मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० मृच्छकटिकम्
( इति निष्क्रान्ताः सर्वे । )
॥ इति द्यूतकरसंवाहको नाम द्वितीयोऽङ्कः ॥
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दर्शन करें।
( इस प्रकार सभी पात्र निकल जाते हैं । )
॥ इस प्रकार द्यूतकर संवाहक नाम वाला दूसरा अंक समाप्त हुआ ।
टीका—प्रेक्षस्व = पश्य, उपनयति = समर्पयति, प्रावारकः = उत्तरीयम्, प्रावृणोति=आच्छादयति, शिरसा=अवनतमस्तकेन, कस्मिन्=कुत्र, आलिन्दकम्= ‘प्रघाणम्, ‘प्रघाणप्रघणालिन्दा बहिर्द्वारप्रकोष्ठके’ अमरकोषः २।११ इत्यमरः ।
विमर्श—नामापि--नाम भी। सस्पृहम्--बहुत उत्सुकता के साथ। प्रावृणोति--प्र+आङ् + √वृ+लट् प्र. पु. ए. व.। आलिन्दकम्-मकान के ऊपरी कमरे को अलिन्द कहा जाता है । प्रेक्षामहे--प्र+√ईक्ष+लट् प्र. पु. ब. व. ।
॥ जय-शङ्करलाल-त्रिपाठिविरचित भावबोधिनी-व्याख्या में मृच्छकटिक का द्वितीय अङ्क समाप्त हुआ ॥
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