मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ | मृच्छकटिकम्
( द्यूतेन तत् कृतं मे यद्विहस्तं जनस्य सर्वस्य ।
इदानीं प्रकटशीर्षो नरेन्द्रमार्गेण विहरिष्यामि ॥ १७ ॥
( नेपथ्ये कलकलः )
संवाहकः—(आकर्ण्य) अले ! किं ण्णेदं ! ( आकाशे ) किं भणाध ? 'एशे क्खु वसन्तशेणाआए खुण्टमोडके णाम दुट्ठहत्थी विअलेदि'त्ति । अहो ! अज्जआए गन्धगअं पेक्खिशं गदुअ । अहवा किं मम एदिणा । जधाववशिदं अणुचिट्ठिश्शं । ( अरे किं विन्दम् ? किं भणथ ? एष खलु वसन्तसेनायाः खुण्टमोडको नाम दुष्टहस्ती विकलयतीति । अहो ! आर्याया गन्धगजं प्रेक्षिष्ये गत्वा । अथवा, किं मम एतेन, यथाव्यवसितमनुष्ठास्यामि । )
(इति निष्क्रान्तः ।)
पाठःस्यात् तदा अर्थबोधः सुकरः । सर्वजनस्य यद् विहस्तं—हस्तशब्देन हस्तशस्त्रम्, विगतहस्तशस्त्रं भवति—निर्भयमित्यर्थः इति लल्लादीक्षितः । इदानीम्=द्यूतदेयदशसुवर्णसमर्पणानन्तरं साम्प्रतम्, प्रकटशीर्षः=प्रकटम्=उन्नमितम्, यद्वा ऋणमुक्तत्वात् भिक्षुकतया कस्मादप्यभीतेः, प्रकाशितम्, शीर्षम्=मस्तकं यस्य सः तथाभूतः, नरेन्द्रमार्गेण=राजपथेन, विहरिष्यामि=सञ्चरिष्यामि । अत्रार्यावृत्तम् ॥१७॥
**विमर्शः—**इस श्लोक में 'वीहत्थम्' प्राकृत का 'विहस्तम्'—संस्कृतरूप है। इसके अर्थ पर विवाद है । विगतः हस्तः यस्मिन् कर्मणि तत् जहाँ किसी का हाथ नहीं पहुँच पाता है, ऐसा दुष्कर कार्य कर डाला । (२) 'विहस्तभ्याकुलो समौ' इस अमरकोश के अनुसार व्याकुल—भावप्रधाननिर्देश मानकर—व्याकुलत्वं कृतम् । लल्लादीक्षितने—हस्तशब्देन हस्तशस्त्रं विगतहस्तशस्त्रं भवति निर्भयमित्यर्थः । वास्तव में इसका सीधा अर्थ कठिन ही है । यदि किसी प्रकार यहाँ 'विहसितम्' अथवा कुछ लोगों द्वारा स्वीकृत 'बीभत्सम्' पाठ मान लिया जाय तो अर्थबोध में कठिनता नहीं होगी । द्यूत ने मेरा यह किया कि सभी लोग मुझ पर हंसने लगे । अथवा बीभत्स कर दिया—कि अब संन्यासी बनने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं रह गया है । चूंकि कर्जा उतर गया है अतः मुक्त होकर शिर मुड़ा कर अथवा उठाकर घूमने में कोई भय नहीं है ॥ १७ ॥
( नेपथ्य में कोलाहल )
अर्थ—संवाहक—( सुन कर ) अरे ! यह क्या है ? ( आकाश में—ऊपर की ओर ) क्या कह रहे हो—वसन्तसेना का खुण्टमोडक नामक दुष्ट हाथी घूम रहा है । अहो ! आर्या के मदगंधवाले हाथी को देखता हूँ । अथवा, मुझे इससे क्या ? निश्चय के अनुसार काम करूँगा ( अर्थात् संन्यासी बन जाऊँगा । )
( यह कह कर निकल जाता है । )