मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १३४ | मृच्छकटिकम् |
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मदनिका--अज्जए ! किं हीणकुसुमं सहआरवादवं महुअरीओ उण सेवन्ति ? ( आर्ये ! किं हीनकुसुमं सहकारपादपं मधुकर्य्यः पुनः सेवन्ते ? )
वसन्तसेना--अदो ज्जेव तावो महुअरीओ वुच्चन्ति । ( अत एव ता मधुकर्य्य उच्यन्ते )
मदनिका--अज्जए ! जइ सो मणीसिदो, ता कीसदाणिं सहसा ण अहिसारीअदि ? ( आर्ये ! यदि स मनीषिताः, तत् किमर्थमिदानीं सहसा नाभिसार्य्यते ? )
वसन्तसेना--हज्जे ! सहसा अहिसारीअन्तो पच्चआरदुव्वलदाए मा दाव सो जणो दुल्ल्हदंसणो पुणो भविस्सस्सदि । ( हञ्जे ! सहसा अभिसार्य्यमाणः प्रत्युपकारदुर्बलतया मा तावत् स जनो दुर्लभदर्शनः पुनर्भाविष्यति । )
मदनिका--किं अदो ज्जेव सो अलङ्कारओ तस्स हत्थे णिक्खित्तो ? । ( किम् अत एव सोऽलङ्कारस्तस्य हस्ते निक्षिप्तः ? )
वसन्तसेना--हज्जे ! सुट्ठु दे जाणिदं । ( हञ्जे ! सुष्ठु ते ज्ञातम् । )
( नेपथ्ये )
अले भट्टा ! दश--सुवण्णस्स लुद्ध जूदअरु पपलीणू पपलीणू । ता गेण्ह, गेण्ह, चिट्ठ, चिट्ठ, दूलात् पद्दिट्ठोसि ? । ( अरे भट्टारक ! दशसुवर्णस्य रुद्धो द्यूतकरः प्रपलायितः प्रपलायितः । तद् गृह ण, गृहाण ! तिष्ठ तिष्ठ, दूरात् प्रदृष्टोऽसि )
नामधेयः--भाग, रूप, नाम शब्दों से स्वार्थ में 'धेय' प्रत्यय होता है ।
अवचनीया--वच् + अनीयर् निन्दा अर्थ में है, न वचनीया = अवचनीया ।
अर्थ--मदनिका--क्या फूलों ( मञ्जरियों ) से हीन आम के वृक्ष का पुनः सेवन मधुकरियां ( भ्रमरियां ) करती हैं ?
वसन्तसेना--इसीलिए तो उन्हें मधुकरी कहा जाता है ।
मदनिका--आर्ये ! यदि वह आपका मनपसन्द है तो इसी समय क्यों नहीं छिपकर उससे मिलती हैं ?
वसन्तसेना--गुप्त रूप से ( अचानक ) मिलने पर ( धन आदि देकर ) प्रत्युपकार ( बदला ) करने में असमर्थ होने के कारण कहीं ऐसा न हो जाय कि पुनः उनका दर्शन ही न हो सके ।
मदनिका--क्या इसी लिये वह स्वर्णाभूषण उनके हाथ में ( धरोहर रूप से ) रखा गया है ?
वसन्तसेना--तुमने ठीक समझा ।
( नेपथ्य में )
अरे स्वामिन् ! दश सुवर्ण ( उस समय प्रचलित सिक्का आदि ) के कारण पकड़ पर रखा गया जुआँरी भाग गया, भाग गया । अतः पकड़ो, पकड़ो, ठहरो ठहरो, दूर से तुझे देख लिया है ।