मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 286, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः १६६
तत् कस्मिन्नुद्देशे सन्धिमुत्पादयामि ? ।
देशः को नु जलावसेकशिथिलो यस्मिन्न शब्दो भवेत् भित्तीनाञ्च न दर्शनान्तरगतः सन्धिः करालो भवेत् । क्षारक्षीणतया च लोष्टककृशं जीर्णं क्व हर्म्यं भवेत् कस्मिन् स्त्रीजनदर्शनञ्च न भवेत् स्यादर्थसिद्धिश्च मे ॥ १२ ॥
होती जा रही थी। द्रोणाचार्य का वध हो चुका था तो एक रात अश्वत्थामा पाण्डवों के शिविर में घुस आये और वहाँ सोये युधिष्ठिर के पुत्रों और सैनिकों को मार डाला। शर्विलक का आशय यह है कि जब अश्वत्थामा जैसे ब्राह्मण ने चोरी से वध जैसा दुष्कर्म कर दिया तो मुझ ब्राह्मण का भी चोरी करना गर्हित नहीं है। दूसरों की सेवा करने की अपेक्षा चोरी करना ठीक है। यहाँ चौर्य प्रस्तुत है वञ्चनापरिभव अप्रस्तुत है, दोनों का एक वाक्य में समावेश होने से अप्रस्तुत-प्रशंसा अलंकार है। और कारण से कार्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास भी है। दोनों की संसृष्टि है। शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ ११ ॥
अन्वयः--कः, नु, देशः, जलावसेकशिथिलः, ( भवेत् ), यस्मिन्, शब्दः, न, भवेत्, यस्मिन्, च, भित्तीनाम्, करालः, सन्धिः, दर्शनान्तरगतः, न, भवेत्, क्व, च, हर्म्यम्, क्षारक्षीणतया, लोष्टककृशम्, जीर्णम् च, भवेत्, कस्मिन्, च, स्त्रीदर्शनम्, न, भवेत्, मे, अर्थसिद्धिः, च, स्यात् ॥ १२ ॥
शब्दार्थ--कः नु=कौन सा, देशः=स्थान, जलावसेकशिथिलः=निरन्तर पानी गिरते रहने से कमजोर, भवेत्=हो गया होगा, यस्मिन्=जिस स्थान पर, शब्दः=आवाज, न=नहीं, भवेत्=न हो, यस्मिन् च=और जहाँ पर, भित्तीनाम्=दीवालों की, करालः=बड़ी, सन्धिः=सेंध, दर्शनान्तरगतः=दिखाई देने योग्य, न=नहीं, भवेत्=हो, क्व च=और कहाँ पर, हर्म्यम्=महल ( की दीवाल ), क्षारक्षीणतया=लोनख लग जाने से कमजोर होने के कारण, लोष्टककृशम्=कमजोर ईंटों वाला, जीर्णम्=गला हुआ, भवेत्=हो, कस्मिन् च=और कहाँ पर, स्त्रीदर्शनम्=स्त्री का दर्शन, न=नहीं, भवेत्=हो, मे=मेरी, अर्थसिद्धिः=प्रयोजन की सिद्धि, स्यात्=हो जाय ॥ १२ ॥
अर्थ--तो किस स्थान पर सेंध लगाऊँ ?
कौन सा स्थान निरन्तर पानी गिरते रहने के कारण कमजोर हो गया होगा जहाँ ( सेंध लगाते समय ) आवाज नहीं होगी, जहाँ दीवालों की बड़ी सेंध किसी को दिखाई नहीं देगी। और कहाँ पर महल ( की दीवाल ) लोनख लग जाने से कमजोर ईंटों वाला और जीर्ण हो गया होगा। और कहाँ पर स्त्री नहीं दिखाई देगी तथा मेरे मनोरथ की सिद्धि हो जायगी ॥ १२ ॥