भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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तृतीयोऽङ्कः १८५

विदूषकः--भो ! एहि, गेहं गच्छेम्ह । ( भो एहि, गेहं गच्छामः । ) चारुदत्त--अहो ! सुष्ठु भावरेभिलेन गीतम् । विदूषकः--मम दाव दुवेहिं ज्जेव हस्सं जाआदि, इत्थिआइए सक्कअं पठन्तीए मणुस्सेण अ काअलीं गाअन्तेण । इत्थिआ दाव सक्कअं पठन्ती, दिण्णणव णस्सा विअ गिट्ठो, अहिअं सुसुआअदि । मणुस्सो वि काअलीं गाअन्तो सुक्ख-सुमणो-दाम-वेष्ट्ठिदो वुड्ढपुरोहिदो विअ मन्तं जवन्तो, दिढं मे ण रोअदि । (मम तावत् द्वाभ्यामेव हास्यं जायते; स्त्रिया संस्कृतं पठन्त्या, मनुष्येण च काकलीं गायता । स्त्री तावत् संस्कृतं पठन्ती, दत्तनव-नास्या इव गृष्टिः अधिकं सुसूशब्दं करोति, मनुष्योऽपि काकलीं गायन् शुष्क-सुमनो-दाम-वेष्टितो वृद्धपुरोहित इव मन्त्रं जपन्, दृढं मे न रोचते ।)


अश्वः सप्तमुखो, विषं, हरधनुः, शङ्खोऽमृतं चाम्बुधेः,
रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्युः सदा मङ्गलम् ॥

उत्कण्ठितस्य - उत्कण्ठा सञ्जाता अस्य-इस अर्थ में इतच् प्रत्यय होता है । सङ्केतके-सङ्केतयति इति सङ्केतकः, तस्मिन् । चिरयति--शतृप्रत्ययान्त सप्तमी एकवचन । संस्थापना-=सम्+√स्था+पुक्+णिच्+ल्युट्=अन+टाप् । यहाँ एक वीणा का अनेकरूपों से उल्लेख है अतः उल्लेख अलङ्कार और विनोद एवं प्रमोदरूपी कार्यों का वीणा रूपी कारण के साथ अभेद प्रतिपादित होने से हेतु अलंकार हैं । वसन्ततिलका छन्द है ॥ ३ ॥

अर्थ--विदूषक--श्रीमान् जी ! आइये, घर चलें ।

चारुदत्त--वाह ! विद्वान् रेभिल ने बहुत अच्छा गाया ।

विदूषक--मुझे तो उन दोनों से हँसी आती है--संस्कृत पढ़ती हुई स्त्री से और महीन मीठी आवाज से गाते हुये पुरुष से । क्योंकि संस्कृत पढ़ने वाली स्त्री, नई नई छिदी नाकवाली एक ही बार व्याई हुई गाय के समान अधिक सूसू ( शब्द ) करती है । और महीन=धीमी आवाज निकालता हुआ पुरुष, सूखे फूलों की माला पहने हुये बूढ़े पुरोहित के समान मन्त्र जपता हुआ, मुझे अधिक अच्छा नहीं लगता है ।

टीका--भावः=विद्वान्, संगीतज्ञः, काकलीम्=सूक्ष्मं मधुरं च ध्वनिम्, दत्ता=निवेशिता, नवा=नवीना, नसः इयम्=नस्या=नासिकाछिद्ररज्जुः यस्यै सा, गृष्टिः=सकृत् प्रसूता; शुष्कम्=शुष्कतां प्राप्तम्, यत् सुमनसाम्=पुष्पाणाम्, दाम=माल्यम्, तेन वेष्टितः=सज्जितः, दृढम्=अधिकम् ।