भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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द्वितीयोऽङ्कः १६७

वसन्तसेना--तदो तदो ? । ( ततस्ततः ? )

संवाहकः--तदो, तेण अज्जेण शंवित्ती पलिचालके किदोम्हि । चालित्तावसेसे अ तस्सिं जूदोवजीवि म्हि शंबुत्ते । तदो, भाअधेअविस-मदाए दश शुवण्णं जूदे हालिदं । ( ततः तेन आर्येण संवृत्तिः परिचारकः कृतोऽस्मि । चारित्र्यावशेषे च तस्मिन् द्यूतोपजीवी अस्मि संवृत्तः । ततो भागधेय-विषमतया दशसुवर्णं द्यूते हारितम् । )

माथुरः--उच्छादिदो म्हि । मुसिदो म्हि । (उत्साहितोऽस्मि मुषितोऽस्मि ।)

संवाहकः--एदे दे शहिअ-जूदिअरा मं अणुशंधअन्ति । शंपदं शुणिअ अज्जआ पमाणं । ( एतौ तौ सभिकद्यूतकरौ मामनुसन्धत्तः । साम्प्रतं श्रुत्वा आर्या प्रमाणम् । )

वसन्तसेना --- मदणिए ! वास-पादव-विशण्ठुलदाए पक्खिणो इदो तदो वि आहिण्डन्ति । हज्जे ! ता गच्छ, एदाणं सहिअजूदिअराणं 'अअं अज्जो ज्जेव पडिवादेदि' त्ति इमं हत्थाभरणं तुमं देहि । ( मदनिके ! वास-पादप-विसंष्ठुलतया पक्षिण इतस्ततोऽपि आहिण्डन्ते । हञ्जे ! तद् गच्छ, एतयोः सभिक-द्यूतकरयोः, 'अयमार्य एव प्रतिपादयति' इति इदं हस्ताभरणं त्वं देहि । ) [ इति हस्तात् कटकमाकृष्य चेट्याः प्रयच्छति । ]


विशेष ज्ञान सम्भव है । यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार है । मात्रासमक वैतालीय छन्द है । इसका लक्षण -

षड् विषमेऽष्टौ समे कलास्ताश्च समे स्युर्नो निरन्तराः ।
न समाऽत्र पराश्रिता कला, वैतालीयेऽन्ते रलौ गुरु ॥ १५ ॥

अर्थ--वसन्तसेना--इसके बाद ?

संवाहक--इसके बाद उन महानुभाव ने समुचित वेतन पर मुझे नौकर बना लिया । कुछ समय बाद उनकी केवल सच्चरिता ही बच पायी थी, धन नष्ट हो गया था, अर्थात् जब वे निर्धन बन गये तब मैं जुआरी बन गया । इसके बाद दुर्भाग्य से जुये में दश स्वर्ण ( सिक्के ) हार गया ।

माथुर--मेरा नाश हो गया, मैं लुट गया ।

संवाहक--ये सभिक ( द्यूतक्रीडाध्यक्ष ) और जुआरी मुझे खोज रहे हैं । अब इसको सुनकर आर्या जो उचित समझें, करें ।

वसन्तसेना--मदनिके ! ( आश्रय = बसेरा वाले ) वास-वृक्ष के सूख जाने पर या हिल जाने पर पक्षीगण इधर-उधर भी भटकने लगते हैं । दासी ! जाओ, 'आर्य संवाहक ही दे रहें हैं' ऐसा कहकर सभिक ( द्यूतक्रीडाध्यक्ष ) और जुआरी को यह हाथ का आभूषण ( कंगन ) तुम दे दो । ( ऐसा कहकर हाथ से उतार कर कंगन दासी को देती है । )

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