मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽङ्कः १७३.
( ततः प्रविशति अपटीक्षेपेण प्रहृष्टो विकटोज्ज्वलवेषः कर्णपूरकः । )
कर्णपूरकः— कहिं ! कहिं अज्जआ ? ( कस्मिन् कस्मिन् आर्या ? )
चेटी— दुम्मणुस्स ! किं ते उव्वेअकारणं जं अग्गदोवट्ठिदं अज्जअं ण पेक्खसि ? ( दुर्मनुष्य ! किं ते उद्वेगकारणम् यदग्रतोऽवस्थितामार्याँ न प्रेक्षसे ? )
कर्णपूरकः— ( दृष्ट्वा ) अज्जए ! वन्दामि । ( आर्ये ! वन्दे । )
वसन्तसेना— कण्णऊरअ ! परितुट्ठमुहो लक्खीअदि, ता किं ण्णेदं ? ) ( कर्णपूरक ! परितुष्टमुखो लक्ष्यसे, तत् किंन्विदम् ? )
कर्णपूरकः— ( सविस्मयम् ) अज्जए ! वञ्चिदासि, जाए अज्ज कण्णऊरस्स परिक्कमो ण दिट्ठो । ( आर्ये ! वञ्चितासि, यया अद्य कर्णपूरकस्य पराक्रमो न दृष्टः )
वसन्तसेना— कण्णऊरअ ! किं किं ? ( कर्णपूरक ! किं किम् ? )
कर्णपूरकः— सुणादु अज्जआ, जो सो अज्जआए खुण्टमोडओ णाम दुट्ठहत्थी सो अलाणत्थम्भं भञ्जिअ, महामेत्तं वावादिअ महन्तं संखोभं करन्तो राअमग्गं ओदिण्णो । तदो एत्थन्तरे उग्घुट्टं जणेण— ( शृणोतु आर्याः, यः स आर्यायाः खुण्टमोडको नाम दुष्टहस्ती, स आलानस्तम्भं भंक्त्वा, महामात्रं व्यापाद्य महान्तं संक्षोभं कुर्वन्, राजमार्गवतीर्णः । ततः अत्रान्तरे उदघुष्टं जनेन )——
( इसके बाद बिना परदा हटाये प्रसन्न, विकट उज्ज्वल वस्त्रोंवाला कर्णपूरक प्रवेश करता है । )
कर्णपूरक— आर्या कहाँ है, कहाँ ?
चेटी— अरे दुष्ट पुरुष ! तुम्हारी व्यग्रता किस लिये है जो सामने बैठी हुई भी आर्या ( वसन्तसेना ) को नहीं देख पा रहे हो ?
कर्णपूरक— ( देख कर ) आर्ये ! प्रणाम करता हूँ ।
वसन्तसेना— कर्णपूरक ! तुम्हारा मुख बहुत खुश दिखाई दे रहा है । इसका क्या कारण है ?
कर्णपूरक— ( विस्मयपूर्वक ) आर्ये ! आप वंचित रह गईं जो आपने आज कर्णपूरक का पराक्रम नहीं देखा ।
वसन्तसेना— कर्णपूरक ! क्या, क्या ?
कर्णपूरक— आर्या आप सुनें—आपका वह जो खुण्टमोडक नामक दुष्ट हाथी है, वह अपने बन्धनस्तम्भ को तोड़कर, महावत को मारकर भीषण उपद्रव करता हुआ, प्रधान मार्ग पर आ गया । इसके बाद लोगों ने घोषणा की कि —
टीका— विकलयति = व्याकुलो भूत्वा भ्राम्यति, अत्र 'विचरति' इति पाठान्तरम्, गन्धगजम् - गन्धप्रधानो गजः, गन्धराजः । तदुक्तं पालकप्ये—