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मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

१३२ मृच्छकटिकम्

वसन्तसेना—हञ्जे ! उवारूढसिणेहं पि पणइजणं परिच्चहअ देसंतरागम- णेण वाणिअजणो महन्तं विओअजं दुक्खं उप्पादेदि । ( हञ्जे ! उपारूढस्नेह- मपि प्रणयिजनं परित्यज्य देशान्तरगमनेन वाणिजजनो महत् वियोगजं दुःखमुत्पा- दयति । ) मदनिका—अज्जए ! ण राजा, ण राजवल्लहो, ण बम्हणो, ण वाणिअ- जणो ! ता को दाणि सो भट्टिदारिआए कामीअदि ? ( आर्ये ! न राजा, न राजवल्लभः न ब्राह्मणः, न वाणिग्जनः । तत् क इदानीं सः भर्तृदारिकया काम्यते ? ) वसन्तसेना—हञ्जे ! तुमं मए सह कामदेवाअदणुज्जाणं गदा आसि। ( हञ्जे ! त्वं मया सह कामदेवायतनोद्यानं गता आसीः ? ) मदनिका—अज्जए ! गदह्नि । ( आर्ये ! गतास्मि । ) वसन्तसेना—तहवि मं उदासीणां विअ पुच्छसि ? (तथापि मामुदासीनेव पृच्छसि ? ) मदनिका—जाणिदं । किं सो ज्जेव्व जेण अज्जआ सरणाअदा अब्भुव- वण्णा ? ( ज्ञातम् । कि स एव, येनार्य्या शरणागता अभ्युपपन्ना ? )


शब्दार्थ—उपारूढस्नेहम् = अत्यन्त प्रेमयुक्त, प्रणयिजनम् = अनुरागी व्यक्ति को, कामदेवायतनोद्यानम् = कामदेवायतन नामक बगीचा में, उदासीनेव = अनभिज्ञ सी, शरणागता = शरण में आई हुई, अभ्युपपन्ना = स्वीकार करली गई थी, किन्ना- मधेयः = किस नामवाला, श्रेष्ठिचत्वरे = सेठों की चोक में, सुगृहीतनामधेयः = सम्माननीय नाम वाले, दरिद्र-पुरुषसंक्रांतमनाः = दरिद्र पुरुष में मन रमाने वाली, अवचनीया = अनिन्दनीय ।

अर्थ—वसन्तसेना— सखि ! अत्यधिक प्रेम करने वाले भी जन ( प्रेयसी या पत्नी ) को छोड़कर विदेशगमन के द्वारा बनियां लोग बहुत अधिक दुःख उत्पन्न कराते हैं ।

मदनिका— आर्ये ! न राजा, न राजा का प्रिय, न ब्राह्मण और न वणिक् जन ( को चाहती हो । ) तो इस समय वह कौन है जिसे आदरणीया आप चाह रहीं है ?

वसन्तसेना— सखि ! तुम मेरे साथ कामदेवायतन उद्यान में गई थी ?

मदनिका— आर्ये ! गई थी ।

वसन्तसेना— तो भी अनभिज्ञ सी ( होकर ) मुझ से पूछ रही हो ।

मदनिका— समझ गई । क्या उन्हें ही (चाह रही हैं), जिन्होंने शरण में आई हुई आपको स्वीकार कर अनुगृहीत किया था ?

द्वितीयोऽङ्कः १३३

वसन्तसेना--किं णामहेओ क्खु सो ? (किंनामधेयः खलु सः ? )
मदनिका--सो क्खु सेट्ठिचत्तरे पडिवसदि। ( स खलु श्रेष्ठिचत्वरे प्रतिवसति । )
वसन्तसेना--अइ ! णामं से पुच्छिदासि। ( अयि ! नामास्य पृष्टासि । )
मदनिका--सो क्खु अज्जए ! सुग्गहीदणामहेओ अज्जचारुदत्तो णाम। ( स खलु आर्ये ! सुगृहीतनामधेय आर्यचारुदत्तो नाम । )
वसन्तसेना--( सहर्षम् । ) साहु ! मदणिए ! साहु। सुट्ठु तुए जाणिदं। ( साधु मदनिके ! साधु, सुष्ठु त्वया ज्ञातम् ! )
मदनिका--( स्वगतम् ) एवं दाव । ( प्रकाशम् ) अज्जए ! दलिद्दो क्खु सो सुणीअदि। ( एवं तावत् । आर्ये ! दरिद्रः खलु स श्रूयते । )
वसन्तसेना--अदो ज्जेव कामीअदि। दलिद्दपुरिससङ्कन्तमणा क्खु गणिआ लोए अवंचणीआ भोदि। ( अत एवं काम्यते ! दरिद्रपुरुषसंक्रान्तमनाः खलु गणिका लोकेऽवर्चनीया भवति । )


वसन्तसेना--उनका क्या नाम है ?
मदनिका--वे सेठों की चौक ( वस्ती ) में रहते हैं ।
वसन्तसेना--मैंने उनका नाम पूछा है ।
मदनिका--आर्ये ! सुन्दर नामवाले वे आर्य चारुदत्त हैं ।
वसन्तसेना--( हर्ष के साथ ) वाह मदनिके ! वाह, तुमने ठीक समझा ।
मदनिका--( अपने आप ) तो अब ऐसा ( कहूँ ) । ( प्रकट रूप से ) आर्ये ! सुना जाता है कि वे दरिद्र हैं ।
वसन्तसेना--इसीलिए तो चाहती हूँ ( प्रेम करती हूँ । ) क्योंकि निर्धन पुरुष से प्रेम करने वाली वेश्या की निन्दा लोक में नहीं होती है ।

**टीका--**उपारूढस्नेहम्=उपारूढः=विवृद्धः, स्नेहः=अनुरागः यस्य तं तादृशम्, प्रणयिजनम्=अनुरागिजनम्, उदासीना इव= अनभिज्ञा इव, शरणागता = शरणम् आश्रयम्, याचमाना आगता, शरणार्थिनी इति भावः, अभ्युपपन्ना=शरणप्रदानेना-नुकम्पिता, किन्नामधेयः=किन्नामकः, नामशब्दात् स्वार्थे धेयप्रत्ययः, सुगृहीतनाम-धेयः=सुगृहीतम् = दातृत्वेन सुष्ठु गृहीतं नामधेयं यस्य सः, दरिद्र-पुरुष-सङ्क्रान्त-मनाः=सङ्क्रान्तम्=अत्यनुरक्तम्, मनः=चित्तम्, दरिद्रपुरुषे = निर्धनजने सङ्क्रान्तं मनो यस्याः सा, एतादृशी, अवचनीया = अनिन्दनीया, धनलोलुपा वेश्या इति प्रसिद्धिविरुद्धाचरणात् मम निन्दा नैव भविष्यतीति भावः ।

विमर्शः--शरणागता--'शरणं गृहरक्षित्रोः' अमरकोश के अनुसार रक्षक के समीप आयी । अभ्युपपन्ना--अभि उप इन दो उपसर्गों के साथ--√ पद् + क्त में द् + त = न्न होने के बाद स्त्री प्रत्यय-टाप् है ।

१३४मृच्छकटिकम्

मदनिका--अज्जए ! किं हीणकुसुमं सहआरवादवं महुअरीओ उण सेवन्ति ? ( आर्ये ! किं हीनकुसुमं सहकारपादपं मधुकर्य्यः पुनः सेवन्ते ? )

वसन्तसेना--अदो ज्जेव तावो महुअरीओ वुच्चन्ति । ( अत एव ता मधुकर्य्य उच्यन्ते )

मदनिका--अज्जए ! जइ सो मणीसिदो, ता कीसदाणिं सहसा ण अहिसारीअदि ? ( आर्ये ! यदि स मनीषिताः, तत् किमर्थमिदानीं सहसा नाभिसार्य्यते ? )

वसन्तसेना--हज्जे ! सहसा अहिसारीअन्तो पच्चआरदुव्वलदाए मा दाव सो जणो दुल्ल्हदंसणो पुणो भविस्सस्सदि । ( हञ्जे ! सहसा अभिसार्य्यमाणः प्रत्युपकारदुर्बलतया मा तावत् स जनो दुर्लभदर्शनः पुनर्भाविष्यति । )

मदनिका--किं अदो ज्जेव सो अलङ्कारओ तस्स हत्थे णिक्खित्तो ? । ( किम् अत एव सोऽलङ्कारस्तस्य हस्ते निक्षिप्तः ? )

वसन्तसेना--हज्जे ! सुट्ठु दे जाणिदं । ( हञ्जे ! सुष्ठु ते ज्ञातम् । )

( नेपथ्ये )

अले भट्टा ! दश--सुवण्णस्स लुद्ध जूदअरु पपलीणू पपलीणू । ता गेण्ह, गेण्ह, चिट्ठ, चिट्ठ, दूलात् पद्दिट्ठोसि ? । ( अरे भट्टारक ! दशसुवर्णस्य रुद्धो द्यूतकरः प्रपलायितः प्रपलायितः । तद् गृह ण, गृहाण ! तिष्ठ तिष्ठ, दूरात् प्रदृष्टोऽसि )


नामधेयः--भाग, रूप, नाम शब्दों से स्वार्थ में 'धेय' प्रत्यय होता है ।
अवचनीया--वच् + अनीयर् निन्दा अर्थ में है, न वचनीया = अवचनीया ।

अर्थ--मदनिका--क्या फूलों ( मञ्जरियों ) से हीन आम के वृक्ष का पुनः सेवन मधुकरियां ( भ्रमरियां ) करती हैं ?

वसन्तसेना--इसीलिए तो उन्हें मधुकरी कहा जाता है ।

मदनिका--आर्ये ! यदि वह आपका मनपसन्द है तो इसी समय क्यों नहीं छिपकर उससे मिलती हैं ?

वसन्तसेना--गुप्त रूप से ( अचानक ) मिलने पर ( धन आदि देकर ) प्रत्युपकार ( बदला ) करने में असमर्थ होने के कारण कहीं ऐसा न हो जाय कि पुनः उनका दर्शन ही न हो सके ।

मदनिका--क्या इसी लिये वह स्वर्णाभूषण उनके हाथ में ( धरोहर रूप से ) रखा गया है ?

वसन्तसेना--तुमने ठीक समझा ।

( नेपथ्य में )

अरे स्वामिन् ! दश सुवर्ण ( उस समय प्रचलित सिक्का आदि ) के कारण पकड़ पर रखा गया जुआँरी भाग गया, भाग गया । अतः पकड़ो, पकड़ो, ठहरो ठहरो, दूर से तुझे देख लिया है ।

द्वितीयोऽङ्कः १३५

( प्रविश्य अपटीक्षेपेण संभ्रान्तः । )

संवाहकः—कट्टे एशे जूदिअलभावे। हीमाणाहे ! (कष्ट एष द्यूतकरभावः। आश्चर्यम् !)


**टीका—**हीनकुसुमम्=हीनानि=निर्गतानि कुसुमानि यस्मात् यस्य वा तम्, मञ्जरीरहितम्, सहकारपादपम्=आम्रवृक्षम्, मधुकर्य्यः=भ्रमर्य्यः, न सेवन्ते=नैवाश्रयन्ति । मधुकर्य्यः=मधु=क्षौद्रं कुर्व्वन्ति इति अन्वर्थोपपादनार्थं पुष्पितसहकारवृक्षस्यैव सेवनमावश्यकमित्यर्थः। अत्र पृथ्वीधरः- मधुकुर्व्वन्ति=सेवन्ते, मत्ता इत्यर्थः । मधु कुर्व्वन्त्येव केवलं न स्वयं सेवन्ते । तथा गणिका धनार्थमेव केवलं स्वदेहं परोपकरणीकृत्य अलब्धरतयो वृथाजन्मभाजो भवन्तीत्यर्थः ।' मनीषितः=मनसः=हृदयस्य, ईषितः=वाञ्छितः, सहसा=झटिति अविचारपूर्वकमिति भावः, अभिसार्यते=दूत्यादिद्वारा स्वयं वाऽभिसारः क्रियते, सहसा=विस्रम्भोत्पादनात् पूर्वमेव, अभिसार्यमाणः = अभिसरणविषयीक्रियमाणः, प्रत्युपकारदुर्बलतया = प्रत्युपकारे=ममाभिसरणरूपोपकारस्य प्रतिदाने, दुर्बलतया=असमर्थतया धनाद्यभावादित्यर्थः, दुर्लभदर्शनः=दुर्लभम्=दुष्प्राप्यम्, दर्शनम्=साक्षात्कारः मेलनं वा, मा भविष्यतीत्यत्र काकुः, न भविष्यति ? अर्थात् प्रत्युपकारासमर्थतया व्रीडया न कदाप्यात्मानं मां दर्शयिष्यति अतो न सहसाऽभिसार्यते । निक्षिप्तः=स्थापितः । दशसुवर्णस्य=दशानां सुवर्णानां समाहारः दशसुवर्णम्, तस्य=तात्कालिक-दशसंख्याक-सुवर्ण-मुद्रासमूहस्येत्यर्थः, हेतौ षष्ठी । रुद्धः=तद्दानाय परिगृहीतः, गृहाण=धारय, प्रदृष्टोऽसि=अवलोकितोऽसि मयेति शेषः । 'नासूचितस्य पात्रस्य प्रवेशो निर्गमोऽपि च' इत्युक्तेः पलायमानस्य संवाहकस्य प्रवेशं सूचयन्नेपथ्ये माथुरो वदति—'अले भट्टा' इत्यादि ।

**विमर्शः—**मधुकर्यः=मधु को बनाती या एकत्रित ही करती हैं, स्वयं सेवन नहीं कर पाती हैं । इसी प्रकार वेश्यायें भी धनादि के लिये अपने शरीर का विक्रय करती है, रतिसुख नहीं पाती हैं अतः उनका जन्म व्यर्थ है । दुर्लभदर्शनः मा भविष्यति—वसन्तसेना का आशय यह है कि जब तक उसे मुझपर पूरा विश्वास नहीं हो जाता है, तब तक अचानक मिलना ठीक नहीं है । क्योंकि आवेश में कुछ करने के बाद वह उसके प्रत्युपकार-स्वरूप धनादि मुझे नहीं दे सकेगा । फलस्वरूप अत्यन्त लज्जित होकर फिर कभी भी नहीं मिलना चाहेगा । अतः मुझे पहले उसका विश्वास जीतना है । दशसुवर्णस्य उस समय सोने का प्रचलित सिक्का आदि रहा होगा । अभिसारिका—

अभिसारयते कान्तं या मन्मथवशम्वदा ।
स्वयं वाभिसरत्येषा धीरैरुक्ताभिसारिका ॥

१३६ | मृच्छकटिकम्

णव-बन्धण-मुक्काए विअ गद्दहीए हा ! ताडिदोम्हि गद्दहीए । अङ्गलाअमुक्काए विअ शत्तीए घडुक्को विअ घादिदोम्हि शत्तीए ॥१॥ ( नव-बन्धन-मुक्तयेव गर्दभ्या हा ताडितोऽस्मि गर्दभ्या । अङ्गराज-मुक्तयेव शक्त्या घटोत्कच इव घातितोऽस्मि शक्त्या ॥ १ ॥ )


अन्वयः—हा ! नवबन्धनमुक्तया, गर्दभ्या, इव, गर्दभ्या, ताडितः, अस्मि, अङ्गराजमुक्तया, शक्त्या, घटोत्कचः, इव, शक्त्या, ( अहम् ) घातितः, अस्मि ॥ १ ॥

शब्दार्थः—हा=हाय ? नवबन्धनमुक्तया=पहली बार बनाये गये बन्धन से छूटी हुई, ( खुलकर भागती हुई ), गर्दभ्या इव=गधी के समान, गर्दभ्या=जुआ खेलने की कौड़ी के द्वारा, ताडितः=मारा गया हूँ, अङ्गराजमुक्तया = कर्ण के द्वारा चलायी गयी ( छोड़ी गयी ), शक्त्या = शक्तिनामक अस्त्रविशेष के द्वारा, घटोत्कचः=भीमसेन एवं हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच के, इव=समान, शक्त्या=ज्यूय की कौड़ी की एक विशेष चाल के द्वारा, ( अहम्=मैं संवाहक ), घातितः=मारा गया, अस्मि=हूँ ॥ १ ॥

( बिना पर्दा उठाये घबराये हुये प्रवेश करके )

अर्थसंवाहक—आश्चर्य ? जुआरीपन बड़ा ही कष्टदायक है—हाय ! सबसे पहले लगाये गये बंधन ( रस्सी ) आदि से छूटी हुई ( भागती हुई ) गधी के समान गर्दभी ( जुये में प्रयुक्त होने वाली कौड़ी अथवा पाशा ) के द्वारा मैं मार दिया गया हूँ ( हरा दिया गया हूँ )। अङ्गराज कर्ण के द्वारा चलायी ( छोड़ी ) गई शक्ति ( नामक अस्त्र ) के द्वारा घटोत्कच के समान ( मैं ) शक्ति ( जुये की कौड़ियों की एक विशेष चाल ) से मार दिया गया हूँ, ( मरणतुल्य हार हो गयी है ) ॥ १ ॥

टीकाहा=कष्टम्, नवबन्धनमुक्तया=नवम्=प्रथमम्, यत् बन्धनम्, रज्ज्वादिनां धारणम्, तस्मात् मुक्तया=स्वतन्त्रया, गर्दभ्या=रासभ्या, इव=तुल्यम्, गर्दभ्या=वराटिकया, ताडितः=दण्डितः, पराजितः,, अस्मि, अङ्गराजमुक्तया=कर्णेन प्रक्षिप्तया, शक्त्या=तन्नामकास्त्रविशेषेण, घटोत्कचः=हिडिम्बाभीमयोः पुत्रः, इव=यथा, शक्त्या=द्यूतक्रीडासम्बन्धिवेलनविशेषेण, (अहम्=संवाहकः ) घातितः=मारितः, अस्मि=भवामि, अत्र इव-शब्दद्वयप्रयोगात् उपमाद्वयम्, यमकद्वयञ्च । चित्रजातिः वृत्तम् ॥ १ ॥

विमर्श—नवबन्धन-मुक्तया—उच्छृङ्खल गधी जब पहली बार रस्सी आदि से बांधी जाती है और उसे तोड़कर या खुल जाने पर जैसे अनवरत दुलत्ती चला चलाकर लोगों को मारा करती है उसी प्रकार गर्दभी=वरांटिका=कौड़ी ने संवाहक को पीट डाला । घटोत्कचः इव—भीमसेन एवं हिडिम्बा राक्षसी का पुत्र घटोत्कच था । वह महाभारत के युद्ध में कौरवों का प्रचुर संहार करने लगा था । तब एक व्यक्ति का निश्चित वध कर डालने वाली शक्ति को कर्ण

द्वितीयोऽङ्कः १३७

लेखअ-वावड-हिअअं शहिअं दट्टूण झत्ति पब्भट्ठे । एण्हि मग्ग-णिबडिदो कं णु क्खु शलणं पपज्जे ॥ २ ॥ ( लेखक-व्यापृत-हृदयं सभिकं दृष्ट्वा झटिति प्रभ्रष्टः । इदानीं मार्गनिपतितः कं नु खलु शरणं प्रपद्ये ॥ २ ॥ )

ने छोड़ा और घटोत्कच की मृत्यु हो गई। इसी प्रकार जुये में 'शक्ति' नामक एक ऐसी चाल है जिससे विपक्षी जुआरी का हारना निश्चित है। संवाहक अपनी हार को मृत्यतुल्य समझ रहा है। यहाँ दो बार सादृश्य के लिये 'इव' शब्द का प्रयोग है अतः दो उपमायें हैं। गर्दभ्या गर्दभ्या, शक्त्या शक्त्या ये दो यमक हैं। चित्रजाति छन्द है ॥ १ ॥

अन्वयः- लेखकव्यापृतहृदयम्, सभिकम्, दृष्ट्वा, झटिति, प्रभ्रष्टः, इदानीम्, मार्गनिपतितः, (अहम्) कम्, नु, खलु, शरणम्, प्रपद्ये ॥ २ ॥

शब्दार्थ- लेखकव्यापृतहृदयम्=लिखने में व्यस्त चित्तवाले, सभिकम्=जुआरिओं के अध्यक्ष को, दृष्ट्वा=देखकर, झटिति=झटपट, प्रभ्रष्टः=भाग कर निकला हुआ, (और) इदानीम्=इस समय, मार्गनिपतितः=रास्ते पर आकर खड़ा हुआ, (अहम्=मैं संवाहक), किम्=किसकी, नु खलु, (वाक्यालंकार के लिये हैं) शरणम्=शरण में, प्रपद्ये=जाऊँ? ॥ २ ॥

अर्थ- लिखने में लगे हुये सभिक को देख कर झटपट भागकर निकला हुआ और इस समय सड़क पर खड़ा हुआ, मैं अब किसकी शरण में जाऊँ, अर्थात् मेरी रक्षा करने वाला कौन है? ॥ २ ॥

टीका- लेखकव्यापृतहृदयम्=लेखनं लेखः भावे घञ्, लेख एव लेखकः, तत्र व्यापृतम्=संलग्नम्, हृदयम्=चित्तं यस्य तं तादृशम्, लेखनकार्यसंलग्नचित्तम्, सभिकम्=द्यूतक्रीडाध्यक्षम् 'सभिका द्यूतकारकाः' इत्यमरः दृष्ट्वा=विलोक्य, झटिति=शीघ्रमेव, प्रभ्रष्टः=पलाय्य बहिर्निर्गतः, इदानीम्=अधुना, मार्ग-निपतितः=मार्गे=राजपथे, निपतितः=समुपागतः, कम्=जनम्, शरणम्=रक्षितारम्, प्रपद्ये=आश्रयामि, अत्र नु खलु-इति विमर्शो। अत्र गाथावृत्तम्। तल्लक्षणम्—

विषमाक्षरपादत्वात् पादौ रससञ्जसं धर्षवत् । यश्छन्दसि नोक्तमत्र गाथेति तत् सूरिभिः कथितम् ॥

विमर्श- लेखकव्यापृतहृदयम्-लेखनम्=लेखः, भाव में घञ्=अ, पुनः लेख एव लेखकः, स्वार्थ में कन् मानना चाहिये, इस प्रकार लिखने में लगे हुये चित्त वाले यह अर्थ होता है। यहाँ "लेख अ ववड़-" इस प्राकृत में 'क' लोप के स्थान पर 'न' व्यञ्जन का लोप मान लेने से अधिक सरलताया अर्थ हो जाता है।

१३८ | मृच्छकटिकम्

ता जाव एदे शहिअ-जूदिअरा अण्णदो मं अण्णेसन्ति, ताव इदो विप्पडीवेहिं पादेहिं एदं शुण्णदेउलं पविशिअ देवीभविशं (बहुविधं नाट्यं कृत्वा तथा स्थितः ।) (तद्यावत् एतौ सभिक-द्यूतकरौ अन्यतो मामन्विष्यतः, तावत् इतो विप्रतीपाभ्यां पादाभ्यामेतत् शून्यदेवकुलं प्रविश्य देवीभविष्यामि ।)

(ततः प्रविशति माथुरो द्यूतकरश्च)

माथुरः—अले भट्टा ! दशसुवण्णाह लुद्धु जूदरु पपलीणु पपलीणु । ता गेण्ह गेण्ह, चिट्ठ चिट्ठ, दूलात् पदिट्ठोसि । (अरे भट्टारक ! दशसुवर्णस्य रुद्धो द्यूतकरः प्रपलायितः, प्रपलायितः । तद् गृहाण, गृहाण । तिष्ठ, तिष्ठ । दूरात् प्रदृष्टोऽसि ।)

द्यूतकरः

जइ वज्जसि पादालं इंदं शलणं च जासि ।
सहिअं वज्जिअ एक्कं रुद्दो वि ण रक्खिदुं तरइ ॥ ३ ॥
(यदि व्रजसि पातालमिन्द्रं शरणं च यासि ।
सभिकं वर्जयित्वैकं रुद्रोऽपि न रक्षितुं तरति ॥ ३ ॥)


**सभिकम्=**सभा=द्यूतप्रेमियों का क्रीडास्थल, उसकी व्यवस्था करने वाले प्रमुख जुआरी को। कालें के अनुसार अग्निपुराण, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य-स्मृति एवम् इसकी टीका मिताक्षरा आदि ग्रन्थों में सभिक एवं द्यूतसम्बन्धी नियमों का विस्तृत उल्लेख है ॥ २ ॥

शब्दार्थ—अन्यतः=दूसरी ओर, विप्रतीपाभ्याम्=विपरीत, उल्टे, शून्यदेव-कुलम्=प्रतिमादि से रहित देवमन्दिर में, देवीभविष्यामि=देवता की मूर्ति बने जाता हूँ।

अर्थ—जब तक ये सभिक और द्यूतकर दूसरी ओर मुझे खोजते हैं तब तक (मैं) इधर उल्टे पैरों से इस देवप्रतिमादि से शून्य मन्दिर में प्रवेश करके देवता (के स्थान पर) मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूँ।

(इसके बाद माथुर और जुआरी का प्रवेश)

**अर्थ—माथुर—**अरे स्वामिन् ! दश सुवर्ण के सिक्कों आदि के कारण पकड़ कर रोका गया जुआरी भाग गया, भाग गया । इस लिये पकड़ो, पकड़ो । रुको, रुको, दूर से देख लिये गये हो ।

अन्वयः—यदि, पातालम्, व्रजसि, इन्द्रम्, च, शरणम्, यासि, तथापि, एकम्, सभिकम्, वर्जयित्वा, रुद्रः, अपि, (त्वाम्), रक्षितुम्, न, तरति ॥ ३ ॥

शब्दार्थ—यदि=अगर, पातालम्=पाताल में, व्रजसि=जाते हो, च=अथवा, इन्द्रम्=इन्द्र (स्वर्गलोक) की, शरणम्=आश्रय में, यासि=जाते हो, (तथापि=तो भी) एकम्=अकेले, सभिकम्=द्यूतक्रीडाध्यक्ष को, वर्जयित्वा=छोड़ कर, रुद्रः=शिव भी, (त्वाम्=तुम्हें), रक्षितुम्=रक्षा करने के लिये, न=नहीं, तरति=पार पा सकता है ॥ ३ ॥

द्वितीयोऽङ्कः १३६

माथुरः—कहिं कहिं सुसहिअ-विप्पलम्भआ !

पलासि ले ! भअपलिवेविदङ्गआ । पदे पदे समं-विसमं खेलेन्तआ कुलं जसं अधिकसणं कलेन्तआ ॥ ४ ॥

( कुत्र, कुत्र सुसभिकविप्रलम्भक ! पलायसे रे भयपरिवेपिताङ्गक ! । पदे पदे समविषमं स्खलन् कुलं यशः अतिकृष्णं कुर्वन् ॥ ४ ॥


अर्थ— यदि तुम ( अपनी रक्षा के लिये जमीन के अन्दर ) पाताल चले जाओ, अथवा इन्द्र की शरण में ( स्वर्गलोक ) चले जाओ, ( तो भी ) सभिक अकेले को छोड़कर भगवान् शिव भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते ॥ ३ ॥

टीका— यदि=चेत् पातालम्=पृथिव्याः अधोदेशम्, व्रजसि=गच्छसि, इन्द्रम्=देवराजम्, शरणम्=रक्षितारम्, आश्रयं वा, यासि=गच्छसि, तथापि, एकम्=केवलम्, सभिकम्=द्यूताध्यक्षम् मां माथुरमिति भावः, वर्जयित्वा=त्यक्त्वा, रुद्रः=भगवान् शङ्करः, अपि त्वाम्, =संवाहकम्, रक्षितुम्=त्रातुम्, न=नैव, तरति=पारयति, समर्थो भवतीति भावः । एवञ्च ते पलायनं व्यर्थमेवेति बोध्यम् । आर्या वृत्तम् ॥ ३ ॥

विमर्श— इन्द्रं शरणम्-यहाँ इन्द्र रक्षक के पास जाते हो-यह आशय है । सभिकम्-इसके विषय में प्रथम पद्य में लिखा जा चुका है । तरति-'तॄ प्लवनतरणयोः' धातु से लट् प्रथमपुरुष एकवचन । यहाँ पार करना अर्थ है । रुद्रः-शिव के लिये यह सार्थक प्रयोग है । यहाँ आर्या छन्द है ॥ ३ ॥

अन्वयः— रे सुसभिक-विप्रलम्भक !, भयपरिवेपिताङ्गक, पदे पदे, समविषमं, स्खलन्, कुलम्, यशः, अतिकृष्णम्, कुर्वन्, कुत्र, कुत्र, पलायसे ॥ ४ ॥

शब्दार्थ— रे=अरे, सुसभिक-विप्रलम्भक=सज्जन, न्यायकारी सभिक को धोखा देने वाले, भयपरिवेपिताङ्गक=भय के कारण कांपते हुये अङ्गों वाले, पदे पदे=प्रत्येक कदम पर, सम-विषमम् = ऊँचे नीचे, स्खलन्=गिरते पड़ते, लड़खड़ाते हुये, कुलम्=अपने वंश को, और यशः=अपने यश को, अतिकृष्णम्=अत्यन्त कलुषित करते हुये, कुत्र कुत्र=कहाँ कहाँ, पलायसे=भागे जा रहे हो ॥ ४ ॥

अर्थ— अरे ! ( मेरे जैसे ) सज्जन, न्यायप्रेमी द्यूतक्रीडाध्यक्ष को धोखा देने वाले, भय के कारण कांपते हुये अङ्गों वाले, ( संवाहक तुम ), पग-पग पर ऊपर नीचे गिरते हुये, लड़खड़ाते हुये, अपने कुल और यश को कलुषित करते हुये कहाँ-कहाँ भागे जा रहे हो ॥ ४ ॥

टीका— रे ! =अरे !, सुसभिक-विप्रलम्भक = सज्जनस्य न्यायप्रियस्य द्यूत-क्रीडाध्यक्षस्य वञ्चक !, भयपरिवेपिताङ्गक = भयेन=मत्तः भीत्या, परिवेपितानि=

१४० मृच्छकटिकम्

द्यूतकरः—( पदं वीक्ष्य ) एसो वज्जदि, इमं पणट्ठा पदवी । (एष व्रजति, इयं प्रनष्टा पदवी ।)

माथुरः—( आलोक्य सवितर्कम् ) अरे ! विप्पदीवु पादू । पाडिमा-शुण्णु देउलु । ( विचिन्त्य ) धुत्तु जूदरु विप्पदीवेहिं पादेहिं देउलं पविट्टो । (अरे ! विप्रतीपौ पादौ, प्रतिमाशन्यं देवकुलम्, धूर्तो द्यूतकरो विप्रतीपाभ्यां पादाभ्यां देवकुलं प्रविष्टः ।)

द्यूतकरः— ता अणुसरेम्ह । ( ततोऽनुसरावः ।)

माथुरः— एव्वं भोदु । ( एवं भवतु ।)

( उभौ देवकुलप्रवेशं निरूपयतः । दृष्ट्वाऽन्योन्यं संज्ञाय्य )

द्यूतकरः— कथं कट्ठमयी पडिमा ? ( कथ काष्ठमयी प्रतिमा ? )


कम्पितानि, थरथरायमाणानि अङ्गानि यस्य तत्सम्बुद्धौ, पदे-पदे=प्रतिपदम्, सम-विषमम्=उच्चावचस्थानम्, समविषमं वा यथा स्यात् तथा स्खलन्=पतन्, कुलम्=वंशम्, यशः=स्वकीयां कीर्तिञ्च, अतिकृष्णम् = अतिकलुषिताम्, कुर्वन् = विदधत्, पलायसे=प्रधावसि । अत्र रुचिरा वृत्तम् ॥ ४ ॥

विमर्श— कहिं कहिं-इस प्राकृत का संस्कृत रूपान्तर कुछ ग्रन्थों में 'कस्मिन् कस्मिन्' है और कुछ में 'कुत्र कुत्र' । कुत्र से भाव अधिक स्पष्ट होता है । सुसभिक-विप्रलम्भक-इससे माथुर अपने को अच्छा 'सभिक' कहना चाहता है । कुलं यशः अतिकृष्णं कुर्वन्--इस कथन से संवाहक को रोकने के लिये विवश करना चाहता है । पलायसे -- परा + √अय् + लट् आत्मनेपद प्रथम पु० एकवचन उप-सर्गस्यायतौ' [पा० सू०।२।१६] से रेफ का लकार । समविषमम्-यह क्रियाविशेषण है । इसमें रुचिरा छन्द है । लक्षण ---

जमौ सजौ गिति रुचिरा चतुर्ग्रहैः ॥ ४ ॥

अर्थ—द्यूतकर—( पैर के चिह्न को देख कर ) यह जाता है ( जा चुका है ) । यह पदचिह्न समाप्त हो गये ।

माथुर—( देख कर विचारपूर्वक ) अरे ! उलटे पैर हैं । मन्दिर मूर्ति से रहित है । ( सोचकर ) धूर्त ( चालक ) जुआरी उल्टे पैरों से मन्दिर में गया है ।

द्यूतकर— तो हम दोनों पदचिह्नों का अनुसरण करें ।

माथुर— ऐसा ही हो ।

( दोनों मन्दिर में प्रवेश करने का अभिनय करते हैं, देखकर और एक दूसरे को इशारा करके )

द्यूतकर— क्या यह लकड़ी की मूर्ति है ?

द्वितीयोऽङ्कः १४१

**माथुरः—**अले ! ण हु ण हु । शैलपडिमा । ( इति बहुविधं चालयति, संज्ञाप्य च ) एव्वं भोदु ! एहि जूढं किलेम्ह । ( अरे ! न खलु न खलु, शैलप्रतिमा । एवं भवतु । एहि द्यूतं क्रीडावः )

( बहुविधं द्यूतं क्रीडतः )

संवाहकः— ( द्यूतेच्छाविकारसंवरणं बहुविधं कृत्वा ) ( स्वगतम् ) अले ! ( अरे ! )

कत्ताशद्दे णिण्णाणअश्श हलइ हडकं मणुश्शश्श ।
ढक्काशद्दे व्व णडाधिवश्श पब्भट्टलज्जश्श ॥ ५ ॥
( कत्ताशब्दो निर्नाणकस्य हरति हृदयं मनुष्यस्य ।
ढक्काशब्द इव नराधिपस्य प्रभ्रष्टराज्यस्य ॥ ५ ॥ )


**माथुर—**अरे, नहीं, नहीं । पत्थर की मूर्ति है । ( ऐसा कहकर अनेक बार हिलाता है और इशारा करके ) अच्छा, ऐसा हो । आओ, हम दोनों जुआ खेलें ।
( दोनों अनेक प्रकार से जुआ खेलते हैं । )

**टीका—**पदम्-पदचिह्नममित्यर्थः, पदवी=पदपङ्क्तिः, 'अयनं वर्त्म मार्गाध्व-पन्थानः पदवी सृतिः' अमरकोषः ( २।१।१५ ), प्रनष्टा = अदृष्टा, विप्रतीपो=विपरीतो, प्रतिमाहीनम् = मूर्तिरहितम्, देवकुलम् = देवमन्दिरम्, निरूपयतः=नाटयतः, अन्योन्यम्=परस्परम्, संज्ञाप्य = संकेतं दत्त्वा, काष्ठमयी = दारुनिर्मिता, शैलप्रतिमा=शिलाया इदं शैलम्=पाषाणखण्डम्, तन्निर्मिता मूर्तिरिति भावः ।

**अन्वयः—**अरे ! कत्ताशब्दः, निर्नाणकस्य, मनुष्यस्य, हृदयम्, प्रभ्रष्टराज्यस्य, नराधिपस्य ( हृदयम् ), ढक्काशब्द, इव, हरति ॥ ५ ॥

**शब्दार्थ—**कत्ताशब्दः = जिससे जुआ खेला जाता है उस कौड़ी की आवाज, निर्नाणकस्य=नाणक=पैसों से रहित, गरीब, मनुष्यस्य=आदमी के, हृदयम्=मन को, प्रभ्रष्टराज्यस्य=हारे हुये राज्य वाले, नराधिपस्य=राजा के, ( हृदय को ), ढक्का-शब्दः=भेरी की आवाज, इव=के समान, हरति=खींचता है, आकृष्ट करता है ॥५॥

**अर्थ—**संवाहक-( जुआ खेलने की इच्छा को बहुत प्रकार से रोक कर ) ( अपने आप ) अरे—कौड़ियों की आवाज निर्धन व्यक्ति के मन को उसी प्रकार खींच लेती है जिस प्रकार छीने गये राज्य वाले राजा के मन को भेरी की आवाज ॥ ५ ॥

**टीका—**अरे !=अहो !, कत्ताशब्दः=द्यूतकरणम्=द्यूतक्रीडा यया सा कत्ता, तस्याः शब्दः=ध्वनिः, निर्नाणकस्य=निर्गतं नाणकम्=धनादिकं यस्य यस्माद् वा, तस्य, निर्धनस्येति भावः, पुरुषस्य=मनुष्यस्य, हृदयम्=चित्तम्, प्रभ्रष्टराज्यस्य=प्रभ्रष्टम्=शत्रुभिरपहृतम्, राज्यम्=राज्यलक्ष्मीः यस्य सः, तस्य, नराधिपस्य=नरपतेः, हृदयम्, ढक्काशब्दः=भेरीध्वनिः, इव=यथा, हरति=बलात् तत्र नयति,

१४२मृच्छकटिकम्

जाणामि ण कीलिशं शुमेल-शिहल-पडण-शण्णिहं जूअम् !
तह वि हु कोइलमहुले कत्ताशद्दे मणं हलदि ॥ ६ ॥
( जानामि न क्रीडिष्यामि सुमेरु-शिखर-पतन-सन्निभं द्यूतम् ।
तथापि खलु कोकिलमधुरः कत्ताशब्दो मनो हरति ॥ ६ ॥ )


आकृष्टं करोतीति भावः। एवञ्च सम्मुखे द्यूतक्रीडां पश्यन् कत्ताशब्दं च शृण्वन् आत्मानं वशीकर्तुं न प्रभवामीति बोध्यम्। अत्रोपमा अप्रस्तुतप्रशंसा चेत्यनयोः संसृष्टि ! विपुला वृत्तम् ॥ ५ ॥

अन्वयः—जानामि, सुमेरुशिखरपतनसन्निभम्, द्यूतम्, न, क्रीडिष्यामि, तथापि, कोकिलमधुरः, कत्ताशब्दः, मनः, खलु, हरति ॥ ६ ॥

शब्दार्थजानामि=मैं जानता हूँ कि, सुमेरु-शिखरपतन-सन्निभम्=सुमेरु पर्वत की चोटी से गिरने के समान (सुख-चैन के विनाशक), द्यूतम्=जुये को (निर्धन कर्जदार हो जाने के कारण), =नहीं, क्रीडिष्यामि=खेलूँगा, खेल सकूंगा, तथापि=फिर भी कोकिल-मधुरः=कोयल की आवाज के समान मीठी, कत्ताशब्दः=कौड़ियों की आवाज, मनः=मन को, खलु=निश्चित ही, हरति=खींच रही हैं। (खेलने को विवश कर रही है।) ॥ ६ ॥

अर्थ—मैं यह जानता हूँ कि सुमेरु पर्वत की चोटी से गिरने के समान (महान कष्टप्रद) जुआ (अब कर्जदार होने से) नहीं खेल सकूँगा, फिर भी कोयल के समान मधुर कौड़ियों की आवाज (खनखनाहट) (मेरे) मन को निश्चित ही आकृष्ट कर रही है। (खेलने को विवश कर रही है) ॥ ६ ॥

टीकाजानामि=अहमिदमवगच्छामि यत्, सुमेरु-शिखर-पतन-सन्निभम्=सुमेरुपर्वतस्य शृङ्गात् पतनतुल्यम्, अत्यन्तकष्टप्रदम्, द्यूतम्=द्यूतक्रीडनम्, =नैव, क्रीडिष्यामि, ऋणग्रस्तत्वात् निर्धनत्वाच्चेति भावः, तथापि=एवं सत्यपि, कोकिलमधुरः=कोकिलतुल्यो मधुरः आकर्षकः, कत्ताशब्दः=कत्ताध्वनिः, खलु, मनः=चित्तम्, हरति=बलादाकर्षति। एवञ्च स्वासामर्थ्यं जानन्नपि तत्राकृष्टो भवामीति भावः। अत्र समाससुप्तोपमालंकारः। आर्याजातिः वृत्तम्। लक्षणन्तु बहुशः पूर्वमुक्तम् ॥ ६ ॥

विमर्शजानामि-संवाहक अपनी दयनीय दशा और ऊपर लदे हुये कर्ज को सोचते हुये यह जानता है कि उसे अब जुआ खेलने का अवसर मिलना सम्भव नहीं है। कोकिल-मधुरः=कोयल की आवाज के समान मधुर। यहाँ वति प्रत्यय का लोप समास के कारण हुआ है। अतः समाससुप्तोपमा अलंकार है। आर्याजाति छन्द है ॥ ६ ॥

द्वितीयोऽङ्कः १४३

**द्यूतकरः—**मम पाढे मम पाढे। (मम पाठे मम पाठे।)
**माथुरः—**णं हु। मम पाढे मम पाढे। (न खलु ! मम पाठे मम पाठे।)
संवाहकः—(अन्यतः सहसोपसृत्य।) णं मम पाढे। (ननु मम पाठे।)
**द्यूतकरः—**लद्धे गोहे। (लब्धः पुरुषः।)
माथुरः—(गृहीत्वा) अले लुत्तदण्डा ! गहीदोसि। पअच्छ तं दश-सुवण्णं। (अरे लुप्तदण्डक ! गृहीतोऽसि। प्रयच्छ तत् दशसुवर्णम्।)
**संवाहकः—**अज्ज दइस्शं। (अद्य दास्यामि।)
**माथुरः—**अहुणा पअच्छ। (अधुना प्रयच्छ।)
**संवाहकः—**दइस्शं पशादं कलेहि। (दास्यामि, प्रसादं कुरु।)
**माथुरः—**अले ! णं संपदं पअच्छ। (अरे ! ननु साम्प्रतं प्रयच्छ।)
**संवाहकः—**शिलु पडिदि। (इति भूमौ पतति।) (शिरः पतति।)
(उभौ बहुविधं ताडयतः।)
**माथुरः—**एसु तुमं हु जूदिअर-मण्डलीए बद्धोसि। (एष त्वं खलु द्यूतकरमण्डल्या बद्धोऽसि।)
संवाहकः—(उत्थाय सविषादम्) कथं जूदिअल-मण्डलीए बद्धोम्हि। ही, एशे अम्हाणं जूदिअलाणं अलङ्घणीए शमए। ता कुदो दइस्शं। (कथं


अर्थ— **द्यूतकर—**मेरा, दाँव है, मेरा दाँव है।
**माथुर—**नहीं-नहीं, मेरा दाँव है, मेरा दाँव।
संवाहक—(दूसरी ओर से अचानक समीप आकर) नहीं जी, मेरा दाँव है।
द्यूतकर—(भागा जुआरी) पुरुष मिल गया।
माथुर—(पकड़ कर) अरे ! दण्ड (हारा हुआ धन) न देने वाले ! पकड़ लिये गये हो। तो वे दश सुवर्ण (के सिक्के आदि) दो।
**संवाहक—**आज दे दूँगा।
**माथुर—**इसी समय दो।
**संवाहक—**दे दूँगा, कुछ (समय के लिये) कृपा करो।
**माथुर—**अरे ! इसी समय दो।
**संवाहक—**शिर गिर रहा (चक्कर खा रहा) है। (इस प्रकार कह कर पृथ्वी पर गिर जाता है।)
(दोनों अनेक प्रकार से पीटते हैं।)
**माथुर—**इस समय तुम जुआरियों की मण्डली से पकड़ लिये गये हो।
संवाहक—(उठकर बहुत दुःख के साथ) क्या जुआरियों की मण्डली द्वारा

१४४ मृच्छकटिकम्

द्यूतकरमण्डल्या बद्धोऽस्मि । कष्टम् ! एषोऽस्माकं द्यूतकराणामलङ्घनीयः समयः । तस्मात् कुतो दास्यामि ? )

माथुरः--अले ! गण्डे कुल कुल । ( अरे ! गण्डः क्रियताम्, क्रियताम् ।)

संवाहकः--एव्वं कलेमि । ( द्यूतकरमुपसृश्य ) अद्धं ते देमि, अद्धं मे मुञ्चदु । ( एवं करोमि । अर्द्धं ते ददामि, अर्द्धं मे मुञ्चतु । )

द्यूतकरः--एव्वं भोदु । ( एवं भवतु । )

संवाहकः--( सभिकमुगपम्य ) अद्धरश गण्डे कलेमि, अद्धं पि मे अज्जो मुञ्चदु । ( अर्द्धस्य गण्डं करोमि, अर्द्धमपि मे आर्यो मुञ्चतु । )

माथुरः--को दोसु, एव्वं भोदु । ( को दोषः, एवं भवतु । )


पकड़ लिया गया हूँ । कष्ट है ? यह हम-जुआरिओं का अनुल्लंघनीय नियम है । तो कहाँ से दूँ ?

टीका--पाठे = तदानीं द्यूतक्रीडायामवसरबोधनार्थं प्रचलितः शब्दः, साम्प्रतं हिन्द्यां 'दाँव' इति प्रसिद्धम्, लुप्तदण्डक = लुप्तः=न प्रदत्तः, दण्डः=दशसुवर्णात्मकधनं येन तत्सम्बुद्धौ, प्रयच्छ=देहि, प्रसादम् = किञ्चिदधिकावसर-प्रदानरूपम्, शिरः=मस्तकम्, पतति=अस्वस्थतया वेदनामनुभवतीति भावः, द्यूतकरमण्डल्या=द्यूतकराणां समूहेन, बद्धः=गृहीतः, अलङ्घनीयः=अपरिवर्तनीयः, अवश्यं पालनीयः, समयः=नियमः 'समयः शपथाचारकालसिद्धान्तसंविदः' इत्यमरः । कुतः=कस्मात् जनात् साधनाद् वा ।

विमर्श--पाठे-उस समय पारी के लिये यह शब्द प्रचलित था । अलङ्घनीयः समयः=अवश्य पालनीय नियम । 'समय' शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है

समयाः शपथाचारकालसिद्धान्तसंविदः । अमरकोशः ( ३ । ३ । १५८ )

जुआरिओं का यह नियम रहा होगा कि मण्डली से घिर जाने पर जुआ खेलना पड़ता था और हारा धन वापस देना पड़ता था ।

अर्थ--माथुर--अरे ! वादा ( शर्त ) कर लो, कर लो ।

संवाहक--ऐसा ही करता हूँ । ( द्यूतकर के पास जाकर ) आधा मै तुम्हें दे दूंगा, आधा माफ कर दो ।

द्यूतकर--अच्छा, ऐसा ही हो ।

संवाहक-- ( सभिक के पास जाकर ) आधे का वादा ( शर्त ) करता हूँ । और आर्य आप भी मेरा आधा छोड़ दें ।

माथुर--क्या हानि ! ऐसा ही सही ।

द्वितीयोऽङ्कः १४५

संवाहकः—( प्रकाशम् ) अज्ज ! अद्धे तुए मुक्के ? ( आर्य ! अर्द्धं त्वया मुक्तम् ? )
माथुरः—मुक्के । ( मुक्तम् । )
संवाहकः—(द्यूतकरं प्रति) अद्धे तुए वि मुक्के ? । (अर्द्धं त्वयापि मुक्तम् ? )
द्यूतकरः—मुक्के । ( मुक्तम् । )
संवाहकः—संपदं गमिश्शं । ( साम्प्रतं गमिष्यामि । )
माथुरः—पअच्छ तं दशसुवण्णं, कहिं गच्छसि ? ( प्रयच्छ तत् दश-सुवर्णम्, कस्मिन् गच्छसि ? )
संवाहकः—पेक्खध पेक्खध भट्टालआ ! हा संपदं ज्जेव एक्काह अद्धे गण्डे कडे, अवलाह अद्धे मुक्के; तह वि मं अवलं संपदं ज्जेव मग्गदि । ( प्रेक्षध्वं प्रेक्षध्वं भट्टारकाः ! हा ! साम्प्रतमेव एकस्य अर्द्धे गण्डः कृतः अपरस्य अर्द्धं मुक्तम्; तथापि मामबलं साम्प्रतमेव याचते । )
माथुरः—( गृहीत्वा ) धुत्तु ! माथुरु अहं णिउणु । एत्थ तुए ण अहं धुत्तिज्जामि । ता पअच्छ तं लुत्तदण्डआ ! सव्वं सुवण्णं संपदं । ( धूर्त ! माथुरोऽहं निपुणः । अत्र त्वया नाहं धूर्त्यामि, तत् प्रयच्छ तं लुप्तदण्डक ! सर्वं सुवर्णं साम्प्रतम् । )
संवाहकः—कुदो दइश्शं ? । ( कुतो दास्यामि ? )
माथुरः—पिदरं विक्किणिअ पअच्छ । ( पितरं विक्रीय प्रयच्छ । )


संवाहक—( प्रकट रूप से ) आर्य ! आधा तुमने छोड़ दिया, क्षमा कर दिया ?
**माथुर—**हाँ, छोड़ दिया ।
संवाहक—( द्यूतकर से ) आधा आपने भी छोड़ दिया ?
**द्यूतकर—**हाँ, छोड़ दिया ।
संवाहक—( तो ) अब जाता हूँ ।
**माथुर—**वे दश सुवर्ण तो दे, कैसे जा रहे हो ?
**संवाहक—**श्रीमान् जी देखिये, देखिये । हाय ! अभी आधे के लिये वादा किया है और आधा छोड़ दिया है । तो भी मुझ दुर्बल से इसी समय मांगते हैं ।
माथुर—( पकड़ कर ) धूर्त ! मैं चतुर माथुर हूँ । मैं तुम्हारे साथ धूर्तता नहीं कर रहा हूँ । तो अरे दण्डयोग्य अपराधी ! मेरा वह सारा सोना दे ।
**संवाहक—**कहाँ से दूँ ।
**माथुर—**अपने बाप को बेच कर दे ।
**टीका—**गण्डः=निश्चयः, उपस्पृश्य=उपगम्य, मुञ्चतु=त्यजतु, कस्मिन्=कुत्र,

१० मृ०

१४६ | मृच्छकटिकम्

संवाहकः—कुदो मे पिदा ? (कुतो मे पिता ?)

माथुरः—मादरं विक्किणिअ पअच्छ । ( मातरं विक्रीय प्रयच्छ । )

संवाहकः—कुदो मे मादा ? ( कुतो मे माता ? )

माथुरः—अप्पाणं विक्किणिअ पअच्छ । ( आत्मानं विक्रीय प्रयच्छ । )

संवाहकः—कलेध पशादं, णेध मं लाजमग्गं । ( कुरुत प्रसादम् । नयत मां राजमार्गम् । )

माथुरः—पसरु । ( प्रसर )

संवाहकः—एव्वं भोदु । ( परिक्रामति ) अज्जा विक्किणिध मं इमश्श शहिशअश्श हत्यादो दशोहि शुवण्णकेहिं । (दृष्ट्वा आकाशे) कि भणाध ! 'किं कलइश्शि' त्ति । गेहे दे कम्मकले हुविशं । कथं अदइअ पडिवअणं गदे । भोदु, एव्वं इमं अण्णं भणइश्शं । ( पुनस्तदेव पठति ) कथं एशे वि मं अवधीलिअ गदे । हा ! अज्जचारुदत्तश्श विभवे विहडिदे एशे वड्ढामि मंदभाए । ( एवं भवतु । आर्य्याः! क्रीणीध्वं माम् अस्य सभिकस्य हस्तात् दशभिः सुवर्णैः । किं भणथ ? किं करिष्यसि ? इति । गेहे ते कर्मकरो भविष्यामि ।


कस्मिन् हेतौ वा, अबलम् = दुर्बलम्, धूर्तयामि = धूर्तताम् आचरामि = करोमि, प्रयच्छ=देहि ।

**विमर्श—गण्ड—**आजकल के 'वादा' के अर्थ में प्रयुक्त होता था । एक निश्चित समय पर देने की प्रतिज्ञा । साम्प्रतं गमिष्यामि — संवाहक अपनी चतुरता प्रकट करता है क्योंकि जो दश सुवर्ण उधार थे उनमें से पाँच माथुर से छुड़वा लिये और पाँच द्यूतकर से । इस प्रकार अब एक भी देय नहीं है । अतः संवाहक कहता है कि अब जा सकता हूँ । **धूर्तयामि—**आत्मानं धूर्तं करोमि इस अर्थ में 'तत्करोति तदाचष्टे' वार्तिक से धूर्त शब्द से णिच् होकर नामधातु प्रयोग है ।

**अर्थ—संवाहक—**मेरे बाप कहाँ है ।

**माथुर—**अपनी माँ को बेच दो ।

**संवाहक—**मेरी माँ कहाँ है ?

**माथुर—**तो अपने को बेच कर दो ।

**संवाहक—**मुझ पर (यह) कृपा करिये । मुझे राजपथ पर ले चलिये ।

**माथुर—**चलो ।

**संवाहक—**ऐसा हो अर्थात् चलिये । ( घूमता है ) सज्जनों ! इस प्रधान जुआरी के हाथों से मुझे दश सुवर्णों में खरीद लीजिये । ( ऊपर आकाश की ओर देखकर ) 'क्या कह रहे हो' 'क्या काम कर सकते हो ?' मैं आपके घर काम करने वाला नौकर बन सकता हूँ । कैसे, बिना उत्तर दिये हीं चला गया । ( कोई

द्वितीयोऽङ्कः १४७

कथमदत्त्वा प्रतिवचनं गतः ? भवत्वेवम्, इममन्यं भणिष्यामि । कथमेषोऽपि मामवधीर्य्य गतः ? । हा ! आर्य्यचारुदत्तस्य विभवे विघटिते एषो वर्त्ते मन्दभाग्यः । )

**माथुरः—**णं देहि । ( ननु देहि । )
**संवाहकः—**कुदो दइस्शं ? । ( इति पतति ) ( कुतो दास्यामि ? )
( माथुरः कर्षति । )
**संवाहकः—**अज्जा ! पलित्ताअध, पालिताअध । (आर्य्याः ! परित्रायध्वं परित्रायध्वम् । )
( ततः प्रविशति दर्दुरकः । )
**दर्दुरकः—**मोः ! द्यूतं हि नाम पुरुषस्य असिंहासनं राज्यम् ।


बात नहीं ) जाने दो । अब इस दूसरे आदमी से कहता हूँ । ( फिर वही='सज्जनों मुझे इस सभिक के हाथ से दश सुवर्णों में खरीद लें' कहता है । ) क्या, यह भी मेरी उपेक्षा करके चला गया ? हाय ! चारुदत्त का धन नष्ट हो जाने पर ( गरीब हो जाने पर ) मैं अभागा हो गया हूँ ।

**माथुर—**अरे ! दो ।
**संवाहक—**कहाँ से दूँ ? ( यह कह गिर पड़ता है। )
( माथुर खींचता है । )
**संवाहक—**सज्जनो ! बचाइये, बचाइये ।

**टीका—**विक्रीय=विक्रयं कृत्वा, प्रचर=चल, आकाशे=उपरि शून्य-प्रदेशे, भणथ=कथयथ । कर्मकरः=सर्वविधकार्यकरः भृत्यः, प्रतिवचनम्=उत्तरम्, अवधीर्य=उपेक्ष्य, विभवे=धनादौ, विघटिते=विनष्टे सति, तस्मिन् दरिद्रे जाते सति, वर्ते=भवामि, मन्दभाग्यः=हीनभाग्यः, परित्रायध्वम्=रक्षत, रक्षत । रङ्गमचे पात्राभावे सति आकाशे शून्यप्रदेशे विलोक्य यदुच्यते, तदाकाशभाषितमिति लक्षणकारैरुच्यते ।

**विमर्श—**जब रंगमञ्च पर न रहने वाले किसी पात्र को लक्षित कर ऊपर की ओर देखकर कुछ कहा जाता है । उसे आकाश-भाषित कहा जाता है । इसका निम्न लक्षण किया गया है—

किं ब्रवीषीति यन्नाट्ये विना पात्रं प्रयुज्यते ।
श्रुत्वेवानुक्तमप्यर्थं तत् स्यादाकाशभाषितम् ॥
साहित्य-दर्पण ।। ६ ।।

( इसके बाद दर्दुरक प्रवेश करता है । )

१४८ मृच्छकटिकम्

न गणयति पराभवं कुतश्चिद् हरति ददाति च नित्यमर्थजातम् । नृपतिरिव निकाममायदर्शी विभववता समुपास्यते जनेन ॥ ७ ॥

अन्वयः-—(द्यूतं कर्तृ) कुतश्चित्, (अपि), पराभवम्, न, गणयति, नित्यम्, अर्थजातम्, हरति, ददाति, च, विभववता (अपि), जनेन, निकामम्, आयदर्शी, राजा, इव, समुपास्यते ॥ ७ ॥

शब्दार्थः-—द्यूतम् = जुआ, कुतश्चित् = किसी से, भी, पराभवम् = पराजय, या अपमान को, न = नहीं, गणयति = गिनता है, मानता है, नित्यम् = रोज, प्रतिदिन, अर्थजातम् = धन-समुदायको, हरति = ले लेता है, च = और, ददाति = दे देता है, विभववता = धनवान्, भी, जनेन = पुरुष के द्वारा, निकामम् = प्रचुर, आयदर्शी = धनलाभ दिखलाने वाले, राजा इव = राजा के समान, समुपास्यते = सेवित होता है, खेला जाता है ॥ ७ ॥

अर्थ-संवाहक—जुआ, आदमी के लिये विना सिंहासन का राज्य है ।

(यह जुआ) किसी से भी (होने वाले) अपमान की गणना = परवाह नहीं करता है, प्रतिदिन बहुत धन ले लेता है (हरा देता है), और दे देता है (जिता देता है)। धनवान व्यक्ति के द्वारा (भी) नित्य प्रचुर आय दिखाने वाले राजा के समान सेवित होता है ॥ ७ ॥

टीका-—द्यूतम्, कुतश्चित् = कस्माच्चिद् अपि, पराभवम् = पराजयम्, अपमानम्, न = नैव, गणयति = विचिन्तयति, नित्यम् = प्रतिदिनम्, अर्थजातम् = धनसमूहम्, हरति = पराजयरूपेण हरति, ददाति = विजयरूपेण प्रयच्छति, च, विभववता = धनादिसम्पन्ने-नापि, जनेन = पुरुषेण, निकामम् = प्रचुरम्, आयदर्शी = आयप्रदर्शकः, राजा इव = भूपतिरिव, समुपास्यते = सेव्यते । यथा राजा मानापमाने न विचारयति, कस्यापि सर्वस्वं हरति, कस्मैचिच्च विपुलं धनं ददाति । तथैवेदं द्यूतमपि अस्ति । यथा प्रचुरायप्रदर्शकस्य राज्ञः आराधना अन्येन धनवतापि पुरुषेण क्रियते तथैव द्यूतस्यापि सेवनमधिकायप्रदर्शकमतो धनवतापि पुरुषेण द्यूतमुपसेव्यते । एवञ्च द्यूतस्य राज्ञश्च तुल्यत्वादुपमालंकारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ ७ ॥

विमर्शः-—दर्दुरक ने द्यूत को राजा के समान माना है। जैसे राजा किसी से हार नहीं मानता है बार बार युद्ध करता रहता है वैसे ही द्यूत में ही होता है। राजा किसी पर अप्रसन्न होकरं सब कुछ ले लेता है और प्रसन्न होने पर बहुत कुछ दे देता है, उसी प्रकार द्यूत भी कभी फकीर बना देता है और कभी मालामाल । जो राजा धनलाभ दिखाने वाला होता है उसकी सेवा में धनी भी, ओर अधिक धनलाभ की कामना से, लगे रहते हैं, वैसे ही लोग जुआ में भी लगे रहते हैं। निकामम् आयदर्शी—इस पुंल्लिङ्ग के स्थान पर 'आयदर्शि' यह नपुंसकलिङ्ग पाठ द्यूत के साथ और अधिक संगत होता है । अथवा—निकाम-मायदर्शि— यह मानकर विविध

द्वितीयोऽङ्कः १४७

अपि च—

द्रव्यं लब्धं द्यूतेनैव दारा मित्रं द्यूतेनैव ।
दत्तं भुक्तं द्यूतेनैव सर्वं नष्टं द्यूतेनैव ॥ ८ ॥

अपि च—

त्रेता-हृतसर्वस्वः पावर-पतनाच्च शोषितशरीरः ।
नर्दित-दर्शितमार्गः कटेन विनिपातितो यामि ॥ ९ ॥


छल प्रपञ्च दिखाने वाला द्यूत और राजा । इसमें उपमा अलंकार और पुष्पिताग्रा छन्द है। लक्षण

'अयुजि न युगरेफतो यकारो युजि च नजौ जरगाश्च पुष्पिताग्रा' ॥ ७ ॥

**अन्वयः—**द्यूतेन, एव, द्रव्यम्, लब्धम्, दाराः, मित्रम्, च, द्यूतेन, एव, दत्तम्, भुक्तम्, द्यूतेन एव, सर्वम्, नष्टम् ॥ ८ ॥

**शब्दार्थः—**द्यूतेन = जुआ के द्वारा, एव = ही, द्रव्यम् = धन, लब्धम् = मिला, द्यूतेन एव = जुआ के द्वारा ही, दाराः = स्त्रियाँ, मिलीं, मित्रम् = मित्र, मिला, द्यूतेन एव = जुआ के द्वारा ही, दत्तम् = दिया गया, भुक्तम् = भोग किया गया, द्यूतेन एव = जुआ के द्वारा ही, सर्वम् = सब कुछ, नष्टम् = नष्ट हो गया ॥ ८ ॥

**अर्थ—**और भी,

(मैंने) जुआ से ही धन पाया, जुआ से ही स्त्री (मिली), मित्र मिला, जुआ ने ही (सब कुछ) दिया, भोग किया और जुआ से ही सब कुछ नष्ट हो गया ॥ ८ ॥

**टीका—**मया कर्त्रा, द्यूतेन एव = करणभूतेन द्यूतेन, द्रव्यम् = धनम्, लब्धम् = प्राप्तम्, द्यूतेन एव, दाराः = स्त्रियः, स्त्री वा, लब्धा, मित्रम् = सुहृद्, लब्धम्, द्यूतेनैव कर्त्रा, दत्तम् = प्रदत्तम्, द्यूतेनैव = हेतुना, करणेन वा, सर्वम् = निखिलम्, नष्टम् = विनष्टम् । अत्रैकस्यैव कारकस्यानेक-क्रिया-सम्बन्धात् कारकदीपकमलङ्कारः, विद्युन्मालावृत्तम् ॥ ८ ॥

**विमर्शः—**दर्दुरक यहाँ यह कहता है कि मुझे जो कुछ मिला या खोया वह सब द्यूत के कारण ही हुआ । द्यूतरूपी एक ही कारक का अनेक क्रियाओं के साथ सम्बन्ध होने से कारकदीपक अलंकार है। कुछ ने विषमालंकार माना है। विद्युन्माला छन्द है। लक्षण—मो मो गो गो विद्युन्माला ॥ ८ ॥

**अन्वयः—**त्रेताहृतसर्वस्वः, पावरपतनात्, च, शोषितशरीरः, नर्दितदर्शित-मार्गः, कटेन, विनिपातितः, यामि ॥ ९ ॥

**शब्दार्थ—**त्रेताहृत-सर्वस्वः = त्रेता (तीया नामक एक खास चाल) से सर्वस्व हार जाने वाला, च = और, पावर-पतनात् = पावर = दूआ नामक खेल की चाल गिरने से, शोषित-शरीरः = सूखे निश्चेष्ट शरीर वाला, नर्दित-दर्शित-मार्गः = नर्दित = नडका

१५० मृच्छकटिकम्

( अग्रतोऽवलोक्य ) अयमस्माकं पूर्वसभिको माथुर इत एवाभिवर्त्तते । भवतु, अपक्रमितुं न शक्यते । तदवगुण्ठयाम्यात्मानम् । ( बहुविधं नाट्यं कृत्वा स्थितः । उत्तरीय निरीक्ष्य )

अयं पटः सूत्रदरिद्रतां गतो ह्ययं पटश्छिद्रशतैरलङ्कृतः । अयं पटः प्रावरितुं न शक्यते ह्ययं पटः संवृत एव शोभते ॥ १० ॥


नामक खास चाल से ( हारने के कारण ) दिखाई गयी रास्ता वाला, कटेन=पूरा नामक चाल से, विनिपातितः=गिराया गया, ( मैं ), यामि=जा रहा हूँ ॥ ६ ॥

अर्थ— और भी,

तीया ( नाम की एक खास चाल ) से जिसका सारा धन हरण हो गया, दुआ ( नाम की खास चाल ) के चलने=गिरने से जिसका सारा शरीर सूखा = सुन्न=निश्चेष्ट हो गया, नक्का ( नाम की चाल ) से ( हारने के कारण भागने के लिये जिसे) रास्ता दिखा दिया गया, और पूरा (नामक चाल) से जो गिरा दिया गया, वैसा मैं ( दुःखी ) जा रहा हूँ ॥ ६ ॥

टीका— त्रेताहृत-सर्वस्वः त्रेताख्य-क्रीडा-प्रकार-विशेषेण 'तीया' इति प्रसिद्धेन, हृतम्=गतम् सर्वस्वम् = निखिलं धनं यस्य सः, पावरपतनात् = पावरस्य 'दुआ' इति प्रसिद्धस्य क्रीडनप्रकारस्य, पतनात् = भ्रंशात्, शोषित-शरीरः = शोषितम्=शुष्कताम् = निश्चेष्टतां नीतम्, शरीरम्=देहो यस्य सः तादृशः, नर्दित-दर्शितमार्गः = 'नक्का' इति क्रीडन-प्रकारेण पराजितत्वात् गृहगमनाय दर्शितः=प्रदर्शितः, मार्गः = पन्थाः, यस्य सः, कटेन = 'पूरा' इति ख्यातेन क्रीडनप्रकारेण, विनिपातितः = पराजयात् भूमौ प्रपातितः, यामि = असहायो भूत्वा व्रजामि । प्राचीनकाले द्यूतक्रीडायां त्रेता-पावर-नर्दित-कट-शब्दाः प्रचलिता आसन् तेषां कृतेऽधुना तीया-दुआ-नक्का-पूरा-शब्दाः प्रयुज्यन्ते । आर्यावृत्तम् ॥ ९ ॥

विमर्श— द्यूतक्रीडा में प्रयुक्त होने वाले चार पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग इसमें किया गया—( १ ) त्रेता=तीया ( आजकल तीन, सात, ग्यारह, पन्द्रह ) ( २ ) पावर=दुआ ( दो, छह, दश चौदह वगैरह ) ( ३ ) नर्दित=नक्का ( एक पाँच नौ तेरह ) ( ४ ) कट=पूरा ( चार, आठ, बारह, सोलह ) । इन चारों दावों ने उसे धोखा दिया है, यह उसका भाव है । इसमें आर्या छन्द है ॥ ६ ॥

अर्थ— ( आगे देखकर ) यह हमारा पुराना द्यूत-क्रीडाध्यक्ष माथुर इधर ही आ रहा है । अच्छा, भागना तो सम्भव नहीं है । अतः अपने को छिपा लेता हूँ । ( कई प्रकार से शरीर को ढकने का अभिनय करके खड़ा होता है । उस उत्तरीय वस्त्र को देखकर— )

अन्वयः— अयम्, पटः, सूत्रदरिद्रताम्, गतः, अयम्, पटः, छिद्रशतैः, अलङ्कृतः, अयम्, पटः, प्रावरितुम्, न, शक्यते, अयम्, पटः, संवृतः, एव, शोभते ॥१०॥

द्वितीयोऽङ्कः १५१

अथवा किमयं तपस्वी करिष्यति । यो हि—
पादेनैकेन गगने द्वितीयेन च भूतले ।
तिष्ठाम्युल्लम्बितस्तावद् यावत्तिष्ठति भास्करः ॥ ११ ॥

शब्दार्थ— अयम्=यह (मेरा), पटः=कपड़ा, सूत्रदरिद्रताम्=सूतों की जीर्णता को, गतः=प्राप्त हो चुका है, अयम्=यह, पटः=कपड़ा, छिद्रशतैः=सैकड़ों छेदों से, अलङ्कृतः=सजा हुआ, युक्त है, अयं पटः = यह कपड़ा, प्रावरितुम्=शरीर ढकने के लिये, न शक्यते=नहीं सम्भव है, अयं पटः=यह कपड़ा, हि=निश्चितरूप से, संवृतः= लपेटा, घरी किया हुआ, एव=ही, शोभते=अच्छा लगता है ॥ १० ॥

अर्थ — यह कपड़ा (मेरा दुपट्टा) जीर्ण शीर्ण सूतों वाला हो चुका है। यह कपड़ा सैकड़ों छिद्रों से युक्त है। यह कपड़ा (शरीर) ढकने में समर्थ नहीं है। यह कपड़ा, निश्चित रूप से, लपेटा हुआ ही अच्छा लगता है ॥ १० ॥

टीका— अयम् = हस्तस्थितः, मदीयः, पटः = उत्तरीयम्, सूत्रदरिद्रताम् = सूत्राणाम्=तन्तूनाम्, दरिद्रताम्=जीर्णताम्, गतः=प्राप्तः, अतीव जीर्णोऽभवदिति भावः, अयं पटः=इदमूत्तरीयम्, हि=निश्चयेन, छिद्रशतैः=शताधिकविवरैः, अलङ्कृतः= विभूषितः, युक्तः, अगणितछिद्रयुक्तः इति भावः, अयं पटः = इदमूत्तरीयम्, प्रावरितुम् = आच्छादयितुम्, न=नैव, शक्यते=समर्थ्यते, अयं पट = इदमूत्तरीयम्, संवृतः = परिवेष्टितः, एव, हि = निश्चयेन, शोभते = भाति । अत्र 'अयं पटः' इत्यस्यावृत्त्या अनवीकृतत्वदोषः । वंशस्थबिलं वृत्तम् ॥ १० ॥

विमर्श — प्रावरितुम् — प्र+आङ् + √वृ + तुमुन् ।
संवृतः— सम् + √वृ + क्त । इसमें 'अयं पटः' का चार बार प्रयोग होने से अनवीकृतत्वदोष है। साधारणपात्र का कथन होने से चिन्तनीय नहीं है। इसमें वंशस्थबिल छन्द है । लक्षण— 'जतो तु वंशस्थबिलं जतौ जरौ' ॥ १० ॥

अन्वयः— एकेन, पादेन, गगने, द्वितीयेन, च, भूतले, उल्लम्बितः, तावद्, तिष्ठामि, यावत्, भास्करः, तिष्ठति ॥ ११ ॥

शब्दार्थ— एकेन = एक, पादेन = पैर से, गगने = आकाश में च = और, द्वितीयेन=दूसरे से, भूतले=पृथ्वी पर, उल्लम्बितः=ऊपर लटका हुआ, तावत्=तब तक, तिष्ठामि=रह सकता हूँ, यावत्=जब तक, भास्करः=सूरज, तिष्ठति=[आकाश में लटका] रहता है ॥ ११ ॥

अर्थ— अथवा यह बेचारा (तुच्छ) माथुर मेरा क्या कर सकता है जो मैं— एक पैर से आकाश में [अर्थात् ऊपर करके] और दूसरे से पृथ्वी पर [अर्थात् नीचे करके] तब तक लटका हुआ रह सकता हूँ जब तक कि आकाश में सूरज (लटकता हुआ) रहता है ॥ ११ ॥

टीका— यो अहम्=दर्दुरकः-इति गद्यस्थेनान्वयः—एकेन पादेन=चरणेन,