भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१८२ मृच्छकटिकम्

अवि अ ( अपि च )---

अश्श-पलक्क-वलद्ददे ण शक्कि वालिदुं अण्ण-कलत्त-पशत्ते ण शक्कि वालिदुं । जूद-पशत्त-मणुश्शे ण शक्कि वालिदुं जे वि शहाविअदोशे ण शक्कि वालिदुं ॥२॥ ( सस्य-लम्पट-बलीवर्द्दो न शक्यो वारयितु- मन्य-कलत्र-प्रसक्तो न शक्यो वारयितुम् ।


चारुदत्त के निर्धन हो जाने पर भी उसके गुणों के कारण उसी की सेवा करना अच्छा समझता है । उसे छोड़ कर दुष्ट शकार आदि की सेवा में जाना वह हितकर नहीं मानता है । इससे चारुदत्त की भृत्य-प्रियता स्पष्ट होती है । भृत्यानुकम्पकः-- भृत्यानाम् अनु + √कम्प् + ण्वुल् = अक । निर्धनकः--स्वार्थ में 'क' प्रत्यय है । पिशुनः--पिशुनो दुर्जनः खलः--अमरकोष (३.१.४७) के आधार पर-दुर्जन । दुष्करः- दुः + √कृ + खल्=अ, "ईषददुःसुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल्" ( पा. सू. ३।३।१२६ ) यहाँ अर्ह अर्थ है । दुःख से करने योग्य । तात्पर्य है -दुःख से प्रसन्न करने या सेवा करने योग्य । यहाँ प्रस्तुत चारुदत्त की प्रतीति होने से अप्रस्तुत-प्रशंसा अलंकार है । और वैतालीय छन्द है । लक्षण टीका में देखें ।। १ ।।

**अन्वयः---**सस्य-लम्पट-बलीवर्दः, वारयितुम्, न, शक्यः, अन्यकलत्रप्रसक्तः, ( जनः ), वारयितुम्, न, शक्यः, द्यूतप्रसक्त-मनुष्यः, वारयितुम्, न, शक्यः, यः अपि, स्वाभाविकदोषः, ( सः ), वारयितुम्, न शक्यः ॥ २ ॥

**शब्दार्थ---**सस्य-लम्पट-बलीवर्दः = हरा धाने ( खाने ) का लालची बैल ( साँड़ ), वारयितुम् = रोकना, न = नहीं, शक्यः = सम्भव है, अन्य-कलत्र-प्रसक्तः = दूसरे की स्त्रियों में आसक्त = प्रेम करने वाला मनुष्य, वारयितुम् = रोकना, न = नहीं शक्यः = सम्भव है, द्यूत-प्रसक्त-मनुष्यः = जुआ खेलने में लगा रहने वाला आदमी, वारयितुम् = रोकना, न = नहीं, शक्यः = सम्भव है, यः अपि = जो भी, स्वाभाविक-दोषः = स्वाभाविक = नैसर्गिक अवगुण है, वह, वारयितुम् = रोकना, न = नहीं, शक्यः = सम्भव है ।। २ ।।

अर्थ---और भी--- हरे हरे धान ( खाने ) का लालची बैल = साँड़ (वहाँ जाने से) रोकना सम्भव नहीं है, दूसरे की स्त्रियों में फंसा हुआ अर्थात् उनसे प्रेम करने वाला मनुष्य रोका नहीं जा सकता । जुआ खेलने की आदत वाला मनुष्य रोका नहीं जा सकता । और भी जो स्वाभाविक दुर्गुण होता है उसे छोड़ पाना कठिन है ॥ २ ॥

टीका---सस्य-लम्पट-बलीवर्दः = सस्यानाम् = हरितधान्यानाम्, भक्षणे, लम्पटः =