भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१८८ मृच्छकटिकम्


आरोह-अवरोह के अनौचित्य से रहित, रागविशेष के कारण दो बार उच्चारित किये गये और लालित्ययुक्त, उस (पहले सुने गये) निषाद आदि स्वरों के आरोह-अवरोह-क्रम को और उसमें मिली हुई वीणा की आवाज को सुनता हुआ सा जा रहा हूँ ॥ ५ ॥

टीका—सत्यम्=तथ्यम् अस्ति, यत्, गीतसमये=गायनकाले, विरते=समाप्ते, अपि, मृदुगिरः=मधुरवाचः, तस्य=रेभिलस्य, वर्णानाम्=गानाक्षराणाम्, मूर्च्छनान्तरगतम्=मूर्च्छना तु -

क्रमात् स्वराणां सप्तानामारोहश्चावरोहणम् । सा मूर्च्छत्युच्यते ग्रामस्था एताः सप्त सप्त च ॥

अथवा -'यथा कुटुम्बिनः सर्वे एकीभूता भवन्ति, तथा स्वराणां संन्दोहो मूर्च्छनेत्यभिधीयते' इति पृथ्वीधरः । एवञ्च स्वराणामारोहावरोहक्रमः मूर्च्छना, तस्याः अन्तरगतम् = मध्ये विद्यमानम्, अपि, तारम् = उच्चैः, विरामे=अवसाने, मृदुम्=कोमलम्, मन्दमिति भावः, पुनः=तदनन्तरम्, हेलासंयमितम्=हेला=रागस्यारोहावरोहयोरनौचित्यम्, तत्र नियमितम्-संयमितम्, रागात्=रागविशेषात्, द्विरुच्चारितम्=द्विरुक्तम्, कुत्रचित् 'रागद्विरुच्चारितम्' इति समस्तः पाठः तत्र पञ्चम्यन्तेन सप्तम्यन्तेन वा समासः, ललितम्=लालित्ययुक्तम्, तम्=श्रुतपूर्वम्, स्वराणाम्=षड्जनिषादादिसप्तस्वराणाम्, संक्रमम्=आरोहावरोहरूपं शोभनं क्रमम्, श्लिष्टम्=तेन मिलितम्, तन्त्रीस्वनम्=वीणाशब्दम्, शृण्वन्=आकर्णयन्, इव=यथा, अहम्=चारुदत्तः, गच्छामि=व्रजामि । अत्रोत्प्रेक्षालंकारः, शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ ५ ॥

विमर्श—इस श्लोक में विशेष्य-विशेषण-भावों के विषय में मतभेद हैं । ( १ ) कुछ व्याख्याकारों ने 'मृदुगिरः' को षष्ठ्यन्त मान कर भी तत्पुरुष की कल्पना करके 'मधुर वाणी का' यह अर्थ किया है । परन्तु इसे बहुव्रीहि मान कर 'तस्य' का विशेषण मानना उचित है । इस प्रकार-मधुर वाणी वाले उस रेभिल के- यह अर्थ उचित है । ( २ ) कुछ ने 'शृण्वन्' का कर्म माना है, यह भी ठीक नहीं है । ( ३ ) यहाँ 'तारम्' और 'मृदुम्' इन दोनों को 'स्वरसंक्रमम्' तथा 'तन्त्रीस्वनम्' इन दोनों का विशेषण मानना चाहिये । यह काले महोदय का कथन है । द्विः उच्चारितम् - यहाँ क्रिया की आवृत्ति अर्थ में सुच् प्रत्यय है । अतः-दो बार-यह अर्थ है । मूर्च्छना -यह संगीत शास्त्र का पारिभाषिक शब्द है -इसका लक्षण संस्कृत टीका में द्रष्टव्य है । यहाँ गानशैली का चरम उत्कर्ष और उसके दीर्घकालिक प्रभाव का प्रतिपादन है । 'शृण्वन् इव' यहाँ इव का प्रयोग क्रियावाचक के साथ है । अतः उत्प्रेक्षा अलंकार है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥५॥