भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१८६मृच्छकटिकम्

चारुदत्तः--वयस्य ! सुष्ठु खल्वद्य गीतं भाव-रेभिलेन । न च भवान् परितुष्टः ?

रक्तञ्च नाम मधुरञ्च समं स्फुटञ्च
भावान्वितञ्च ललितञ्च मनोहरञ्च ।
किं वा प्रशस्तवचनैर्बहुभिर्मदुक्तै-
रन्तर्हिता यदि भवेद्वनितेति मन्ये ॥ ४ ॥

अन्वयः--(गीतम्) नाम, रक्तम्, च, मधुरम्, च, समम्, च, स्फुटम्, च, भावान्वितम्, च, ललितम्, च, मनोहरम्, च, (आसीत्), वा, मदुक्तैः, बहुभिः, प्रशस्तवचनैः, किम् ? यदि, वनिता, अन्तर्हिता, भवेत्, इति, मन्ये ॥ ४ ॥

शब्दार्थः--(गीतम्=गीत), नाम=निश्चय ही, रक्तम्=रागपूर्ण, च=और, मधुरम्=मीठा, च=और, समम्=(स्वर एवं लय में) समान रूप वाला, च=और स्फुटम्=स्पष्ट, च=और, भावान्वितम्=भावों से युक्त, च=और, ललितम्=ललित, च=और, मनोहरम्=मन को अच्छा लगने वाला, (आसीत्=था), वा=अथवा, मदुक्तैः=मुझ चारुदत्त के द्वारा कहे गये, बहुभिः=बहुत से, प्रशस्तिवचनैः=प्रशंसा-परकवाक्यों से, किम्=क्या (अर्थात् व्यर्थ है), यदि=सम्भवतः, वनिता=स्त्री, अन्तर्हिता=छिपी हुई, भवेत्=हो, इति=ऐसा, मन्ये=मैं मानता हूँ ॥४॥

अर्थ--चारुदत्त- मित्र ! रेभिल महानुभाव ने आज बहुत अच्छा गाया। फिर भी आप को अच्छा नहीं लगा ?

(वह रेभिलका गाना), रागों से पूर्ण, (सुनने में) मीठा लगने वाला, (स्वर और लय की) समता वाला, स्पष्ट, भावपूर्ण, ललित और मन को हरण करने वाला था, अथवा मेरी प्रशंसापरक बातों से क्या लाभ ? मुझे तो ऐसा लगता है कि (उस रेभिल के भीतर) मानों स्त्री छिपी हुई हो । (अर्थात् वह रेभिल बाहर से पुरुष प्रतीत होता है परन्तु उसके गाने से वह स्त्री की भाँति प्रतीत हो रहा था) ॥ ४ ॥

टीका--गीतम्--गद्यस्थमिदं पदं सर्वत्र योजनीयम् । नाम=निश्चयवाचकम-व्ययपदमिदम् । रक्तम्=विविधरागपरिपूर्णम्, मधुरम्=कर्णप्रियम्, समम्=स्वर-ताल-सामञ्जस्ययुतम्, स्फुटम्=स्पष्टम्, भावान्वित्=रत्यास्पदम, विविधभावसंवलितम्, ललितम्=लालित्यधर्मविशिष्टम्, =तथा, मनोहरम्=चित्ताकर्षकम्, आसीत्, इति शेषः । अत्रानेकचकाराणां प्रयोगोऽनावश्यकः । वा=अथवा, मदुक्तैः=मया कथितैः, बहुभिः=विपुलैः, प्रशस्तवचनैः=प्रशंसावाक्यैः, किम् प्रयोजनम् ? न किमपीत्यर्थः, यदि=सम्भवतः, वनिता=स्त्री, अन्तर्हिता=अप्रकटरूपेण स्थिता, भवेत्=स्यात्, इति=इत्थम्, मन्ये=तर्कयामि । अयं रेभिलो बाह्यरूपेण पुरुषः दृश्यमानोपि