य ) भोदु, अज्जए ! भोदु । आशणे णिशीददु अज्जआ ! ( कथम् आर्यचारुदत्तस्य नामसङ्कीर्त्तनेन ईदृशो मे आदरः । साधु, आर्यचारुदत्त ! साधु, पृथिव्यां त्वमेको जीवसि; शेषः पुनर्जनः श्वसिति । भवतु, आर्ये ! भवतु, आसने निषीदतु आर्या । )

वसन्तसेना—( आसने समुपविश्य ) अज्ज ! कुदो सो घणिओ ? ( आर्ये ! कुतः स धनिकः ? )


( चेटी उसी प्रकार करती है ।)

संवाहक—( अपने आप ) आर्य चारुदत्त का नाम ले लेने से ही मेरा इतना आदर क्यों ? धन्य हो आर्य चारुदत्त ! धन्य हो । इस पृथिवी पर अकेला तुम्हारा ही जीना सफल है और दूसरे लोग तो सांसें भर रहे हैं । ( इस प्रकार वसन्तसेना के पैरों पर गिर कर ) बहुत हो गया आर्ये ! बहुत हो-गया ( बस करें ), अब आप अपने आसन पर बैठ जाँय ।

वसन्तसेना—( आसन पर बैठ कर ) आर्य ! वे धनी कैसे रह सकते ? ( अर्थात् दानी चारुदत्त का धनी रह सकना सम्भव ही नहीं है ।)

**टीका—**आत्मीयम्=स्वकीयमेवेत्यर्थः । अस्य=अस्मै, आर्यस्य=श्रीमन्तः, कर्म-त्वाविवक्षायां षष्ठी, ईदृशः=वसन्तसेनाऽपि सत्कारलग्ना जातेति भावः, जीवसि=सफलं जीवनं धारयसि, श्वसिति=चर्मभस्त्रावत् केवलं श्वासोच्छ्वासं करोति, निषीदतु=तिष्ठतु । आर्ये ! कुतः स धनिकः ? सस्तादृशो दानी केन प्रकारेण धनी भवितुमर्हति, अतस्तस्य महानुभावस्य दरिद्रत्वं निश्चितमिति भावः । केचन 'कुतः सः धनिकः' इत्यस्येयं व्याख्यां कुर्वन्ति 'कस्मात् स्थानात् कारणाद् वा स धनिकः त्वां पीडयति'—परन्तु उत्तरवाक्यैरसङ्गत्या नेदं युज्यते, उत्तरे चारुदत्तस्यैव यशो-वर्णनादिति तत्त्वम् ।

**विमर्शः—**आत्मीयम्--वसन्तसेना ने जब संवाहक को चारुदत्त का सेवक समझ लिया तो उसका स्नेह उमड़ पड़ा । और वह अपने घर को उसी का घर मानने के लिये कहने लगी, अतः भय का कोई कारण नहीं है । 'आर्ये ! कुतः स धनिकः ?' इसका प्रसंगानुकूल यही अर्थ है-आर्य, अत्यन्त दानी होने से आर्य चारुदत्त धनी कैसे रह सकते हैं ।' कुछ लोगों ने 'वह पकड़ने वाला धनिक कहाँ से आ रहा है' यह अर्थ किया है । परन्तु आगे के श्लोक में पुनः चारुदत्त की हीं प्रशंसा करने के कारण यहाँ भी 'धनिकः' का सम्बन्ध चारुदत्त से ही करना तर्क-संगत है ।

१६६ | मृच्छकटिकम्

संवाहकः- शक्कालधणे खु सज्जणे काह ण होइ चलाचले धणे ? । जे पूइदं पि जाणादि शे पूआविशेर्श पि जाणादि ॥ १५ ॥ ( सत्कारधनः खलु सज्जनः कस्य न भवति चलाचलं धनम् । यः पूजयितुमपि जानाति स पूजाविशेषमपि जानाति ॥ १५ ॥)


अन्वयः—सज्जनः, सत्कारधनः, खलु, ( भवति ), कस्य, धनम्, चलाचलम्, न, भवति ? यः पूजयितुम्, अपि, न, जानाति, सः, पूजाविशेषम्, अपि जानाति ? ( न जानातीति भावः ) ॥ १५ ॥

शब्दार्थसज्जनः=सत्पुरुष, सत्कारधनः=दूसरों का सत्काररूपी धनवाला, खलु=निश्चित रूप से, भवति=होता है, (अर्थात् उसका धन है दूसरों का सत्कार करना), कस्य=किसका, धनम्=धन, चलाचलम्=चञ्चल, =नहीं, भवति ?=होता है ? अर्थात् अवश्य होता है; यः=जो व्यक्ति, पूजयितुम्=सामान्यरूप से, पूजा=सम्मान करना, अपि=भी, =नहीं, जानाति=जानता है, सः=वह व्यक्ति, पूजाविशेषम्=सम्मान के प्रकारविशेष को भी, जानाति ? = क्या जानता है ? अर्थात् नहीं जानता है ॥ १५ ॥

अर्थसंवाहक—दूसरों का सत्कार करना ही सज्जन व्यक्ति का धन होता है । किसका धन अस्थिर=विनाशी नहीं है ? अर्थात् सभी का धन नश्वर होता है । जो व्यक्ति सामान्य सम्मान करना भी नहीं जानता है वह क्या सम्मान के विशेष प्रकार को जानता है ? अर्थात् नहीं जानता है ॥ १५ ॥

टीकासज्जनः=सत्पुरुषः, सत्कारधनः=परेषां सत्कारः=सम्मानमेव धनं यस्य सः, खलु=निश्चयेन, भवति, कस्य जनस्य, धनम्=लक्ष्मीः, चलाचलम्=अत्यन्तं चञ्चलमस्थिरम् न भवति=नैव वर्तते, अर्थात् सर्वस्यापि धनं कदाचित् नश्यति एव । सज्जनत्वं धनमूलकं नैव भवति, अपि तु गुणमूलकमेवेति भावः । यः=पुरुषः, पूजयितुम्=सामान्यतया सभाजयितुं सत्कर्तुम्, =नैव, जानाति=वेत्ति, सः=तादृशो जनः, पूजाविशेषम्=पूजायाः=सम्मानस्य, विशेषम्=प्रकारभेदम्, अपि जानाति किम् ? अर्थात् नैव जानातीति भावः, विशेषज्ञानस्य सामान्यज्ञानपूर्वकत्वनियमादिति भावः । अत्राप्रस्तुतप्रशंसालङ्कारः । मात्रासमकं वृत्तम् ॥ १५ ॥

विमर्शसत्कारधनः—सज्जन व्यक्ति की धनवत्ता लक्ष्मी से नहीं होती है अपितु दूसरों का सत्कार करने से । इसलिये सज्जनत्व को धनमूलक न समझकर गुणमूलक ही समझना चाहिये । अतः चारुदत्त निर्धन नहीं है क्योंकि वह अभी भी दूसरों का पूर्ण सम्मान करता है । पूजाविशेषमपि जानाति—जिस व्यक्ति को सम्मान करने का साधारण रूप भी नहीं मालूम रहता है वह विशेषरीति से सम्मान करना किसी भी प्रकार नहीं जान सकता है । क्योंकि सामान्यज्ञान के बाद ही

द्वितीयोऽङ्कः १६७

वसन्तसेना--तदो तदो ? । ( ततस्ततः ? )

संवाहकः--तदो, तेण अज्जेण शंवित्ती पलिचालके किदोम्हि । चालित्तावसेसे अ तस्सिं जूदोवजीवि म्हि शंबुत्ते । तदो, भाअधेअविस-मदाए दश शुवण्णं जूदे हालिदं । ( ततः तेन आर्येण संवृत्तिः परिचारकः कृतोऽस्मि । चारित्र्यावशेषे च तस्मिन् द्यूतोपजीवी अस्मि संवृत्तः । ततो भागधेय-विषमतया दशसुवर्णं द्यूते हारितम् । )

माथुरः--उच्छादिदो म्हि । मुसिदो म्हि । (उत्साहितोऽस्मि मुषितोऽस्मि ।)

संवाहकः--एदे दे शहिअ-जूदिअरा मं अणुशंधअन्ति । शंपदं शुणिअ अज्जआ पमाणं । ( एतौ तौ सभिकद्यूतकरौ मामनुसन्धत्तः । साम्प्रतं श्रुत्वा आर्या प्रमाणम् । )

वसन्तसेना --- मदणिए ! वास-पादव-विशण्ठुलदाए पक्खिणो इदो तदो वि आहिण्डन्ति । हज्जे ! ता गच्छ, एदाणं सहिअजूदिअराणं 'अअं अज्जो ज्जेव पडिवादेदि' त्ति इमं हत्थाभरणं तुमं देहि । ( मदनिके ! वास-पादप-विसंष्ठुलतया पक्षिण इतस्ततोऽपि आहिण्डन्ते । हञ्जे ! तद् गच्छ, एतयोः सभिक-द्यूतकरयोः, 'अयमार्य एव प्रतिपादयति' इति इदं हस्ताभरणं त्वं देहि । ) [ इति हस्तात् कटकमाकृष्य चेट्याः प्रयच्छति । ]


विशेष ज्ञान सम्भव है । यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार है । मात्रासमक वैतालीय छन्द है । इसका लक्षण -

षड् विषमेऽष्टौ समे कलास्ताश्च समे स्युर्नो निरन्तराः ।
न समाऽत्र पराश्रिता कला, वैतालीयेऽन्ते रलौ गुरु ॥ १५ ॥

अर्थ--वसन्तसेना--इसके बाद ?

संवाहक--इसके बाद उन महानुभाव ने समुचित वेतन पर मुझे नौकर बना लिया । कुछ समय बाद उनकी केवल सच्चरिता ही बच पायी थी, धन नष्ट हो गया था, अर्थात् जब वे निर्धन बन गये तब मैं जुआरी बन गया । इसके बाद दुर्भाग्य से जुये में दश स्वर्ण ( सिक्के ) हार गया ।

माथुर--मेरा नाश हो गया, मैं लुट गया ।

संवाहक--ये सभिक ( द्यूतक्रीडाध्यक्ष ) और जुआरी मुझे खोज रहे हैं । अब इसको सुनकर आर्या जो उचित समझें, करें ।

वसन्तसेना--मदनिके ! ( आश्रय = बसेरा वाले ) वास-वृक्ष के सूख जाने पर या हिल जाने पर पक्षीगण इधर-उधर भी भटकने लगते हैं । दासी ! जाओ, 'आर्य संवाहक ही दे रहें हैं' ऐसा कहकर सभिक ( द्यूतक्रीडाध्यक्ष ) और जुआरी को यह हाथ का आभूषण ( कंगन ) तुम दे दो । ( ऐसा कहकर हाथ से उतार कर कंगन दासी को देती है । )