मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः १२३
चारु०--मैत्रेय ! अनुगच्छ तत्रभवतीम् ।
विदू०--तुमं ज्जेव एदं कलहंसगामिणीं अणुगच्छन्तो राअहंसो विअ सोहसि । अहं उण वह्मणो जंहि तंहि जणेहिं चउप्पहोवणीदो विअ उवहारो कुक्कुरेहिं विअ खज्जमाणो विवज्जिस्सं । ( त्वमेव एतां कलहंसगामिनीम् अनुगच्छन् राजहंस इव शोभसे । अहं पुनर्ब्राह्मणः यस्मिन् तस्मिन् जनैः चतु-ष्पथोउपनीतः इवोपहारः कुक्कुरैरिव खाद्यमानो विपत्स्ये । )
चारु०--एवं भवतु, स्वयमेवानुगच्छामि तत्रभवतीम् । तद्राजमार्गवि-श्वासयोग्याः प्रज्वाल्यन्तां प्रदीपिकाः ।
विदू०--वड्ढमाणअ ! पज्जालेहि पदीविआओ । ( वर्द्धमानक ! प्रज्वा-लय प्रदीपिकाः । )
चेटः-- [ जनान्तिकम् । ] अले ! तेल्लेण विणा पदीविआओ पज्जाली-अन्ति ? । ( अरे ? । तैलेन विना प्रदीपिकाः, प्रज्वाल्यन्ते ? । )
विदू०-- [ जनान्तिकम् । ] भो ! ताओ क्खु अम्हाणं पदीविआओ अव-माणिद-णिद्धण-कामुआ विअ गणिआ णिस्सिणेहाओ दाणिं संवुत्ता । ( भोः ! ताः खल्वस्माकं प्रदीपिकाः, अपमानित-निर्द्धन-कामुका इव गणिकाः, निस्नेहा इदानीं संवृत्ताः । )
चारुदत्त-- मैत्रेय ! सम्माननीया के साथ जाओ ।
विदूषक-- कलहंसी के समान सुन्दर गमन करने वाली इनके साथ जाते हुये राजहंस के समान आप की ही शोभा है । और मैं ( दुर्बल ) ब्राह्मण ( रास्ते में दुष्ट शकारादि के द्वारा ) उसी प्रकार मारा डाला जाऊँगा जिस प्रकार लोगों द्वारा इधर उधर चौराहों पर रखी हुई बलि को कुत्ते खा डालते हैं ।
चारुदत्त-- ऐसा ही हो । इन श्रीमती जी के साथ मैं ही जा रहा हूँ । इस लिये राजमार्ग में विश्वासयोग्य ( अर्थात् न बुझने वाले ) दीपों को जलाओ ।
विदूषक-- वर्द्धमानक ! दीपक जलाओ ।
चेट-- ( अलग विदूषक से ) अरे ! बिना तेल के कहीं दीपक जलाये जाते हैं ।
विदूषक-- ( अलग चेट से ) अरे ? हमारी वे लालटेनें ( प्रदीपिका ), धनहीन कामुक व्यक्तियों को अपमानित करने वाली, वेश्याओं के समान इस समय स्नेहरहित ( प्रेमरहित, तेलरहित ) हो गई हैं ।
टीका--अपरिज्ञातपरिजनापचारेण=अपरिज्ञातायां त्वयि ( वसन्तसेवा याम् ) परिजनवदुपचारेण=आज्ञाकरणादिरूपेण, अपराधः=अपराधी, अनुचितभूमिकारोहेण= भूमिका=चारुदत्तभवनम्, तस्याम् आरोहणम्=प्रवेशः, अनुचितं च यद् भूमिका-रोहणम्, वेश्यात्वात् तव गृहे मम प्रवेशोऽयोग्यः, स मया विहितः अतोऽहमेव तवा-