मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः २०१
पद्मव्याकोशं भास्करं बालचन्द्रं
वापी, विस्तीर्णं स्वस्तिकं पूर्णकुम्भम्।
तत् कस्मिन् देशे दर्शयाम्यात्मशिल्पं
दृष्ट्वा श्वो यं यद्विस्मयं यान्ति पौराः ॥ १३ ॥
टीका— परामृश्य = हस्तेन स्पृष्ट्वेत्यर्थः, नित्यादित्यदर्शनोदकसेचनेन = सततातपजलसम्पर्केण भूमिः शीर्णा भवतीति भावः, मूषिकोत्करः = मूषिकाणाम्, उत्करः = उद्धृतरजःसमुदायः, हन्त = हर्षसूचनेऽव्ययम्, स्कन्दपुत्राणाम् = स्वामिकार्तिकेयनयानां चौराणामित्यर्थः, सिद्धेः = कार्यसाफल्यस्य, लक्षणम् = चिह्नम्, सूचकमिति भावः, कर्मणः = चौर्यकार्यस्य, प्रारम्भे = आरम्भावस्थासरे, कनकशक्तिना = एतन्नाम्ना प्रसिद्धेन चौर्यशास्त्रप्रवर्तकेन, पक्वानाम् = अग्न्यादिना पाकतामुपगतानाम्, आमानाम् = अपक्वानाम्, पाटनम् = उत्पाटनम्, पक्वेष्टके = पक्वेष्टकामये भवने।
विमर्श— नित्यादित्यदर्शनोदकसेचनेन—इसकी व्याख्या में मतभेद है। (१) प्रतिदिन सूर्यदर्शन के समय अर्पित किये गये जल के सींचने से, (२) रोज सबेरे सूर्य दिखलाई पड़ने पर दिये गये जल से। (३) प्रतिदिन सूर्य की धूप लगने और पानी गिरने से। इन अर्थों में तीसरा अर्थ अधिक तर्कसंगत है क्योंकि जहाँ रोज पानी गिरता है और धूप लगती रहती है वहाँ लोनख (क्षार) होना देखा जाता है। साथ ही सूर्य की पूजा आदि के लिये जल दिया जाना चोर को कैसे ज्ञात हो सकता है। अतः—धूप लगना और पानी गिरना—यही अर्थ उचित है। कनकशक्ति—चौर्यशास्त्र के प्रवर्तक आचार्य का नाम।
अन्वयः— पद्मव्याकोशम्, भास्करम्, बालचन्द्रम्, वापी, विस्तीर्णम्, स्वस्तिकम्, पूर्णकुम्भम्, (एषु सप्तविधेषु सत्सु) तत्, कस्मिन्, देशे, आत्मशिल्पम्, दर्शयामि, यत्, यम्, दृष्ट्वा, श्वः, पौराः, विस्मयम्, यान्ति ॥ १३ ॥
शब्दार्थः— (सन्धि के निम्न सात प्रकार हैं उनमें) पद्मव्याकोशम् = विकसित कमल के समान, भास्करम् = सूर्य-मण्डल के समान, बालचन्द्रम् = द्वितीयातिथि के बाल चन्द्रमा के समान, वापी = बावड़ी, विस्तीर्णम् = विस्तृत, स्वस्तिकम् = 卐 इस प्रकार के चिह्न के समान, पूर्णकुम्भम् = पूर्णघट के समान, (सात प्रकार की सेंध होती है) कस्मिन् देशे = किस स्थान पर, आत्मशिल्पम् = अपनी सेंध लगाने की कला को, दर्शयामि = प्रदर्शित करूँ ? यत् = जो कि, यम् = जिसे, दृष्ट्वा = देखकर, श्वः = कल, पौराः = नगरवासी, विस्मयम् = आश्चर्य को, यान्ति = प्राप्त करेंगे ॥ १३ ॥
अर्थ— (१) खिला हुआ कमल, (२) सूर्य, (३) बालचन्द्र (द्वितीया का चन्द्रमा), (४) बावड़ी (५) तिरछी या विशाल, (६) स्वस्तिक 卐 चिह्न, (७) पूर्णकुम्भ—अर्थात् इनके समान सात प्रकार की सेंध होती है। किस स्थान पर अपनी कला का प्रदर्शन करूँ, जिससे सबेरे उसको देखकर पुरवासी आश्चर्य करने लग जायँ ॥ १३ ॥