भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१७० | मृच्छकटिकम्

ण हि, सो ज्जेव पड़िवादेदि । ( तस्य कारणात् आर्या इदं हस्ताभरणं प्रतिपादयति । नहि नहि, स एव प्रतिपादयति । )

माथुरः---( सहर्षं गृहीत्वा ) अरे ! भणेशि तं कुलपुत्तं--'भूदं तुए गण्डे । आअच्छ, पुणो जूदं रमअ ।' (अरे ! भणिष्यसि तं कुलपुत्रम्--'भूतस्तव गण्डः, आगच्छ पुनर्द्यूतं रमय ।)

(इति निष्क्रान्तौ ।)

चेटी---( वसन्तसेनामुपसृत्य ) अज्जए ! पडितुट्ठा गदा सहिअजूदिअरा। ( आर्ये ! परितुष्टौ गतौ सभिक-द्यूतकरौ । )

वसन्तसेना---ता गच्छदु, अज्ज बन्धुअणो समस्ससदु । ( तद्गच्छतु, अद्य बन्धुजनः समाश्वसितु । )

संवाहकः---अज्जए ! जइ एव्वं, ता इअं कला पलिअणहत्थगदा कलीअदु । ( आर्ये ! यद्येवम्, तदियं कला परिजनहस्तगता क्रियताम् । )

वसन्तसेना---अज्ज ! जस्स कारणादो इअं कला सिक्खीअदि, सो ज्जेव अज्जेण सुस्सूसिद-पुरुव्वो सुस्सूसिदव्वो । ( आर्य ! यस्य कारणादियं कला शिक्ष्यते, स एव आर्येण शुश्रूषितपूर्वः शुश्रूषितव्यः । )


है। नहीं, नहीं, उसी ने दिया है।

माथुर---( बड़ी खुशी से लेकर ) अरी, उस कुलीन व्यक्ति से कह देना--'तुम्हारा वादा पूरा हो गया, आओ फिर से जुआ खेलो।'

( यह कह कर दोनों निकल जाते हैं । )

चेटी---( वसन्तसेना के पास जाकर ) आर्ये ! सभिक और जुआरी दोनों सन्तुष्ट होकर चले गये ।

वसन्तसेना---तो आप भी जायें, आज आपके बन्धु लोग समाश्वस्त ( निश्चिन्त ) हो जायें ।

संवाहक---आर्ये ! यदि ऐसा है तो यह कला अपनी नौकरानी को ( मेरे द्वारा ) सिखलवा दें । ( अथवा मुझ नौकर को अपनी सेवा का अवसर दें । )

वसन्तसेना---आर्य ! जिसके कारण यह कला सीखी, श्रीमान् जी उस पूर्व सेवित ( चारुदत्त ) की ही सेवा करो ।

टीका---धारकः=अधमर्णः, प्रतिपादयति=ददाति, गण्डः=पुनर्दानाय वाचिको निश्चयः, परितुष्टौ=सन्तुष्टौ समाश्वसितु=समाश्वस्तो भवतु, परिजनहस्तगता=स्वकीयकिंकरहस्तगता शिक्षिता क्रियतामित्यर्थः यद्वा मद्रूपपरिजनहस्तगता=पुनः तत्कलायां प्रवृत्तो स्यामिति अनुग्रहः क्रियताम्, पूर्वं शुश्रूषित=सेवितः शुश्रूषितव्यः=सेवितव्यः, 'न तु निर्धनतया तं परित्यज्यान्यो जनः सेवितव्य इति भावः ।