भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

२०२ मृच्छकटिकम्

तदत्र पक्वेष्टके पूर्णकुम्भ एव शोभते; तमुत्पादयामि ।

अन्यासु भित्तिषु मया निशि पाटितासु क्षारक्षतासु विषमासु च कल्पनासु । दृष्ट्वा प्रभातसमये प्रतिवेशिवर्गो दोषांश्च मे वदति कर्मणि कौशलञ्च ॥ १४॥

टीका--चौरशास्त्र-प्रतिपादित-सप्तविधसन्धीनामन्यतमं विधातुं तेषां स्वरूपं दर्शयन्नाह पद्मव्याकोशमिति । पद्मव्याकोशम्=पद्मवत् = कमलवत् व्याकोशम्=प्रफुल्लम्, विकसित-कमलतुल्यमष्टदलतुल्यमिति भावः, भास्करम्=सूर्यमण्डलाकृतिम्, बालचन्द्रम्=नवोदितद्वितीयाचन्द्रोपमम्, वापी=दीर्घिकासदृशम्, विस्तीर्णम्=तिर्यक् लम्बमानम्, स्वस्तिकम्=स्वस्तिनामकचिह्नतुल्यम्, पूर्णकुम्भम्=पूर्णघटसदृशम्--इति सप्तविधाः सन्धयः सन्ति, तत्=तस्मात्, कस्मिन् देशे=कस्मिन् स्थाने, आत्मशिल्पम्=स्वकलाचातुर्यम्, दर्शयामि = प्रदर्शयानि, यत्=यस्मात्, यम्=कला शिल्पम्, श्वः=आगामिनि दिने प्रातः, दृष्ट्वा=विलोक्य, पौराः=पुरवासिनः, विस्मयम्=आश्चर्यम्, यान्ति=यास्यन्तीति भावः । "वाणाश्वैश्छिन्ना वैश्वदेवी ममौ यौ" इति लक्षणाद् वैश्वदेवी वृत्तम् ॥ १३ ॥

विमर्श--वापी विस्तीर्णम् -- इन्हें दो नाम समझना चाहिये क्योंकि "इष्टिकाभित्तौ संस्कारवशेन पद्मव्याकोशादिसंज्ञाः सप्तसन्धयः' यह चौरदर्शन में कहा गया है। अतः सात संख्या पूरी करने के लिये वापी=वापी के समानाकार और विस्तीर्णम्=तिरछी लम्बी-ये दो अलग-२ समझने चाहिये-ऐसा व्याख्याकारों ने लिखा है। परन्तु पद्मव्याकोशम्, भास्करम्, आदि द्वितीयान्त पदों के साथ 'वापी' इस प्रथमान्त पद की संगति कैसे होगी--यह विचारणीय है। कुछ व्याख्याकारों ने 'इति सप्तसन्धयः' ऐसा लिखा है, वहाँ भी द्वितीयान्त पदों की अनुपपत्ति है। इसमें वैश्वदेवी छन्द है ॥ १३ ॥

अर्थ--तो यहाँ पकी ईंटों वाले मकान में पूर्णकुम्भ ही शोभित होता है। उसी प्रकार की सेन्ध लगाता हूँ।

अन्वयः--मया, निशि, अन्यासु, क्षारक्षतासु, भित्तिषु, विषमासु, कल्पनासु, पाटितासु, प्रभातसमये, प्रतिवेशिवर्गः, दृष्ट्वा, मे, दोषान्, कर्मणि, कौशलम्, च, वदति ॥ १४ ॥

शब्दार्थ--मया=मुझ शर्विलक के द्वारा, निशि=रात में, अन्यासु=दूसरी, क्षारक्षतासु=लोनख के प्रभाव से गली हुयी, भित्तिषु=दीवालों पर, विषमासु=कठिन, अद्भुत, कल्पनासु=कल्पनाओं के, पाटितासु=बनायी जाने पर, फोड़ी जाने पर, प्रभातसमये=सबेरे के समय, प्रतिवेशिवर्गः=पड़ोसी लोग, दृष्ट्वा=देखकर, मे=मुझ