मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २०४ | मृच्छकटिकम् |
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( तथा करोति ) धिक् कष्टम्, प्रमाणसूत्रं मे विस्मृतम् । ( विचिन्त्य ) 'आम्, इदं यज्ञोपवीतं प्रमाणसूत्रं भविष्यति । यज्ञोपवीतं हि नाम ब्राह्मणस्य महदुपकरणद्रव्यम्, विशेषतोऽस्मद्विधस्य । कुतः—
एतेन मापयति भित्तिषु कर्ममार्ग- मेतेन मोचयति भूषणसम्प्रयोगान् ।
शब्दार्थ—हि = क्योंकि, अथवा निश्चय ही, अनया = इस योगरोचना से, समालब्धम्=लेप किये हुये, माम्=मुझे, रक्षिणः=सिपाही लोग, न=नहीं, द्रक्ष्यन्ति=देख पायेंगे, च=और, गात्रे=शरीर पर, पतितम्=गिरा हुआ, शस्त्रम्=शस्त्र, रुजम्=रोग, चोट, न=नहीं, उत्पादयिष्यति=पैदा कर पायेगा ।। १५ ।।
अर्थ—इस योग-रोचना का लेप किये हुये मुझको सिपाही नहीं देख पायेंगे और शरीर पर लगा हुआ शस्त्र घाव आदि नहीं पैदा कर सकेगा ।। १५ ।।
टीका—योगरोचनायाः माहात्म्यं वर्णयन्नाह—अनया=पूर्वोक्तया योगरोचनया, समालब्धम्=समालिप्तम्, माम्=शर्विलकम्, रक्षिणः=रक्षापुरुषाः, न=नैव, द्रक्ष्यन्ति=अवलोकयिष्यन्ति, गात्रे=शरीरे, च, पतितम्=क्षिप्तम्, लग्नम् वा, शस्त्रम्=आयुधम्, रुजम्=पीडाम्, आघातं वा, न=नैव, उत्पादयिष्यति=जनयिष्यति ।। १५ ।।
विमर्शः—समालब्धम्—सम्+आ+√लभ्+क्त । शस्त्रम्—√शस्+ष्ट्रन्=त्र । इसमें समुच्चय अलङ्कार और अनुष्टुप् छन्द है ।। १५ ।।
अर्थ—( लेप करता है । ) हाय कष्ट है, अपना नापने वाला सूत्र ( डोरी ) तो भूल गया । ( सोच कर ) हाँ, यह यज्ञोपवीत नापने वाला सूत्र बन जायगा क्योंकि ब्राह्मण के लिये यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) बड़े काम की चीज है, और विशेष रूप से हम जैसे ( चोर ) लोगों के लिये । क्योंकि -
अन्वयः—( अस्मद्विधः चौरः ) भित्तिषु, एतेन, कर्ममार्गम्, मापयति, एतेन, भूषणसम्प्रयोगान्, मोचयति, यन्त्रदृढे, कपाटे, ( एतेन ) उद्घाटनम्, भवति, कीटभुजगैः दष्टस्य, परिवेष्टनम्, च भवति ।। १६ ।।
शब्दार्थ—( अस्मद्विधः चौरः=हमारे जैसा चोर ) भित्तिषु=दीवालों पर, एतेन=इस जनेऊ से, कर्ममार्गम्=चोरी करने के रास्ता अर्थात् सेंध को, मापयति=नापता है, एतेन=इससे, भूषणसम्प्रयोगान् = गहनों के जोड़ों को, मोचयति=खोलता है, ढीला करता है, ( एतेन=इस जनेऊ से ) यन्त्रदृढे=सांकड़ आदि से बन्द किये गये, कपाटे = किवाड़ में, उद्घाटनम् = खोलना, भवति=होता है, कीटभुजगैः = कीड़ा एवं साँप द्वारा, दष्टस्य=डंसे हुये, काटे गये व्यक्ति का, परिवेष्टनम्=लपेटना, भवति=होता है ।। १६ ।।
अर्थ—( हमारे जैसा चोर ) इससे दीवारों पर सेंध को नापता है, कसे हुये