भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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द्वितीयोऽङ्कः

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कर्णपूरकः— इमं णाम, अज्जआ एव्व वाअएदु । (इदं नाम, आर्यैव वाचयतु ।)
(इति प्रावारकमुपनयति ।)
वसन्तसेना— अज्जचारुदत्तस्स । (आर्यचारुदत्तस्य ।) (इति वाचयित्वा सस्पृहं गृहीत्वा प्रावृणोति ।)
चेटी— कण्णऊरअ ! सोहइ अज्जआए पावारओ । (कर्णपूरक ! शोभते आर्यायाः प्रावारकः ।)
कर्णपूरकः— आं सोहइ, अज्जआए पावारओ । (आम्, शोभते आर्यायाः प्रावारकः ।)
वसन्तसेना— कण्णऊरअ ! इदं दे पारितोसिअं (कर्णपूरक ! इदं ते पारितोषिकम् ।) (इत्याभरणं प्रयच्छति ।)
कर्णपूरकः— (शिरसा गृहीत्वा प्रणम्य च) संपदं सुट्ठु सोहइ अज्जआए पावारओ । (साम्प्रतं सुष्ठु शोभते आर्यायाः प्रावारकः ।)
वसन्तसेना— कण्णऊरअ ! एदाए वेलाए कहिं अज्जचारुदत्तो ? । (कर्णपूरक ! एतस्यां वेलायां कस्मिन्नार्यचारुदत्तः ? )
कर्णपूरकः— एदेण ज्जेव मग्गेण पवुत्तो गन्तुं । (एतेनैव मार्गेण प्रवृत्तो गन्तुं गेहम् ।)
वसन्तसेना— हञ्जे ! उवरिदणं अलिन्दअं आरुहिअ अज्जचारुदत्तं पेक्खेह्म । (हञ्जे ! उपरितनमलिन्दकमारुह्य आर्यचारुदत्तं प्रेक्षामहे ।)


कर्णपूरक— यह नाम, आर्या ही पढ़ें । (यह कह कर उत्तरीय दे देता है ।)
वसन्तसेना— आर्य चारुदत्त का (नाम है) । (यह पढ़कर लालसापूर्वक लेकर ओढ़ लेती है ।)
चेटी— कर्णपूरक ! यह दुपट्टा आर्या पर अच्छा लग रहा है।
कर्णपूरक— हाँ, आर्या पर बहुत अच्छा लग रहा है।
वसन्तसेना— कर्णपूरक ! यह तुम्हारा पुरस्कार है।
(यह कहकर आभूषण देती है ।)
कर्णपूरक— (विनीतशिर से लेकर प्रणाम करके) अब आर्या के शरीर पर यह दुपट्टा बहुत ही अच्छा लग रहा है।
वसन्तसेना— कर्णपूरक ! इस समय आर्य चारुदत्त कहाँ होंगे ?
कर्णपूरक— इसी रास्ते से घर जा रहे हैं।
वसन्तसेना— दासी ! ऊपर वाली छत पर चढ़ कर आर्य चारुदत्त का