भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१३२ मृच्छकटिकम्

वसन्तसेना—हञ्जे ! उवारूढसिणेहं पि पणइजणं परिच्चहअ देसंतरागम- णेण वाणिअजणो महन्तं विओअजं दुक्खं उप्पादेदि । ( हञ्जे ! उपारूढस्नेह- मपि प्रणयिजनं परित्यज्य देशान्तरगमनेन वाणिजजनो महत् वियोगजं दुःखमुत्पा- दयति । ) मदनिका—अज्जए ! ण राजा, ण राजवल्लहो, ण बम्हणो, ण वाणिअ- जणो ! ता को दाणि सो भट्टिदारिआए कामीअदि ? ( आर्ये ! न राजा, न राजवल्लभः न ब्राह्मणः, न वाणिग्जनः । तत् क इदानीं सः भर्तृदारिकया काम्यते ? ) वसन्तसेना—हञ्जे ! तुमं मए सह कामदेवाअदणुज्जाणं गदा आसि। ( हञ्जे ! त्वं मया सह कामदेवायतनोद्यानं गता आसीः ? ) मदनिका—अज्जए ! गदह्नि । ( आर्ये ! गतास्मि । ) वसन्तसेना—तहवि मं उदासीणां विअ पुच्छसि ? (तथापि मामुदासीनेव पृच्छसि ? ) मदनिका—जाणिदं । किं सो ज्जेव्व जेण अज्जआ सरणाअदा अब्भुव- वण्णा ? ( ज्ञातम् । कि स एव, येनार्य्या शरणागता अभ्युपपन्ना ? )


शब्दार्थ—उपारूढस्नेहम् = अत्यन्त प्रेमयुक्त, प्रणयिजनम् = अनुरागी व्यक्ति को, कामदेवायतनोद्यानम् = कामदेवायतन नामक बगीचा में, उदासीनेव = अनभिज्ञ सी, शरणागता = शरण में आई हुई, अभ्युपपन्ना = स्वीकार करली गई थी, किन्ना- मधेयः = किस नामवाला, श्रेष्ठिचत्वरे = सेठों की चोक में, सुगृहीतनामधेयः = सम्माननीय नाम वाले, दरिद्र-पुरुषसंक्रांतमनाः = दरिद्र पुरुष में मन रमाने वाली, अवचनीया = अनिन्दनीय ।

अर्थ—वसन्तसेना— सखि ! अत्यधिक प्रेम करने वाले भी जन ( प्रेयसी या पत्नी ) को छोड़कर विदेशगमन के द्वारा बनियां लोग बहुत अधिक दुःख उत्पन्न कराते हैं ।

मदनिका— आर्ये ! न राजा, न राजा का प्रिय, न ब्राह्मण और न वणिक् जन ( को चाहती हो । ) तो इस समय वह कौन है जिसे आदरणीया आप चाह रहीं है ?

वसन्तसेना— सखि ! तुम मेरे साथ कामदेवायतन उद्यान में गई थी ?

मदनिका— आर्ये ! गई थी ।

वसन्तसेना— तो भी अनभिज्ञ सी ( होकर ) मुझ से पूछ रही हो ।

मदनिका— समझ गई । क्या उन्हें ही (चाह रही हैं), जिन्होंने शरण में आई हुई आपको स्वीकार कर अनुगृहीत किया था ?