भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२००मृच्छकटिकम्

( भित्तिं परामृश्य ) नित्यादित्य-दर्शनोदकसेचनेन दूषितेयं भूमिः क्षार-क्षीणा; मूषिकोत्करश्चेह । हन्त ! सिद्धोऽयमर्थः । प्रथममेतत् स्कन्दपुत्राणां सिद्धिलक्षणम् । अत्र कर्मप्रारम्भे कीदृशमिदानीं सन्धिमुत्पादयामि । इह खलु भगवता कनकशक्तिना चतुर्विधः सन्ध्युपायो दर्शितः । तद्यथा-- पक्वेष्टकानामाकर्षणम्, आमेष्टकानां छेदनम्, पिण्डमयानां सेचनम्, काष्ठमयानां पाटनमिति । तदत्र पक्वेष्टके इष्टिकाकर्षणम् । तत्र--

**टीका--**सन्धिच्छेदनयोग्यं स्थानं कुत्र विद्यत इति विचारयन्नाह देश इति । कः नु देशः=किं हि स्थानम्, जलावसेकशथिलः=अनवरतजलपपतनेनार्द्रप्रायः, सुच्छेद्य इत्यर्थः, भवेत्=स्यात्, यस्मिन्=यस्मिन् स्थाने सन्धिच्छेदने कृते सति, शब्दः=जागरणकारको ध्वनिः, न भवेत्=न जायेत, यस्मिन् च, भित्तीनाम्=कुड्यानाम्, करालः=विशालः, प्रवेशयोग्यः, सन्धिः=सुरङ्गा, दर्शनान्तरगतः=दृष्टिगोचरः, रक्षिणाम् अन्येषां चेति शेषः, न, भवेत्=न स्यात् क्व च=कस्मिंश्च देशे, हर्म्यम्=अट्टालिका, भवनं वा क्षारक्षीणतया=ऊषत्वात् क्षयप्राप्ततया, जीर्णम्=जरायत्तम्, लोष्टककृशम्=कृशानि=दुर्बलानि लोष्टकानि यत्र तादृशम् "वाऽऽहिताग्न्यादिषु' इति सूत्रेण कृशशब्दपरनिपातः, भवेत्=स्यात्, कस्मिन् च=कुत्र च, स्त्रीदर्शनम्=रमणीजनसाक्षात्कारः, न भवेत्, मे=शर्विलकस्य, अर्थसिद्धिश्च=मनोरथसफलता च, भवेत्--जायेत् । अत्र शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ १२ ॥

**विमर्श—**इस श्लोक में सेंध लगाने के सर्वाधिक उपयोगी स्थान का उल्लेख है । स्त्रीदर्शनम् चौरशास्त्र के अनुसार स्त्री का प्रथम दर्शन विघ्नकारक होता है । वास्तव में स्त्रियों की निद्रा गम्भीर नहीं होती है क्योंकि उनके साथ बच्चे वगैरह सोते हैं अतः उनका अचानक जागना सम्भव है । यहाँ शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥१२॥

अर्थ--( दीवान को हाथ से छूकर ) प्रतिदिन सूरज की धूप लगने और पानी गिरने के कारण दोषयुक्त यह जमीन लोनख लगने से कमजोर है, और यहाँ चूहों द्वारा खोदी हुई मिट्टी का ढेर है । वाह ! काम बन गया । कात्तिकेय के पुत्रों ( चोरों ) की सिद्धि का यह पहला लक्षण ( अनायास सेंध फोड़ने का उपाय मिलना ) है । यहाँ कार्य प्रारम्भ करने पर किस प्रकार की सेंध लगाऊँ ? वास्तव में भगवान् कनक शक्ति ने सेंध फोड़ने के चार प्रकार के उपाय बताये हैं । वे इस प्रकार हैं— ( १ ) पकी हुई ईंटों ( के मकान से ईंटों ) को बाहर निकाल लेना, ( २ ) कच्ची ईंटों ( के मकान की ईंटों ) का काटना, ( ३ ) मिट्टी के लोंदों ( पिण्डों से बनी हुई दीवालों ) का सींचना ( पानी द्वारा गला देना ), ( ४ ) लकड़ी से बनी हुई दीवाल को उखाड़ देना । तो यहाँ पकी हुई ईंटों के मकान में ईंटों का बाहर निकालना ( उचित उपाय है ) । उसमें--