मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः १८७
अपि च—
तं तस्य स्वरसंक्रमं मृदुगिरः श्लिष्टञ्च तन्त्रीस्वनं
वर्णानामपि मूच्छ्र्छनान्तरगतं तारं विरामे मृदुम्।
हेलासंयमितं पुनश्च ललितं रागाद् द्विरुच्चारितं
यत्सत्यं विरतेऽपि गीतसमये गच्छामि शृण्वन्निव ॥ ५ ॥
गीतवैचित्र्येणास्मिन् स्त्रीत्वं प्रच्छन्नरूपेण वर्तते इति तर्कयामीति भावः। अत्रोत्प्रेक्षा-लंकारः वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ ४ ॥
विमर्श—इस श्लोक में सङ्गीतशास्त्र के कई पारिभाषिक शब्द प्रयुक्त हैं—तत्र रक्तं नाम वेणुवीणास्वराणामेकीभावे रक्तमित्युच्यते। मधुरं नाम स्वर-भावोपनीतललित-पदाक्षर-गुण-समृद्धम् । व्यक्तं नाम पदपदार्थ-विकारागमलोप-कृत्तद्धित विभक्तिप्रत्यर्थ-वचनानां सम्यगुपपादनम् । ( नारदशिक्षा—काले द्वारा टिप्पणी में उद्धृत ।) इसके अनुसार-वाद्य स्वरों का पूर्णतया मेल होना 'रक्त' कहा जाता है। 'मधुर'-स्वर तथा भाव के अनुकूल ललित पदों तथा वर्णों का प्रयोग, 'व्यक्त'=स्फुट—इसका अर्थ है—व्याकरण-सम्बन्धी शुद्धता । 'मन्ये' 'यदि' के प्रयोग से उत्प्रेक्षा अलंकार है। वसन्ततिलका छन्द है ॥ ४ ॥
अन्वयः—सत्यम् ( अस्ति ), यत्, गीतसमये, विरते, अपि, मृदुगिरः, तस्य, वर्णानाम्, मूच्छ्र्छनान्तरगतम्, अपि, तारम्, विरामे, मृदुम्, पुनः, हेलासंयमितम्, रागाद् द्विरुच्चारितम्, ललितम्, च, तम्, स्वरसंक्रमम्, श्लिष्टम्, तन्त्रीस्वनम्, च, शृण्वन्, इव ( अहम् गच्छामि ) ॥ ५ ॥
शब्दार्थ—सत्यम्=सच है, यत्=कि, गीतसमये=गाने का समय, विरते अपि=बीत जाने पर भी, मृदुगिरः=मधुर आवाज वाले, तस्य=उस रेभिल के, वर्णानाम्=अक्षरों की, मूच्छ्र्छनान्तरगतम्=मूर्च्छना ( स्वरों का क्रम से आरोह तथा अवरोह ) के मध्य में, अपि=भी, तारम्=अत्यधिक ऊँचा, विरामे=रुकने पर, मृदुम्=मधुर, मीठा, पुनः च=और फिर, हेलासंयमितम्=राग के आरोह आवरोह के अनौचित्य में नियमित अर्थात् अनौचित्यरहित, रागाद्=रागविशेष के कारण, द्विरुच्चारितम्=दो बार उच्चारण किये गये, और, ललितम्=ललित, तम्=अनुभूत उस, स्वरसङ्क्रमम्=निषाद आदि स्वरों के आरोह-अवरोह-क्रम को, च=और, श्लिष्टम्=मिले हुये, तन्त्रीस्वनम्=वीणा के शब्द को, शृण्वन्=सुनता हुआ, इव=सा, गच्छामि=जा रहा हूँ ॥ ५ ॥
अर्थ—और भी—
सच है कि गाने का समय बीत जाने पर भी, मधुर आवाज वाले उस रेभिल के अक्षरों की मूर्च्छना के मध्य में भी अत्यधिक ऊँचा और रुकने पर मधुर, फिर