भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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मृच्छकटिकम्

चेटी--( गृहीत्वा ) जं अज्जआ आणवेदि । ( यदार्या आज्ञापयति । )

(इति निष्क्रान्ता ।)

**माथुरः--**उच्छादिदो म्हि, मुसिदो म्हि । (उत्सादितोऽस्मि, मुषितोऽस्मि ।)

चेटी-जधा एदे उद्धं पेक्खन्ति, दीहं णीससन्ति, विसूरअन्ति अहिलहन्ति अ दुआर-णिहिद--लोअणा; तधा तक्केमि--एदे दे सहिअजूदिअरा हुविस्सन्ति । ( उपगम्य ) अज्ज ! वन्दामि । ( यथा एतौ ऊर्ध्वं प्रेक्षेते, दीर्घं निश्वसितः, विचारयतः अभिलपतश्च द्वारनिहितलोचनौ, तथा तर्कयामि-एतौ तौ सभिकद्यूतकरौ भविष्यतः । आर्य ! वन्दे । )

माथुरः सुहं तुए होदु । ( सुखं तव भवतु । )

**चेटी--**अज्ज ! कदमो तुम्हाणं सहिओ ? । ( आर्य ! कतरो युवयोः सभिकः ? )

माथुः--

कस्स तुमं तणुमज्झे ! अहरेण रद-दट्ठ-दुव्विणीदेण ।
जप्पसि मणहल-वअणं आलोअन्ती कडकखेण ॥ १६ ॥


चेटी--( लेकर ) आप की जैसी आज्ञा । ( इस प्रकार निकल जाती है । )

**टीका--**उत्सादितः=उत्सन्नताम्=विनाशतां प्रापितः, मुषितः=दशस्वर्णानि अपहृत्य पलायितेन संवाहकेन चोरितः, वञ्चितः इति भावः, अनुसन्धत्तः=अन्वेषयन्तौ अनुसरत:, प्रमाणम्=निर्णयकर्त्री, वासपादपविसंठुलतया=अस्थिरतया शुष्कतयेति भावार्थः, आहिण्डन्ते=भ्राम्यन्ति, प्रतिपादयति=ददाति ।

**अर्थ--माथुर--**मैं मार डाला गया, मैं लूट लिया गया ।

**चेटी--**चूंकि ये दोनों ऊपर देख रहे हैं, लम्बी सांसें ( आहें ) ले रहे हैं, विचार कर रहे हैं, ) दरवाजे की ओर आंखें गड़ाये हुये ( देखते हुये ) आपस में बातचीत कर रहे हैं । इसलिये मैं सोच रही हूँ कि ये दोनों सभिक और जुआरी ही होंगे । ( पास जाकर ) आर्य ! प्रणाम करती हूँ ।

**माथुर--**तुम्हें सुख मिले, ( खुश रहो । )

**चेटी--**आर्य ! आप दोनों में सभिक ( द्यूतक्रीडाध्यक्ष ) कौन है ?

**अन्वयः--**तनुमध्ये ! कटाक्षेण, आलोकयन्ती, त्वम्, रतदष्ट-दुर्विनीतेन, अधरेण, मनोहरवचनम्, कस्य, जल्पसि ? ॥ १६ ॥

**शब्दार्थ--**तनुमध्ये ! = हे पतली कमरवाली सुन्दरि, कटाक्षेण=तिरछी नजर से, आलोकयन्ती=देखती हुई, त्वम्=तुम, रतदष्टदुर्विनीतेन=संभोगकाल में काटे गये और चञ्चल, अधरेण=होंठ से, मनोहरवचनम्=मीठी-मीठी बातें, कस्य=किससे, जल्पसि=कर रही हो ? ॥ १६ ॥

**अर्थ--**हे पतली कमरवाली सुन्दरि ! तिरछी नजर से देखती हुई तुम

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