भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१६२ | मृच्छकटिकम्

वसन्तसेना—सुउमारा क्खु कला सिक्खिदा अज्जेण । ( सुकुमारा खलु कला शिक्षिता आर्येण । )

संवाहकः—अज्जए ! कलेत्ति सिक्खिदा, आजीविआ दाणि संवृत्ता । ( आर्ये ! कलेति शिक्षिता, आजीविका इदानीं संवृत्ता । )

चेटो—अदिणिव्विणं अज्जेण पडिवअणं दिण्णं, तदो तदो ? ( अतिनिर्विष्णमार्येण प्रतिवचनं दत्तम् । ततस्ततः ? )

संवाहकः—तदो अज्जए ! एशे णिजगेहे आहिण्डकाणां मुहादो शुणिअ, अपुव्व-देश-दंशण-कुदूहलेण इह आगदे । इह वि मए पविशिअ उज्जइणि एक्के अज्जे शुश्शूशिदे, जे तालिशे पिअदंशणे पिअवादी, दइअ ण कित्तेदि, अवकिदं विशुमलेदि । किं बहुणा उत्तेण, दक्खिणदाए पलकेलअं विअ अत्ताणं अवगच्छदि, शलणागअवच्छले अ । ( तत आर्ये ! एष निजगृहे आहिण्डकानां मुखात् श्रुत्वा अपूर्वदेश-दर्शन-कुतूहलेन इहागतः । इहापि मया प्रविश्य उज्जयिनीम् एक आर्य्यः शुश्रूषितः, यस्तादृशः प्रियदर्शनः, प्रियवादी, दत्वा न कीर्त्तयति, अपकृतं विस्मरति । किं बहुना उक्तेन, दक्षिणतया परकीयमिव आत्मानमवगच्छति, शरणागतवत्सलश्च । )

चेटी--को दाणि अज्जआए मणोरहन्तरस्स गुणाइं चोरिअ उज्जइणिं अलंकरेदि ? । ( क इदानीमार्य्याया मनोरथान्तरस्य गुणान् चोरयित्वा उज्जयिनीमलङ्करोति ? )


वसन्तसेना—श्रीमन् ने बहुत कोमल कला सीखी है ।

संवाहक—आर्ये ! कला मान कर सीखी थी, किन्तु इस समय जीविका-साधन बन गयी है ।

चेटी—आपने बहुत ही दुःखपूर्वक उत्तर दिया है । इसके बाद ?

संवाहक—आर्ये ! इसके बाद, अपने घर पर आने वाले भ्रमणप्रिय लोगों के मुख से सुनकर इस अपूर्व ( अद्भुत ) नगरी को देखने की इच्छा से मैं यहाँ आया । यहाँ भी उज्जैन नगरी में प्रवेश करके मैंने एक आर्य=महापुरुष की सेवा ( नौकरी ) की, जो इतने सुन्दर, प्रियवक्ता, कि ( किसी को कुछ भी ) दान करके उसके बारे में प्रचार नहीं करते हैं, अपकार को भूल जाने वाले हैं । ( किसी से बदला लेने वाले नहीं है ।) अधिक कहने से क्या लाभ ? अत्यधिक उदार होने के कारण वे अपने को भी ( आत्मा को भी ) दूसरे का सा समझते हैं ( अर्थात् स्वार्थपरता का पूर्ण अभाव है ) और शरण में आने वालों की स्नेह से रक्षा करने वाले हैं ।

चेटी--आर्या ( वसन्तसेना ) के मनोभिलषित ( चारुदत्त ) के गुणों को चुरा कर इस समय कौन उज्जैन नगरी को सुशोभित कर रहा है ?