मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽङ्कः १६५
( चेटी तथा करोति )
संवाहकः—(स्वगतम्) कथं अज्जचारुदत्तस्स णामशङ्कोत्तणेण ईदिशे मे आदले । शाहु, अज्जचारुदत्त ! शाहु, पुहवीए तुमं एक्के जीवशि शेशे उण जणे शशदि । ( इति पादयोर्निपत्य ) भोदु, अज्जए ! भोदु । आशणे णिशीददु अज्जआ ! ( कथम् आर्यचारुदत्तस्य नामसङ्कीर्त्तनेन ईदृशो मे आदरः । साधु, आर्यचारुदत्त ! साधु, पृथिव्यां त्वमेको जीवसि; शेषः पुनर्जनः श्वसिति । भवतु, आर्ये ! भवतु, आसने निषीदतु आर्या । )
वसन्तसेना—( आसने समुपविश्य ) अज्ज ! कुदो सो घणिओ ? ( आर्ये ! कुतः स धनिकः ? )
( चेटी उसी प्रकार करती है ।)
संवाहक—( अपने आप ) आर्य चारुदत्त का नाम ले लेने से ही मेरा इतना आदर क्यों ? धन्य हो आर्य चारुदत्त ! धन्य हो । इस पृथिवी पर अकेला तुम्हारा ही जीना सफल है और दूसरे लोग तो सांसें भर रहे हैं । ( इस प्रकार वसन्तसेना के पैरों पर गिर कर ) बहुत हो गया आर्ये ! बहुत हो-गया ( बस करें ), अब आप अपने आसन पर बैठ जाँय ।
वसन्तसेना—( आसन पर बैठ कर ) आर्य ! वे धनी कैसे रह सकते ? ( अर्थात् दानी चारुदत्त का धनी रह सकना सम्भव ही नहीं है ।)
**टीका—**आत्मीयम्=स्वकीयमेवेत्यर्थः । अस्य=अस्मै, आर्यस्य=श्रीमन्तः, कर्म-त्वाविवक्षायां षष्ठी, ईदृशः=वसन्तसेनाऽपि सत्कारलग्ना जातेति भावः, जीवसि=सफलं जीवनं धारयसि, श्वसिति=चर्मभस्त्रावत् केवलं श्वासोच्छ्वासं करोति, निषीदतु=तिष्ठतु । आर्ये ! कुतः स धनिकः ? सस्तादृशो दानी केन प्रकारेण धनी भवितुमर्हति, अतस्तस्य महानुभावस्य दरिद्रत्वं निश्चितमिति भावः । केचन 'कुतः सः धनिकः' इत्यस्येयं व्याख्यां कुर्वन्ति 'कस्मात् स्थानात् कारणाद् वा स धनिकः त्वां पीडयति'—परन्तु उत्तरवाक्यैरसङ्गत्या नेदं युज्यते, उत्तरे चारुदत्तस्यैव यशो-वर्णनादिति तत्त्वम् ।
**विमर्शः—**आत्मीयम्--वसन्तसेना ने जब संवाहक को चारुदत्त का सेवक समझ लिया तो उसका स्नेह उमड़ पड़ा । और वह अपने घर को उसी का घर मानने के लिये कहने लगी, अतः भय का कोई कारण नहीं है । 'आर्ये ! कुतः स धनिकः ?' इसका प्रसंगानुकूल यही अर्थ है-आर्य, अत्यन्त दानी होने से आर्य चारुदत्त धनी कैसे रह सकते हैं ।' कुछ लोगों ने 'वह पकड़ने वाला धनिक कहाँ से आ रहा है' यह अर्थ किया है । परन्तु आगे के श्लोक में पुनः चारुदत्त की हीं प्रशंसा करने के कारण यहाँ भी 'धनिकः' का सम्बन्ध चारुदत्त से ही करना तर्क-संगत है ।