भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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द्वितीयोऽङ्कः | १७५

अवि च । (अपि च )

विच्चलइ णेउरजुअलं छिज्जन्ति अ मेहला मणिक्खइआ ।
बलआ अ सुन्दरदरा रअणङ्कुर-जाल-पड़िवद्धा ॥ १६ ॥
( विचलति नूपुरयुगलं छिद्यन्ते च मेखला मणिखचिताः ।
वलयाश्च सुन्दरतरा रत्नाङ्कुरजालप्रतिबद्धाः ॥ १६ ॥ )

तदो तेण दुट्ठहत्थिणा कल-चलण-रदणेहिं फुल्लणलिणि विअ णअरिं उज्जइणिं अवगाहमाणेण समासादिदो परिव्वाजओ । तं अ परिब्भट्ठ-दण्डकुण्डिआभाअणं सीअरेहिं सिञ्चिअ दन्तन्तरे क्खित्तं पेक्खिअ पुणोवि उग्घुट्ठं जणेण—'हा परिव्वाजओ वावादीअदि'त्ति । ( ततस्तेन दुष्टहस्तिना


**अन्वयः—**नूपुरयुगलम्, विचलति, मणिखचिताः, मेखलाः, रत्नाङ्कुरजाल-प्रतिबद्धाः, सुन्दरतराः, वलयाः, च, छिद्यन्ते ॥ १६ ॥

**शब्दार्थ—**नूपुरयुगलम्=( स्त्रियों के पैरों के ) पायजेब नामक आभूषण की जोड़ी, विचलति=गिर पड़ रही है, मणिखचिताः=मणियों से जड़ी हुई, मेखलाः=करधनियाँ, च = और, रत्नाङ्कुरजालप्रतिबद्धाः = जटितरत्नों की किरणों के समुदाय से युक्त, सुन्दरतराः=अत्यधिक सुन्दर, वलयाः=हाथों के कंगन, छिद्यन्ते=टूट रहे हैं ॥ १६ ॥

**अर्थ—**और भी --- ( दुष्ट हाथी द्वारा मार डालने आदि के भय से भागती हुई स्त्रियों की ) पायजेबों की जोड़ी ( पैरों से ) निकलकर गिर जा रही हैं । मणियों से जटिल करधनियाँ ( टूट रहीं हैं ), जड़े हुये रत्नों की किरणों के समूह से युक्त, अत्यन्त सुन्दर कंगन टूट जा रहें हैं) ॥ १६ ॥

टीका—( दुष्टगजस्य आगमनं श्रुत्वा भयवशात् पलायमानानां स्त्रीणाम् - ) नूपुरयुगलम्=पादकटकयुगम् ( हिन्द्यां पायजेब इति ख्यातम् ) विचलति=पादेभ्यः निःसरति, मणिखचिताः=रत्नजटिताः, मेखलाः=काञ्च्यः, =तथा, रत्नाङ्कुर-जाल-प्रतिबद्धाः = जटिलरत्नकिरणसमूहयुक्ताः, सुन्दरतराः = अतिशयशोभावन्तः, वलयाः=कटकानि, छिद्यन्ते=छिन्ना भवन्तीति भावः । आर्यावृत्तम् ॥१६॥

विमर्श— विचलति—वि + √चल् + लट् प्र. पु. ए. व. । उपसर्ग के कारण-निकलना, गिरना अर्थ है । छिद्यन्ते--कर्म अर्थ में √छिद् लट् का रूप है । इसका सम्बन्ध 'मेखलाः' और 'वलयाः' इन दोनों के साथ है । रत्नाङ्कुरजाल-प्रतिबद्धाः--अङ्कुर=किरण । भय से घबड़ाकर भागती हुई स्त्रियों का सुन्दर वर्णन है । इसमें आर्या छन्द है ॥ १६ ॥

**अर्थ--**इसके बाद ( अपनी ) सूँड़, पैर और दांतों से, फूली हुई कमलिनी के समान सुन्दर उज्जैन नगरी को रौंदते हुये ( छिन्न भिन्न करते हुये ) उस दुष्ट