मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ | मृच्छकटिकम्
संवाहकः- शक्कालधणे खु सज्जणे काह ण होइ चलाचले धणे ? । जे पूइदं पि जाणादि शे पूआविशेर्श पि जाणादि ॥ १५ ॥ ( सत्कारधनः खलु सज्जनः कस्य न भवति चलाचलं धनम् । यः पूजयितुमपि जानाति स पूजाविशेषमपि जानाति ॥ १५ ॥)
अन्वयः—सज्जनः, सत्कारधनः, खलु, ( भवति ), कस्य, धनम्, चलाचलम्, न, भवति ? यः पूजयितुम्, अपि, न, जानाति, सः, पूजाविशेषम्, अपि जानाति ? ( न जानातीति भावः ) ॥ १५ ॥
शब्दार्थ—सज्जनः=सत्पुरुष, सत्कारधनः=दूसरों का सत्काररूपी धनवाला, खलु=निश्चित रूप से, भवति=होता है, (अर्थात् उसका धन है दूसरों का सत्कार करना), कस्य=किसका, धनम्=धन, चलाचलम्=चञ्चल, न=नहीं, भवति ?=होता है ? अर्थात् अवश्य होता है; यः=जो व्यक्ति, पूजयितुम्=सामान्यरूप से, पूजा=सम्मान करना, अपि=भी, न=नहीं, जानाति=जानता है, सः=वह व्यक्ति, पूजाविशेषम्=सम्मान के प्रकारविशेष को भी, जानाति ? = क्या जानता है ? अर्थात् नहीं जानता है ॥ १५ ॥
अर्थ—संवाहक—दूसरों का सत्कार करना ही सज्जन व्यक्ति का धन होता है । किसका धन अस्थिर=विनाशी नहीं है ? अर्थात् सभी का धन नश्वर होता है । जो व्यक्ति सामान्य सम्मान करना भी नहीं जानता है वह क्या सम्मान के विशेष प्रकार को जानता है ? अर्थात् नहीं जानता है ॥ १५ ॥
टीका—सज्जनः=सत्पुरुषः, सत्कारधनः=परेषां सत्कारः=सम्मानमेव धनं यस्य सः, खलु=निश्चयेन, भवति, कस्य जनस्य, धनम्=लक्ष्मीः, चलाचलम्=अत्यन्तं चञ्चलमस्थिरम् न भवति=नैव वर्तते, अर्थात् सर्वस्यापि धनं कदाचित् नश्यति एव । सज्जनत्वं धनमूलकं नैव भवति, अपि तु गुणमूलकमेवेति भावः । यः=पुरुषः, पूजयितुम्=सामान्यतया सभाजयितुं सत्कर्तुम्, न=नैव, जानाति=वेत्ति, सः=तादृशो जनः, पूजाविशेषम्=पूजायाः=सम्मानस्य, विशेषम्=प्रकारभेदम्, अपि जानाति किम् ? अर्थात् नैव जानातीति भावः, विशेषज्ञानस्य सामान्यज्ञानपूर्वकत्वनियमादिति भावः । अत्राप्रस्तुतप्रशंसालङ्कारः । मात्रासमकं वृत्तम् ॥ १५ ॥
विमर्श—सत्कारधनः—सज्जन व्यक्ति की धनवत्ता लक्ष्मी से नहीं होती है अपितु दूसरों का सत्कार करने से । इसलिये सज्जनत्व को धनमूलक न समझकर गुणमूलक ही समझना चाहिये । अतः चारुदत्त निर्धन नहीं है क्योंकि वह अभी भी दूसरों का पूर्ण सम्मान करता है । पूजाविशेषमपि जानाति—जिस व्यक्ति को सम्मान करने का साधारण रूप भी नहीं मालूम रहता है वह विशेषरीति से सम्मान करना किसी भी प्रकार नहीं जान सकता है । क्योंकि सामान्यज्ञान के बाद ही