भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१७६मृच्छकटिकम्

कर-चरण-रदनैः फुल्लनलिनीमिव नगरीमुज्जयिनीमवगाहमानेन समासादितः परिव्राजकः । तञ्च परिभ्रष्टदण्डकुण्डिकाभाजनं शीकरैः सिक्त्वा दन्तान्तरे क्षिप्तं प्रेक्ष्य, पुनरपि उद्घुष्टं जनेन--'हा परिव्राजको व्यापाद्यत' इति ।)

वसन्तसेना--(ससम्भ्रमम्) अहो पमादो, अहो पमादो ! । (अहो प्रमादः । अहो प्रमादः ।)

कर्णपूरकः-अलं सम्भ्रमेण । सुणाद दाव अज्जआ । तदो विच्छिण्णविस-ण्ठुल-सिङ्खला-कलावअं उव्वहन्तं दन्तरपरिगहिदं परिव्वाअं उव्वहन्तं तं पेक्खिअ, कण्णउरएण मए-णहि णहि अज्जआए अण्ण-पिण्डोवपुट्ठेण दासेण वामचलणेण जूदलेखं उग्घुसिअ, उग्घुसिअ तुरिदं आवणादो लोहदण्डं गेण्हिअ आकारिदो सो दुट्ठहत्थी । ( अलं सम्भ्रमेण । शृणोतु तावदार्या । ततो विच्छिन्न-विसंष्ठुल-शृङ्खलाकलापम् उद्वहन्तं दन्तान्तरपरिगृहीतं परिव्राजक-मुद्वहन्तं तं प्रेक्ष्य, कर्णपूरकेण मया-नहि नहि, आर्याया अन्नपिण्डोपपुष्टेन दासेन, वामचरणेन द्यूतलेखकम् उद्घुष्य उद्घुष्य, त्वरितमपणात् लोहदण्डं गृहीत्वा, आकारितः स दुष्टहस्ती ।)

हाथी ने बौद्ध संन्यासी को पकड़ लिया । जिसका दण्ड और केमण्डलु (भोजन का पात्रविशेष ) गिर गया है, उसे पानी की बूँदों से सींच कर दातों के बीच में दबाया हुआ देखकर लोगों ने फिर चिल्लाकर कहा--'हाय ! बौद्ध संन्यासी मारा जा रहा है ।'

वसन्तसेना-- ( घबराहट के साथ ) अरे ! बड़ा अनर्थ हुआ, बड़ा अनर्थ हुआ ।

कर्णपूरक--घबड़ाने की आवश्यकता नहीं है । आप सुनिये तो । इसके बाद छिन्न भिन्न हिलती डुलती जञ्जीरों से युक्त, दांतों के बीच में पकड़े गये संन्यासी को उठाये हुये उस ( दुष्ट मत्त ) हाथी को देखकर मुझ कर्णपूरक ने--नहीं नहीं, ( ऐसा नहीं हो सकता ), आपके अन्नदाना से परिपुष्ट इस सेवक ने जुआ के लेखक को बारबार कह कर साहस बंधाकर, शीघ्र ही दूकान से लोहे की एक छड़ लेकर, बायीं ओर चलकर ( पैतरा बदल कर ) उस दुष्ट हाथी को ललकारा ।

टीका--दुष्टहस्तिना=विक्षिप्तगजेन, कर-चरण-रदनैः=शुण्डादण्डपाद-दन्तैः, फुल्लनलिनीमिव=विकसितकमलिनीमिव, अवगाहमानेन=वलोडयता, समासादितः=गृहीतः, परिव्राजकः=बौद्धसंन्यासी, परिभ्रष्ट-दण्ड-कुण्डिका-भाजनम्=परिभ्रष्टे=हस्तात् भूमौ पतिते, दण्डकुण्डिका-भाजने=दण्डः = संन्यासिधारणयोग्यो दण्डः, कमण्डलुपात्रञ्च च यस्मात् तम्, शीकरैः=मुखस्थितजलबिन्दुभिः, सिक्त्वा=आर्द्री-कृत्य, दन्तान्तरे=दन्तद्वयस्य मध्ये, क्षिप्तम्=स्थापितम्, प्रेक्ष्य=विलोक्य, उद्घुष्टम्=