मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| द्वितीयोऽङ्कः | १६६ |
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( कस्य त्वं तनुमध्ये ! अधरेण रत-दष्टदुर्विनीतेन ।
जल्पसि मनोहरवचनमालोकयन्ती कटाक्षेण ।। १६ ।। )
णत्थि मम विहवो, अण्णत्त व्वज । ( नास्ति मम विभवः, अन्यत्र व्रज ! )
**चेटी--**जइ ईदिसाइं ण मन्तेसि, ता ण होसि जूदिअरो । अत्थि को वि तुम्हाणं धारओ ? ( यदि ईदृशानि ननु मन्त्रयसि, तदा न भवसि द्यूतकरः । अस्ति कोऽपि युष्माकं धारकः ? )
माथुरः- अत्थि, दशसुवण्णं धालेदि । किं तस्य ? । ( अस्ति, दशसुवर्णं धारयति । किं तस्य ? )
**चेटी-**तस्स कारणादो अज्जआ इमं हत्थाभरणं पडिवादेदि । ण हि
सम्भोग काल में काटे गये और चञ्चल ओष्ठ से मन को खुश करने वाली बातें किससे कर रही हो ? ।। १६ ।।
मेरे पास धन नहीं है । किसी दूसरे के पास जाओ ?
**टीका--**तनुमध्ये=तनु=क्षामम्, मध्यम्=उदयं कटिप्रदेश इति यावत्, यस्या-स्तत्सम्बुद्धौ, कृशोदरि ! इत्यर्थः, कटाक्षेण = वक्रदृष्ट्या, आलोकयन्ती=पश्यन्ती, त्वम्=चेटी, रतदष्टदुर्विनीतेन=रते=सम्भोगे दष्टः=कृतन्तक्षतः, दुर्विनीतश्च=अत्यन्तचञ्चलश्च यस्तेन, तादृशेन, अधरेण=निम्नोष्ठेन, मनोहरम्=मधुरम्, चित्ता-कर्षकम्, कस्य=कम् सम्बन्धविवक्षायां षष्ठी, जल्पसि=वदसि ? तवायं भ्रमः यत् आवां धनिकावागतः । अतोऽन्यं कञ्चन धनिकं गत्वा मधुरवचनैराकर्षयेति भावः । आर्या वृत्तम् ।। १६ ।।
**विमर्श--**रतदष्टदुर्विनीतेन-रत=संभाग में, दष्ट- √दंश + क्त काटे गये, और दुर्विनीत धृष्ट, लाक्षणिकार्थ है--अत्यन्त चञ्चल । कस्य-इसका भाव कुछ विद्वानों ने 'असि' जोड़ कर किया है - कस्य दासी असि ?' किसकी सेविका हो ? परन्तु इसमें अध्याहार करने आदि की अपेक्षा कर्मत्व की अविवक्षा करके सम्बन्ध-सामान्य में षष्ठी मानकर-कस्य जल्पसि ? किससे बातें कर रही हो ? यह अर्थ करना अधिक तर्कसंगत है । इसमें आर्या छन्द है । लक्षण--
यस्याः प्रथमे पादे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेपि ।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश साऽऽर्या ।। १६ ।।
**अर्थ--चेटी--**यदि इस प्रकार की बातें कर रहे हो तो जुआरी नहीं हो सकते । क्या तुम्हारा कोई कर्जदार भी है ?
**माथुर--**है, दश स्वर्ण (खण्ड या सिक्के) उस पर उधार हैं । उसका क्या ?
**चेटी--**उसी के कारण आर्या ( वसन्तसेना ) ने यह हाथ का गहना दिया