मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः
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नमो वरदाय कुमारकार्तिकेयाय, नमःकनकशक्तये ब्रह्मण्यदेवाय देवव्रताय, नमो भास्करनन्दिने, नमो योगाचार्याय, यस्याहं प्रथमः शिष्यः। तेन च परितुष्टेन योगरोचना मे दत्ता।
अनया हि समालब्धं न मां द्रक्ष्यन्ति रक्षिणः।
शस्त्रञ्च पतितं गात्रे रुजं नोत्पादयिष्यति ॥ १५ ॥
शर्विलक के, दोषान्=दोषों को, च=और, कर्मणि=सेन्ध लगाने के काम में, कौशलम्=कुशलता को, वदति=कहेंगे ॥ १४ ॥
अर्थ— मुझ शर्विलक के द्वारा रात में दूसरी लोनख लगी हुई दीवारों पर विचित्र कल्पनाओं के चित्र उभारने पर अर्थात् काटने पर सवेरे पड़ोसी लोग देख कर मेरे दोषों को और सेन्ध आदि कार्यों में चतुरता को कहेंगे ॥ १४ ॥
टीका— सन्धिनिर्माणे स्वनैपुण्यप्रख्यापनमुखेन भावि-लोकालोच्यमाह—अन्यासु इति। मया=शर्विलकेन, निशि=रात्रौ, अन्यासु=अपरासु, क्षारक्षतासु=लावणिक-प्रभावदूषितासु, भित्तिषु=कुड्येषु, विषमासु=असाधारणासु, विचित्रासु, कल्पनासु=उत्प्रेक्षासु, पाटितासु=विदारितासु, स्वकीयोद्भूतकल्पनाशक्तिबलेन विचित्ररूपेण विदारितासु सतीषु, प्रभातसमये = प्रातः काले, प्रतिवेशिवर्गः = प्रतिवेशिजनाः, दृष्ट्वा=विलोक्य, मे=मम शर्विलकस्य, दोषान्=दूषणानि, कर्मणि=चौरकर्मणि, सन्धिकर्मणि वा, कौशलम् = पाटवम्, च, वदति=कथयिष्यति, वर्तमानसामीप्ये लट्, तुल्ययोगितालङ्कारः, वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ १४ ॥
विमर्श— कल्पनासु पाटितासु—कल्पनाओं के अनुसार सेन्ध आदि के रूप में काट देने पर। यहाँ दोष एवं कौशल का कथन क्रिया में एकधर्माभिसम्बन्ध कहने के कारण तुल्ययोगिता अलंकार है। वसन्ततिलका छन्द है ॥ १४ ॥
अर्थ— वरदानी कुमार कार्तिकेय (शंकर के पुत्र) को नमस्कार है। कनक-शक्ति, ब्रह्मण्यदेव, देवव्रत को नमस्कार है भास्कर नन्दी को नमस्कार है, योगाचार्य को नमस्कार है जिनका मैं प्रथम शिष्य हूँ। प्रसन्न उन गुरुजी ने मुझे योगरोचना दी है।
विमर्श— कुमार कार्तिकेय=परमेष्ठी गुरु देवव्रत नामक परापर गुरु, भास्कर-नन्दी=सूर्य को आनन्द देनेवाले, इस नाम के परमगुरु, योगाचार्य—कुमार कार्तिकेय के प्रधान शिष्य और शर्विलक के साक्षात् गुरु। (१) योगरचना=उपायों का सम्भार (२) अथवा योगेन=युक्ति से रचना=रचितद्रव्यविशेष, (३) योगस्य=औषधस्य, रचना = कल्पना, (४) योगेन = मन्त्रेण रचना = लेपविशेषनिर्माण-कौशलम्। कहीं कहीं योगरचना भी पाठ है। रोचना=तिलक द्रव्यविशेष।
अन्वयः— हि, अनया, समालब्धम्, माम्, रक्षिणः, न, द्रक्ष्यन्ति, गात्रे, च, पतितम्, शस्त्रम्, रुजम्, न उत्पादयिष्यति ॥ १५ ॥