मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
| २०४ | मृच्छकटिकम् |
|---|
( तथा करोति ) धिक् कष्टम्, प्रमाणसूत्रं मे विस्मृतम् । ( विचिन्त्य ) 'आम्, इदं यज्ञोपवीतं प्रमाणसूत्रं भविष्यति । यज्ञोपवीतं हि नाम ब्राह्मणस्य महदुपकरणद्रव्यम्, विशेषतोऽस्मद्विधस्य । कुतः—
एतेन मापयति भित्तिषु कर्ममार्ग- मेतेन मोचयति भूषणसम्प्रयोगान् ।
शब्दार्थ—हि = क्योंकि, अथवा निश्चय ही, अनया = इस योगरोचना से, समालब्धम्=लेप किये हुये, माम्=मुझे, रक्षिणः=सिपाही लोग, न=नहीं, द्रक्ष्यन्ति=देख पायेंगे, च=और, गात्रे=शरीर पर, पतितम्=गिरा हुआ, शस्त्रम्=शस्त्र, रुजम्=रोग, चोट, न=नहीं, उत्पादयिष्यति=पैदा कर पायेगा ।। १५ ।।
अर्थ—इस योग-रोचना का लेप किये हुये मुझको सिपाही नहीं देख पायेंगे और शरीर पर लगा हुआ शस्त्र घाव आदि नहीं पैदा कर सकेगा ।। १५ ।।
टीका—योगरोचनायाः माहात्म्यं वर्णयन्नाह—अनया=पूर्वोक्तया योगरोचनया, समालब्धम्=समालिप्तम्, माम्=शर्विलकम्, रक्षिणः=रक्षापुरुषाः, न=नैव, द्रक्ष्यन्ति=अवलोकयिष्यन्ति, गात्रे=शरीरे, च, पतितम्=क्षिप्तम्, लग्नम् वा, शस्त्रम्=आयुधम्, रुजम्=पीडाम्, आघातं वा, न=नैव, उत्पादयिष्यति=जनयिष्यति ।। १५ ।।
विमर्शः—समालब्धम्—सम्+आ+√लभ्+क्त । शस्त्रम्—√शस्+ष्ट्रन्=त्र । इसमें समुच्चय अलङ्कार और अनुष्टुप् छन्द है ।। १५ ।।
अर्थ—( लेप करता है । ) हाय कष्ट है, अपना नापने वाला सूत्र ( डोरी ) तो भूल गया । ( सोच कर ) हाँ, यह यज्ञोपवीत नापने वाला सूत्र बन जायगा क्योंकि ब्राह्मण के लिये यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) बड़े काम की चीज है, और विशेष रूप से हम जैसे ( चोर ) लोगों के लिये । क्योंकि -
अन्वयः—( अस्मद्विधः चौरः ) भित्तिषु, एतेन, कर्ममार्गम्, मापयति, एतेन, भूषणसम्प्रयोगान्, मोचयति, यन्त्रदृढे, कपाटे, ( एतेन ) उद्घाटनम्, भवति, कीटभुजगैः दष्टस्य, परिवेष्टनम्, च भवति ।। १६ ।।
शब्दार्थ—( अस्मद्विधः चौरः=हमारे जैसा चोर ) भित्तिषु=दीवालों पर, एतेन=इस जनेऊ से, कर्ममार्गम्=चोरी करने के रास्ता अर्थात् सेंध को, मापयति=नापता है, एतेन=इससे, भूषणसम्प्रयोगान् = गहनों के जोड़ों को, मोचयति=खोलता है, ढीला करता है, ( एतेन=इस जनेऊ से ) यन्त्रदृढे=सांकड़ आदि से बन्द किये गये, कपाटे = किवाड़ में, उद्घाटनम् = खोलना, भवति=होता है, कीटभुजगैः = कीड़ा एवं साँप द्वारा, दष्टस्य=डंसे हुये, काटे गये व्यक्ति का, परिवेष्टनम्=लपेटना, भवति=होता है ।। १६ ।।
अर्थ—( हमारे जैसा चोर ) इससे दीवारों पर सेंध को नापता है, कसे हुये
तृतीयोऽङ्कः २०१
उद्घाटको भवति यन्त्रदृढे कपाटे दष्टस्य कीटभुजगैः परिवेष्टनञ्च ॥ १६ ॥
मापयित्वा कर्म्म समारभे । ( तथा कृत्वा अवलोक्य च ) एकलोष्ठावशे- षोऽयं सन्धिः । धिक् कष्टम् । अहिना दष्टोऽस्मि । (यज्ञोपवीतेनाङ्गुलीं बद्ध्वा विषवेगं नाटयति । चिकित्सां कृत्वा ) स्वस्थोऽस्मि । ( पुनः कर्म्म कृत्वा दृष्ट्वा च ) अये ! ज्वलति प्रदीपः । तथाहि--
शिखा प्रदीपस्य सुवर्णपिञ्जरा महीतले सन्धिमुखेन निर्गता । विभाति पर्यन्ततमःसमावृता सुवर्णरेखेव कषे निवेशिता ॥ १७ ॥
गहनों के जोड़ों को इससे खोलता है, सांकड़ या किल्ली आदि से बन्द किये गये दरवाजे का खोलना इससे होता है और कीड़ा तथा साँप से काटे गये व्यक्ति का ( विषप्रवाह रोकने के लिये ) लपेटना होता है ।। १६ ।।
टीका--चौरब्राह्मणस्य यज्ञोपवीतादुपकारे वैशिष्ट्यं दर्शयति-एतेनेति । अस्मद्विधः चौरः, भित्तिषु=कुड्येषु, एतेन=यज्ञोपवीतसूत्रेण, कर्ममार्गम्=चौर्य- कार्यपथम्, सन्धिमिति यावत्, मापयति = दीर्घत्वविस्तारयोः परिमितं करोति, एतेन=यज्ञोपवीतसूत्रेणैव, भूषणसम्प्रयोगान्=अलङ्काराणां दृढबन्धनानि, मोचयति= निःसारणाय शिथिलीकरोति, यन्त्रदृढे=अर्गलादिना सम्यग् दृढीकृते तेन अङ्गुष्ठादि- प्रवेशायोग्ये, कपाटे=द्वारावरके काष्ठखण्डे, उद्घाटनम्=उन्मोचनम्, भवति, कीट- भुजगैः=वृश्चिकादिभिः कीटैः सर्पश्च, दष्टस्य=सञ्जातदशनस्य, पुरुषस्य, परि- वेष्टनम्=परितः बन्धनम्, च, भवति, अत्र समुच्चयः तुल्ययोगिता चालङ्कारौ । वसन्ततिलकं वृत्तम् ।। १६ ।।
विमर्श--यहाँ यज्ञोपवीत के उत्कर्ष के प्रति बहुत कारणों का निर्देश होने से समुच्चय अलंकार है । तथा 'भवति' इसमें उद्घाटन तथा परिवेष्टन के अन्वय से तुल्ययोगिता अलंकार भी हैं । वसन्ततिलका छन्द है ।। १६ ।।
अर्थ--नाप कर सेन्ध लगाना प्रारम्भ करता हूँ । ( सेंध लगाकर और देखकर ) अब इस सेंध का एक ही ईंटा निकालना बाकी बचा है । हाय कष्ट है ! साँप ने काट लिया । ( जनेऊ से अंगुली को बांध कर विष के वेग=बढ़ने का अभिनय करता है, चिकित्सा करके ) अब स्वस्थ=ठीक हो गया हूँ । ( फिर सेंध कार्य करके और देख कर ) अरे दीपक जल रहा । जैसा कि--
अन्वयः--सुवर्णपिञ्जरा, सन्धिमुखेन, महीतले, निर्गता, पर्यन्ततमःसमावृता, प्रदीपस्य, शिखा, कषे, निवेशिता, सुवर्णस्य, रेखा, इव विभाति ॥ १७ ॥
२०६
मृच्छकटिकम्
(पुनः कर्म कृत्वा) समाप्तोऽयं सन्धिः। भवतु; प्रविशामि। अथवा न तावत् प्रविशामि, प्रतिपुरुषं निवेशयामि। (तथा कृत्वा।) अये! न कश्चित्। नमः कार्त्तिकेयाय। (प्रविश्य दृष्ट्वा च) अरे! पुरुषद्वयं सुप्तम्। भवतु, आत्मरक्षार्थं द्वारमुद्घाटयामि। कथं जीर्णत्वाद् गृहस्य विरौति कपाटम्। तद् यावत् सलिलमन्वेषयामि। क्व नु खलु सलिलं भविष्यति? (इतस्ततो दृष्ट्वा सलिलं गृहीत्वा क्षिपन् सशङ्कम् ) मा तावत् भूमौ पतत्
शब्दार्थ—सुवर्णपिञ्जरा=सोने के समान पिङ्गल वर्ण वाली, सन्धिमुखेन=सेंध के रास्ते से, छिद्र से, महीतले=भूतल पर, निर्गता=निकली हुई, पर्यन्ततमस्समावृता=चारो ओर अन्धकार से घिरी हुई, प्रदीपस्य=दीपक की, शिखा=कान्ति, रोशनी, कषे=कसौटी पर, निवेशिता=खींची गई, कसी गई, सुवर्णस्य=सोने की, रेखा=लकीर के, इव=समान, विभाति=शोभित हो रही है ॥ १७ ॥
अर्थ—सोने के समान पिङ्गलवर्णवाली, सेंध के रास्ते से पृथ्वी पर निकलने वाली, चारो ओर अन्धकार से घिरी हुई, दीपक की कान्ति=रोशनी, कसौटी पर खींची गई सोने की रेखा के समान शोभित हो रही है ॥ १७ ॥
टीका—सन्धिमार्गविनिर्गतं दीपप्रभासौन्दर्यं वर्णयन्नाह—शिखेति। सुवर्णपिञ्जरा=स्वर्णवत् पिङ्गलवर्णा, सन्धिमुखेन=सन्धिविवरेण, महीतले=भूतले, बाह्यप्रदेशे इत्यर्थः, निर्गता=निःसृता, पर्यन्ततमःसमावृता=पर्यन्तेषु=प्रान्तप्रदेशेषु चतुष्पाश्र्वेषु, परिवेष्टिता, प्रदीपस्य=दीपकस्य, शिखा=कान्तिः, प्रकाश इति भावः, कषे=परीक्षणपाषाणे, निवेशिता=कषिता, अर्पिता, सुवर्णस्य=कनकस्य, रेखा=लेखा, इव=यथा, विभाति=शोभते, उपमालंकारः, वंशस्थं वृत्तम् ॥ १७ ॥
विमर्श—सन्धिमुखेन निर्गता—भीतर जलने वाले दीपक की जो रोशनी सेंध के माध्यम से बाहर पृथ्वी पर पतली रेखा के समान दिखाई दे रही है उस की वैसी ही शोभा है जैसी कसौटी पर खींची गई सोने की रेखा की। इस प्रकार शिखा और रेखा का साम्य होने से उपमा अलंकार है। पिञ्जरा—पीला लाल मिश्रित रंग। वंशस्थ छन्द है ॥ १७ ॥
अर्थ—(फिर सेंध फोड़कर) अब सेंध बन चुकी है। अच्छा, अब प्रवेश करता हूँ। अथवा पहले स्वयं प्रवेश नहीं करता हूँ, नकली पुरुष को प्रवेश कराता हूँ। (वैसा करके) अरे! कोई नहीं है। कार्त्तिकेय को नमस्कार है। (प्रवेश करके और देखकर) अरे, दो लोग सो रहे हैं। अच्छा अपनी रक्षा के लिये दरवाजा खोलता हूँ। क्यों, घर पुराना होने के कारण किवाड़ा आवाज कर रहा है। तो तब तक पानी खोजता हूँ। (इधर उधर देखकर पानी लेकर गिराता हुआ शङ्कित होते हुये) जमीन पर गिरता हुआ (यह पानी) आवाज पैदा न
| तृतीयोऽङ्कः | २०७ |
|---|
शब्दमुत्पादयेत् । ( पृष्ठेन प्रतीक्ष्य कपाटमुद्घाट्य । ) भवतु, एवं तावदिदानीं परीक्षे किं लक्ष्यसुप्तम् उत परमार्थसुप्तमिदं द्वयम् ? ( त्रासयित्वा परीक्ष्य च ) अये ! परमार्थसुप्तेनानेन भवितव्यम् । तथाहि—
निःश्वासोऽस्य न शङ्कितः सुविशदः तुल्यान्तरं वर्त्तते
दृष्टिर्गाढनिमीलिता न विकला नाभ्यन्तरे चञ्चला ।
गात्रं स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलं शय्याप्रमाणाधिकं
दीपञ्चापि न मर्षयेदभिमुखं स्याल्लक्ष्यसुप्तं यदि ॥ १८ ॥
करे। तो ऐसा करूँ। ( पीठ से सहारे से किवाड़ को हटाकर अथवा पीछे देखकर और खोलकर ) अच्छा, अब इस प्रकार से परीक्षा लेता हूँ कि ये दोनों क्या छल से सोये हुये हैं अथवा वास्तव में सोये हुये हैं ? ( डराकर और परीक्षा करके ) अरे ये दोनों वास्तव में सोये हुये हैं, जैसा कि—
अन्वयः— अस्य, निःश्वासः, शङ्कितः, न, ( अपि तु ) सुविशदः, तुल्यान्तरम्, वर्तते, दृष्टिः, गाढनिमीलिता, ( अस्ति ), विकला, न, अभ्यन्तरे, चञ्चला, न, वर्तते, गात्रम्, स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलम्, शय्याप्रमाणाधिकम्, च, ( वर्तते, ) यदि, लक्ष्यसुप्तम्, स्यात्, तदा, अभिमुखम्, दीपम्, च, अपि, न, मर्षयेत् ॥ १८ ॥
शब्दार्थ— अस्य = सोये हुये पुरुषद्वय का, निःश्वासः = सांस लेना, शङ्कितः = शङ्कायुक्त, न = नहीं ( अर्थात् स्वाभाविक गति से चलने वाला है ) सुविशदः = साफ साफ, तुल्यान्तरम् = समान अन्तर वाली, वर्तते = है, दृष्टिः = आँखें, गाढनिमीलिता = अच्छी प्रकार से बन्द है, न विकला = व्याकुल नहीं है, और, न चञ्चला = न तो चञ्चल = फड़कने वाली ही है, गात्रम् = शरीर, स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलम् = शरीर की सन्धियों = जोड़ों के ढीले होने से शिथिल, शय्याप्रमाणाधिकम् = पलंग की लम्बाई चौड़ाई से अधिक है, यदि लक्ष्यसुप्तम् = यदि बहाने से सोया हुआ होता, तदा = तब तो, अभिमुखम् = सामने जलते हुये, दीपम् = दीपक को, अपि = भी, न = नहीं, मर्षयेत् = सहन कर पाता ॥ १८ ॥
अर्थ— दोनों व्यक्तियों का सांस लेना शंकायुक्त नहीं है, साफ साफ है और उनमें समान अन्तर है। आँख अच्छी प्रकार बन्द है, न तो व्याकुल है और न भीतर चञ्चल है। शरीर के जोड़ों ( सन्धियों ) के ढीले हो जाने से शिथिल और पलंग के परिमाण की अपेक्षा अधिक अर्थात् पलंग से बाहर शरीर है। और यदि बहाने से सोये हुये होते तो सामने जलते हुये दीपक को भी सहन नहीं कर पाते। ( अतः वास्तव में ही सोये हैं ।) ॥ १८ ॥
टीका— पुरुषद्वयस्य परमार्थसुप्ततां साधयितुं परमार्थसुप्तिलक्षणानि वर्णयति—निःश्वास इति । अस्य = पुरुषद्वयस्य, निःश्वासः = नासिकारन्ध्रविनिर्गतः
| २०८ | मृच्छकटिकम् |
|---|
( समन्तादवलोक्य । ) अये ! कथं मृदङ्गः, अयं दर्दुरः, अयं पणवः, इयमपि वीणा, एते वंशाः, अमी पुस्तकाः । कथं नाट्याचार्यस्य गृहमिदम् । अथवा, भवनप्रत्ययात् प्रविष्टोऽस्मि । तत् किं परमार्थदरिद्रोऽयम् ? उत राजभयाच्चोरभयाद्वा भूमिष्ठं द्रव्यं धारयति ? । तन्ममापि नाम शर्विलकस्य भूमिष्ठं द्रव्यम् ? । भवतु, बीजं प्रक्षिपामि । (तथा कृत्वा ।) निक्षिप्तं बीजं न क्वचित् स्फारीभवति । अये ! परमार्थदरिद्रोऽयम् । भवतु, गच्छामि ।
विदूषकः---( उत्स्वप्नायते । ). भो वअस्स ! सन्धी विअ दिस्सदि, चोरं विअ पक्खामि; ता गेण्हदु भवं एदं सुवण्णभण्डअं । ( भो वयस्य ! सन्धिरिव दृश्यते, चौरमिव पश्यामि, तद् गृह्णातु भवानिदं सुवर्णभाण्डम् । )
प्राणवायुः, शक्तिः=शङ्काग्रस्तः, न=नैव, अपि तु, सुविशदः=सुस्पष्टः, तुल्यान्तरम्=तुल्यम्=समानम् अन्तरं यथा स्यात् तथा, वर्तते=विद्यते, दृष्टिः=नेत्रम्, गाढनिमीलिता=सुदृढरूपेण मुद्रिता, विकला=व्याकुला, न=नैव, आभ्यन्तरे=नेत्राभ्यन्तरे, चञ्चला=चपला, न = नैव, वर्तते, तेन नेयं कपटनिद्राग्रस्ततेति भावः । गात्रम्=शरीरम्, स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलम्=शिथिलावयवतया पतितम् तथा, शय्याप्रमाणाधिकम्=पर्यङ्कस्य प्रमाणादधिकम्=अतिरिक्तम्, वर्तते; यदि=चेत्, लक्ष्यसुप्तम्=कपटनिद्रितम्, स्यात्=भवेत्, तदा, अभिमुखम्=समक्षम्, दीपम्=प्रज्वलितदीपकम्, च, न=नैव, मर्षयेत्=सहेत । स्वभावोक्तिरलङ्कारः शार्दूलविक्रीडितं च वृत्तम् ॥१८॥
विमर्श---इस में सोते हुये व्यक्ति की स्वाभाविक स्थिति का अतीव सुन्दर वर्णन होने से स्वभावोक्ति अलङ्कार है । शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ १८ ॥
अर्थ---( चारो ओर देख कर ) अरे ! क्या मृदङ्ग है ? यह दर्दुर ( एक वाद्य-विशेष ), यह पणव, यह वीणा भी है, ये बांसुरियां हैं, ये पुस्तकें हैं । तो क्या किसी नाच गाना सिखाने वाले का घर है ? अथवा ( विशाल ) भवन का विश्वास करके घुसा हूँ । तो क्या यह वास्तव में दरिद्र है । अथवा राजा के भय से या चोर के भय से धन को जमीन में गाड़ कर रखा है । तो क्या मुझ शर्विलक के लिये भी जमीन में गाड़ा हुआ धन ( अप्राप्य ) है ? अच्छा, तो बीज फेंकता हूँ । ( बीज फेंक कर ) फेंका हुआ बीज कहीं नहीं फैल रहा है । अरे ! यह तो वास्तव में दरिद्र है । अच्छा तो यहाँ से चलता हूँ ।
विदूषकः---( स्वप्न में बड़बड़ाता है ) अरे मित्र ! सेंध जैसी दिखाई दे रही हैं । चोर जैसा देख रहा हूँ । तो इस स्वर्णभाण्ड ( गहनों के डिब्बे ) को आप ले लें ।
टीका---मृदङ्गः=वाद्ययन्त्रविशेषः । एतल्लक्षणन्तु---
चर्मणा नद्धवदनो मध्ये चैव पृथुर्भवेत् । मृत्तिकानिर्मितश्चैव मृदङ्गः परिकीर्तितः ॥
तृतीयोऽङ्कः २०९
शर्विलकः— किं नु खलु अयमिह मां प्रविष्टं ज्ञात्वा दरिद्रोऽस्मीत्युपहसति ? तत् किं व्यापादयामि ? उत लघुत्वादुत्स्वप्नायते । (दृष्ट्वा ।) अये, जर्जर-स्नानशाटीनिबद्धं दीपप्रभयोद्दीपितं सत्यमेवैतदलङ्कणभण्डम् । भवतु, गृह्णामि । अथवा, न युक्तं तुल्यावस्थं कुलपुत्रजनं पीडयितुम् । तद् गच्छामि ।
विदूषकः— भो वअस्स ! साविदोसि गोबम्हणकामाए, जइ एदं सुवण्णभण्डअं ण गेण्हसि । ( भो वयस्य ! शापितोऽसि गोब्राह्मणकाम्यया, यदि एतत् सुवर्णभाण्डं न गृह्णासि । )
पणवः=पटहभेदो वाद्ययन्त्रविशेषः, कथमिति जिज्ञासायाम्, भवनप्रत्ययात् = होचितविभूतिविश्वासात्; गृहस्यास्य बहिराडम्बरमालोक्य मयैतद्विश्वस्तं यदेतद्धनिकगृहमिति । तथा चात्र ममाभीष्टसिद्धिर्भविष्यतीति भावः । पुस्तकाः=पुस्तकानि, पुस्तकशब्द उभयलिङ्गः । राजभयात्=राजकर्तृकाहरणभीतेः, चोरभयात्=चोरकर्तृकापहरणभीतेः, भूमिष्ठम्=भूमितलनिखातम्, धारयति=स्वामित्वेनाधिकरोति, बीजम्=भूमितलनिहितधनस्य सदसद्भावज्ञापकं पदार्थ-विशेषम् मन्त्रविशेषं वा, स्फारीभवति=प्रसरति; निखातधने सति भूतले समन्त्रबीजे निक्षिप्ते तस्य बहुलीभावः स्यादिति चौरशास्त्रप्रसिद्धिः, परन्तु अत्र तु न तथेति वास्तविकदरिद्रत्वं निश्चितम् । उत्स्वप्नायते=उत्कृष्टः=सत्यत्वेन प्रशस्यः स्वप्नो यस्य सः=उत्स्वप्नः, तद्वदाचरतीति क्यङि उत्स्वप्नायते, शयान एव किञ्चित् जल्पतीति भावः ।
अर्थ—शर्विलक— तो क्या यह सचमुच मुझे यहाँ आया हुआ देखकर "मैं दरिद्र हूँ" ऐसा (सूचित करता हुआ) मेरी हँसी उड़ा रहा है । तो क्या मार डालूँ ? अथवा दुर्बल मनवाला होने से बड़बड़ा रहा है । (देख कर) अरे, सचमुच ही पुरानी नहाने वाली साड़ी में बँधा हुआ, दीपक की कान्ति से चमकने वाला सोने के गहनों का डिब्बा है । अच्छा तो ले लेता हूँ । अथवा अपने समान दशा वाले कुलपुत्र को दुखी करना ठीक नहीं है । अतः चलता हूँ ।
विदूषक— मित्र ! तुम्हें गाय और ब्राह्मण की शपथ है यदि इस सुवर्णभाण्ड को नहीं लेते हो ।
टीका— उपहसति=उपहासं करोति, अत्र धनादिप्राप्तिभ्रान्त्या व्यर्थमेव प्रविष्ट इति उपहसतीति भावः, व्यापादयामि=हन्मि, जर्जरस्नानशाटीनिबद्धम्=जर्जरा या स्नानशाटी=अभ्यङ्गशाटिका, तया परिवेष्टितम्, दीपप्रभया=प्रदीपप्रकाशेन, उद्दीपितम् = देदीप्यमानं जातम्, तुल्यावस्थम् = तुल्या = समाना निर्धनतारूपा अवस्था=दशा यस्य तं तादृशम्, कुलपुत्रजनम् = सत्कुले उत्पन्नम्, पीडयितुम्=बाधितुम्; गोब्राह्मणकाम्यया=गवां ब्राह्मणानाञ्च काम्यया=अभिलाषेण,
१४ मृ०
२१० मृच्छकटिकम्
शर्विलकः—अनतिक्रमणीया भगवती गोकाम्या ब्राह्मणकाम्या च । तद् गृह्णामि । अथवा, ज्वलति प्रदीपः । अस्ति च मया प्रदीपनिवार्पणार्थमाग्नेयः कीटो धार्यते । तं तावत् प्रवेशयामि, तस्यायं देशकालः । एष मुक्तो मया कीटो यात्वेव अस्य दीपस्य उपरि मण्डलैविविचत्रैर्विचरितुम् । एष पक्षद्वयानिलैन निर्वापितो भद्रपीठेने । धिक् कृतमन्धकारम् । अथवा, मयापि अस्मद्ब्राह्मणकुले न धिक् कृतमन्धकारम् ? अहं हि चतुर्वेदविदोऽप्रतिग्राह-कस्य पुत्रः शर्विलको नाम ब्राह्मणो गणिकामदनिकार्यमकार्यमनुतिष्ठामि । इदानीं करोमि ब्राह्मणस्य प्रणयम् । ( इति जिघृक्षति । )
विदूषकः—भो वअस्स ! सीदलो दे अग्गहत्थो । ( भो वयस्य ! शीतलस्ते अग्रहस्तः । )
शर्विलकः—धिक् प्रमादः । सलिलसम्पर्कात् शीतलो मे अग्रहस्तः । भवतु, कक्षयोर्हस्तं प्रक्षिपामि । ( नाट्येन सव्यहस्तमुष्णीकृत्य गृह्णाति । )
विदूषकः—गहिदं ? । ( गृहीतम् ? )
गोब्राह्मणानामभिलाषाऽपूरणे यत् पातकं स्यात् तादृशमेवेदानीं मम हस्तात् सुवर्ण-भाण्डग्रहणे सति भविष्येति भावः ।
**अर्थ—शर्विलक—**भगवती गाय की अभिलाषा और ब्राह्मण की अभिलाषा अनुल्लङ्घनीय होती है । अतः ( सुवर्णभाण्ड ) ले लेता हूँ । किन्तु दीपक जल रहा है । दीप बुझाने के लिये मेरे पास आग्नेय कीड़ा है । तो इसे भेजता हूँ । इसे छांड़ने के लिये यही उचित स्थान और समय है । मेरे द्वारा छोड़ा गया यह कीड़ा इस दीपक के ऊपर विचित्र रूप से मंडराने के लिये उड़े । इस भद्रपीठ ( कीड़े ) ने अपने दोनों पंखों की हवा से ( यह दीपक ) बुझा दिया है । धिक्कार है, अन्धकार हो गया । अथवा मुझ ब्राह्मण ने भी क्या अपने ब्राह्मणकुल में अँधेरा नहीं कर डाला ? ( अर्थात् अवश्य कर डाला । ) मैं चारों वेद जानने वाले, दान न लेने वाले का पुत्र शर्विलक नामक ब्राह्मण वेश्या मदनिका के लिये यह अनुचित कार्य करता हूँ । अब ब्राह्मण का प्रणय ( पूरा ) करता हूँ, ( स्वर्णभाण्ड ले लेता हूँ । ) ( ऐसा कह कर ले लेना चाहता है । )
**विदूषक—**मित्र ! तुम्हारी अँगुलियाँ ठण्डी हैं ।
**शर्विलक—**ओह ! प्रमाद ( हो गया ), पानी छूने के कारण हाथ ठण्डा पड़ गया है । अच्छा, कांख में दोनों हाथ रखता हूँ । ( अभिनय के साथ दाहिना हाथ गरम करके ले लेता है । )
**विदूषक—**ले लिया ?
तृतीयोऽङ्कः २११
शर्विलकः— अनतिक्रमणीयोऽयं ब्राह्मणप्रणयः । तद् गृहीतम् ।
विदूषकः— दाणीं विक्किणिद-पण्णो विअ वाणिओ, अहं सुहं सुविस्सं ।
( इदानीं विक्रीतपण्य इव वाणिजः अहं सुखं स्वप्स्यामि )
शर्विलकः— महाब्राह्मण ! स्वपिहि वर्षशतम् । कष्टम्, एवं मदनिका-गणिकार्थे ब्राह्मणकुलं तमसि पातितम् । अथवा, आत्मा पातितः !
धिगस्तु खलु दारिद्र्यमनिवेदितपौरुषम् ।
यदेतद्गर्हितं कर्म निन्दामि च करोमि च ॥ १६ ॥
शर्विलक— ब्राह्मण का आग्रह टाला नहीं जा सकता, अतः ले लिया ।
विदूषक— अब बेचने योग्य सामान को बेच कर निश्चिन्त हुये बनिया के समान सुख से सोऊँगा ।
शर्विलक— महाब्राह्मण ! सौ वर्ष सोओ । कष्ट है, वेश्या मदनिका के लिये ब्राह्मणकुल को अन्धकार में इस प्रकार गिरा दिया है । अथवा आत्मा ( अपने आप ) को ही गिरा दिया है ।
टीका— अनतिक्रमणीया = अनुल्लङ्घनीया, भगवती=शक्तिमयी, अस्ति च, अयं प्रारम्भसूचकोऽनर्थकः शब्द इति बोध्यम्, सार्थकत्वे अन्वयोपपादनासम्भवात्; आग्नेयः=अग्निदेवताकः, अग्निशमनकारक इति भावः । देशकालः=आदेशस्य समयः द्वन्द्वे तु एकवचनं पुंस्त्वं च चिन्त्यम, विचरितुम् = सङ्क्रमितुम्, पक्षद्वया-निलेन=पक्षद्वयजनितपवनेन, भद्रपीठेन = तन्नामकेन, अप्रतिग्राहकस्य = अगृहीतुः, अकार्यम्=चौर्यम्, प्रणयम् = प्रार्थनाम्, जिघृक्षति = ग्रहीतुम् इच्छति, अग्रहस्तः= कराग्रभागः सव्यहस्तम्=दक्षिणहस्तम्, विक्रीतपण्यः=विक्रीतं पण्यं=विक्रेयं वस्तु येन सः।
अन्वयः— अनिवेदितपौरुषम्, दारिद्र्यम्, धिक्, अस्तु, खलु, यत्, एतत्, गर्हितम्, कर्म, निन्दामि, च, करोमि, च ॥ १६ ॥
शब्दार्थ— अनिवेदितपौरुषम्=अप्रदर्शितपौरुषवाली, दारिद्र्यम्=गरीबी को, धिक्=धिक्कार, अस्तु=हो, खलु=निश्चयेन, यत्=क्योंकि, एतत्=इस, गर्हितम्=निन्दित, कर्म=चोरी की, निन्दामि=बुराई भी करता हूँ, च=और, करोमि=कर भी रहा हूँ ॥ १६ ॥
अर्थ— जिसमें पौरुष प्रदर्शित नहीं हो पाता ऐसी गरीबी को निश्चित ही धिक्कार है । क्योंकि इस निन्दित चोरी की बुराई भी कर रहा हूँ और (उसे ही) कर भी रहा हूँ ॥ १६ ॥
टीका— एतादृशदुष्कृतिनिदानतया दारिद्र्यमेव निन्दन्नाह —धिगस्त्विति । अनिवेदितम्=अप्रदर्शितम्, अकथितं वा पौरुषम्=पुरुषकारः यत्र तादृशम्, अनिवेदित-
२१२ || मृच्छकटिकम्
तद्यावत् मदनिकाया निष्क्रयणार्थं वसन्तसेनागृहं गच्छामि । ( परिक्रम्य अवलोक्य च ) अये ! पदशब्द इव । मा नाम रक्षिणः । भवतु, स्तम्भीभूत्वा तिष्ठामि । अथवा ममापि नाम शर्विलकस्य रक्षिणः ? योऽहम्—
मार्जारः क्रमणे, मृगः प्रसरणे, श्येनो ग्रहालुञ्चने सुप्तासुप्तमनुष्यवीर्यतुलने श्वा, सर्पणे पन्नगः । माया रूप-शरीर-वेश-रचने, वाग् देशभाषान्तरे, दीपो रात्रिषु, सङ्कटेषु डुडुभो, वाजी स्थले, नौर्जले ॥ २० ॥
पौरुषम्--इति पाठे अगणितपौरुषम्, दारिद्र्यम् = निर्धनत्वम्, खलु = निश्चयेन, धिक्=धिक्कृतम्, अस्तु = भवतु, यत्=यस्मात् ( अहं दरिद्रः ) एतत्=क्रियमाणं परधनापहरणस्वरूपम्, कर्म=चौर्यम्, निन्दामि = अपवदामि, करोमि च=सम्पादयामि च । अत्र काव्यलिङ्गं दीपकञ्च अलङ्कारः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ १९ ॥
विमर्श—अनिवेदितपौरुषम्=इसके स्थान पर 'अनिर्वेदितपौरुषम्' यह भी पाठ मिलता है । 'प्रकरणनिश्चययोः निर्वेदः--इसके अनुसार अनिश्चितम्=अगणितम् पौरुषम् यत्र तादृशम् --अर्थात् जहाँ पौरुष की गणना ही नहीं हो पाती है । मूलपाठ के अनुसार जहाँ पौरुष का कथन ही नहीं हो पाता है । दोनों का तात्पर्य एक है । यहाँ उत्तरार्ध के हेतुरूपेण उपन्यस्त होने से काव्यलिङ्ग और एक कर्ता का दो क्रियाओं में सम्बन्ध होने से दीपक अलंकार है । पथ्यावक्त्र छन्द है ।। १६ ।।
अर्थ—तो अब मदनिका को ( दासीत्व से ) मुक्त कराने के लिये वसन्तसेना के घर चलता हूँ ।
( घूम कर और देख कर )
अरे, पैर की आवाज सी ( सुनाई दे रही है । ) कहीं पहरेदार न आ जायें । अच्छा, कुछ देर खम्भा के समान चुपचाप खड़ा होता हूँ । अथवा मुझ शर्विलक के लिये भी पहरेदार ( भय की चीज हैं ) ?
अन्वयः—यः, अहम्--इति गद्यस्थेनान्वयः, क्रमणे, मार्जारः; प्रसरणे, मृगः; ग्रहालुञ्चने, श्येनः; सुप्तासुप्तमनुष्यवीर्यतुलने, श्वा; सर्पणे, पन्नगः; रूप-शरीरवेश-रचने, माया; देशभाषान्तरे, वाक्; रात्रिषु, दीपः; सङ्कटेषु, डुडुभः; स्थले, वाजी; जले, नौः ( अस्मि ) ॥ २० ॥
शब्दार्थ—( यः अहम्=जो मैं ), क्रमणे = उछलने में, मार्जारः = बिलाव; प्रसरणे=शीघ्र भागने में, मृगः=हिरन; ग्रहालुञ्चने=पकड़ने और झपटने में, श्येनः=बाज; सुप्तासुप्तमनुष्यवीर्यतुलने=सोये हुये अथवा न सोये ( =जागते हुये ) मनुष्य
तृतीयोऽङ्कः २१३
की शक्ति की जानकारी करने में, श्वा=कुत्ता; सर्पणे=सरकने में, पन्नगः=सांप; रूप-शरीर-वेशरचने=आकार, शरीर और वेशभूषा इनको बदलने में, माया=इन्द्रजाल; देशभाषान्तरे=विभिन्न स्थानों की भाषा बोलने में, वाक्=सरस्वती; रात्रिषु=रातों में, दीपः=दीपक; सङ्कटेषु=सङ्कट के समय में, डुडुभः=भेड़िया; स्थले=पृथ्वी पर, वाजी=घोड़ा; और, जले=पानी में, नौः=नाव हूँ ॥ २० ॥
**अर्थ—**जो मैं—उछलने में बिलाव, शीघ्र दौड़ने में हिरन, झपटकर पकड़ने और छीनने में बाज, सोते हुये और जागते हुये दोनों प्रकार के पुरुषों की शक्ति का पता लगाने में कुत्ता, सरकने में साँप, विभिन्न प्रकार के आकार, शरीर और वेशभूषा बनाने में इन्द्रजाल-विद्या, भिन्न-भिन्न स्थानों की भाषा बोलने में सरस्वती, रातों में दीपक, सङ्कटों में भेड़िया, जमीन पर घोड़ा और पानी में नौका हूँ ॥ २० ॥
**टीका—**सर्वत्र सर्वदा असीमप्रभावशालित्वमुपपादयितुं स्वशक्तिं वर्णयन्नाह—मार्जार इति। अत्र सर्वत्र वाक्येषु गद्यस्थेन 'योऽहम्' इत्यनेनान्वयः कार्यः। **क्रमणे=**उत्प्लवने आक्रमणे वा, **मार्जारः=**विडालः; **प्रसरणे=**त्वरितधावने, **मृगः=**हरिण; **ग्रहालुञ्चने=ग्रहः=**ग्रहणम्, **आलुञ्चनम्=**आच्छिद्य हरणञ्च इति ग्रहालुञ्चनम् तस्मिन्, **श्येनः=**दूरात् आगत्य लक्ष्यग्राही तदाख्यपक्षिविशेषः; **सुप्तासुप्तमनुष्य-वीर्यतुलने=**सुप्तस्य निद्रितस्य, असुप्तस्य=जागरितस्य च मानवस्य यत् **वीर्यम्=**शक्तिः, **तत्तुलने=**परिज्ञाने, **श्वा=**कुक्कुरः; **सर्पणे=**द्रुतवक्रगमने, **पन्नगः=**सर्पः, **रूपस्य=**सितकृष्णादिवर्णस्य, **शरीरस्य=**देहस्य, **वेशस्य=**परिच्छदस्य च सम्पादने, **माया=**चातुर्यमयी विद्या, इन्द्रजालमिति यावत्; **देशभाषान्तरे=**देशभाषाविशेषे, नानादेशीयभाषाकथने इत्यर्थः **वाक्=**सरस्वती; **रात्रिषु=**निशासु, **दीपः=**प्रदीपः, सङ्कटेषु = विपत्तिषु, दुर्गमस्थलेषु वा, **डुडुभः=**तदाख्यपशुविशेषः, (अश्वतरः इति केचित्, वृक इत्यपरे); **स्थले=**भूमौ, **वाजी=**अश्वः; **जले=**नद्यादौ, **नौ =**तरणिः अस्मि इति भावः। अत्र एकस्मिन् शर्विलके तादात्म्येन मार्जाराद्यारोपात् मालारूपकमलंकारः, शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ २० ॥
**विमर्श—**शर्विलक ने अपने अनुपम गुणों एवं शक्ति का वर्णन किया है। जहाँ जैसा बन जाने पर काम हो सकता है वहाँ वैसा बन कर काम चलाना उसके लिये अतिसरल है। **ग्रहालुञ्चने... ग्रहे=**ग्रहणे अर्थात् दूर से आकर झपट कर पकड़ने और **आलुञ्चने=**छीन कर लेने में, बाज पक्षी, सङ्कटेषु डुडुभः—संकट का अर्थ विपत्ति तथा दुर्गम स्थल हैं। दुर्गम स्थल अर्थ अधिक अच्छा है। वृक खच्चर और भेड़िया को कहा जाता है। दोनों को तात्पर्यानुसार समझना चाहिये।
| २१४ | मृच्छकटिकम् |
|---|
अपि च—
भुजग इव गतौ, गिरिः स्थिरत्वे, पतगपतेः परिसर्पणे च तुल्यः । शश इव भुवनावलोकनेऽहं वृक इव च ग्रहणे बले च सिंहः ॥ २१ ॥
इसमें एक शर्विलक में ही तादात्म्य से मार्जार आदि का आरोप होने से मालारूपक अलङ्कार समझना चाहिये । एक शर्विलक का ही मार्जार आदि अनेक रूपों में उल्लेख होने से उल्लेख अलंकार की शंका की जा सकती है । परन्तु यहाँ शर्विलक में मार्जारत्व आदि वास्तविकरूप में नहीं है । अतः उल्लेख मानना सम्भव नहीं है । शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ २० ॥
अन्वयः— अहम्, गतौ, भुजगः, इव, स्थिरत्वे, गिरिः, परिसर्पणे, पतगपतेः, तुल्यः, भुवनावलोकने, शशः, इव, ग्रहणे, वृकः, इव, बले, च, सिंहः, अस्मि ॥ २१ ॥
शब्दार्थ— अहम् = मैं शर्विलक, गतौ = टेढ़ी मेढ़ी चाल में, भुजगः = साँप, इव = के समान, स्थिरत्वे = अचल रहने में, गिरिः = पहाड़, परिसर्पणे = शीघ्र चलने में, पतगपतेः = पक्षिराजगरुड के, तुल्यः = समान, भुवनावलोकने = एक समय में ही सारे संसार को देख लेने में, शशः = खरगोश, ग्रहणे = झपटकर पकड़ने में, वृकः = भेड़िया, च = और, बले = शक्ति, में, सिंहः = शेर, अस्मि = हूँ ॥ २१ ॥
अर्थ— मैं (शर्विलक) वक्र चलने में साँप के समान, अडिग रहने में पर्वत, शीघ्र चलने में पक्षिराज गरुड के समान, एक साथ सारे संसार को देख लेने में खरगोश के समान, (झपटकर) पकड़ने में भेड़िया के समान और बल में सिंह हूँ ॥ २१ ॥
टीका— पूर्वोक्तमेव स्वसामर्थ्यं पुनः वर्णयति—भुजग इति । अहम् = शर्विलकः गतौ = वक्रादिगमने, भुजगः = सर्पः, इव = यथा; स्थिरत्वे = अचलत्वे, गिरिः = पर्वतः, इव, परिसर्पणे = शीघ्रगमने, पतगपतेः = पक्षिराजगरुडस्य, तुल्यः = समानः, भुवनावलोकने = जगतः दर्शने, चतुर्दिक्दर्शने इति भावः, शशः = शशक इव, ग्रहणे = आक्रम्य लक्ष्यग्रहणे, वृकः = ईहामृगः, इव, बले = सत्त्वे, च, सिंह = मृगेन्द्रः इव, अस्मि = वर्ते । अत्र उपमेयभूतस्य एकस्य शर्विलकस्य विषयविशेषेषु भुजग-गिरिपतगपत्यादिभिः बहुभिरुपमानैः साम्यकथनात् मालोपमालङ्कारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ २१ ॥
विमर्श— पूर्वोक्त श्लोक के समान ही इसमें भी शर्विलक अपनी विशेषता बताता है । यहाँ उपमेय एक शर्विलक का भुजग, गिरि, पतगपति आदि बहुत से उपमानों के साथ साम्य कहने के कारण मालोपमा अलंकार है । कुछ ने उल्लेख अलकार माना है । पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ २१ ॥
तृतीयोऽङ्कः २१५
( प्रविश्य । )
रदनिका—हद्धी ! हद्धी ! बाहिर-दुआर-सालाए पसुत्तो वड्ढमाणओ, सोवि एत्थ ण दीसइ । भोदु, अज्जमित्तेअं सद्द्दावेमि । ( हा धिक् हा धिक् ! बहिर्द्वारशालायां प्रसुप्तो बर्द्धमानकः, सोऽप्यत्र न दृश्यते । भवतु, आर्यमैत्रेयं शब्दापयामि । )
शर्विलकः—( रदनिकां हन्तुमिच्छति । निरूप्य ) कथं स्त्री ! भवतु, गच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । )
रदनिका—( गत्वा सत्रासम् ) हद्धी ! हद्धी ! अम्हाणं गेहे सन्धि कप्पिअ चोरो णिक्कमदि । भोदु, मित्तेअं गदुअ पबोधेमि । ( विदूषकमुपगम्य ) अज्जमित्तेअ ! उट्ठेहि उट्ठेहि; अम्हाणं गेहे सन्धिं कपिअ चोरो णिक्कन्तो । ( हा धिक् हा धिक् ! अस्माकं गेहे सन्धि कल्पयित्वा चोरो निष्क्रामति । भवतु, मैत्रेयं गत्वा प्रबोधयामि । आर्यमैत्रेय ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ, अस्माकं गेहे सन्धि कल्पयित्वा चौरो निष्क्रान्तः । )
विदूषकः—( उत्थाय ) आः दासीए धीए ! किं भणासि 'चोरं कप्पिअ सन्धी णिक्कन्तो ?' । ( आः दास्याः पुत्रि ! किं भणसि 'चोरं कल्पयित्वा सन्धिनिष्क्रान्तः ?' )
रदनिका—हदास ! अलं परिहासेण । किं ण पेक्खसि एणं ? । ( हताश ! अलं परिहासेन । किं न प्रेक्षसे एनम् ? )
विदूषकः—आः दासीए धीए ! किं भणासि दुदीअं विअ दुआरअं उग्-घाणिदं त्ति । वअस्स ! चारुदत्त ! उट्ठेहि, उट्ठेहि ! अम्हाणं गेहे सन्धि दइअ चोरो णिक्कन्तो । ( आः दास्याः पुत्रि ! किं भणसि द्वितीय-
( प्रवेश करके )
**अर्थ—रदनिका—**हाय ! हाय ! बाहर दरवाजे की कोठरी में वर्द्धमानक सोया हुआ था, वह भी नहीं दिखाई दे रहा है । अच्छा, आर्य मैत्रेय को बुलाती हूँ ।
शर्विलक—( रदनिका को मार डालना चाहता है । देख कर ) ओह, यह तो स्त्री है । अच्छा ( यहाँ से ) जाता हूँ । ( इस प्रकार चला जाता है । )
रदनिका—( घूम कर, भय के साथ ) हाय, हाय, हमारे घर में सेंध लगा कर चोर भागा जा रहा है । अच्छा, जाकर मैत्रेय को जगाती हूँ । ( विदूषक के समीप जाकर ) आर्य मैत्रेय । उठो, उठो, हम लोगों के घर में सेंध लगा कर चोर निकल गया ।
विदूषक—( उठ कर ) अरी दासी की पुत्री, क्या कह रही हो 'चोर कों फड़ कर सेंध निकल गई ।'
**रदनिका—**अरे मूर्ख ! हँसी मत करो । क्या इसे नहीं देख रहे हो ?
**विदूषक—**अरी दासी की पुत्री क्या कह रही हो 'दूसरा दरवाजा सा खोल
२१६ मृच्छकटिकम्
मिव द्वारकम् उद्घाटितमिति । भो वयस्य ! चारुदत्त ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ । अस्माकं गेहे सन्धिं दत्त्वा चौरो निष्क्रान्तः । )
चारुदत्त :—भवतु । भोः ! अलं परिहासेन ।
विदूषक:—भो ! ण परिहासो । पेक्खदु भवं । ( भोः ! न परिहासः प्रेक्षतां भवान् । )
चारुदत्त :—कस्मिन्नुद्देशे ? ।
विदूषक:—भो ! एसो । ( भोः एषः । )
चारुदत्त :—( विलोक्य । ) अहो ! दर्शनीयोऽयं सन्धिः ।
उपरितलनिपातितेष्टकोऽयं
शिरसि तनुर्विपुलश्च मध्यदेशे !
असदृशजन-सम्प्रयोगभीरो-
र्हृदयमिव स्फुटितं महागृहस्य ॥ २२ ॥
दिया' । हे मित्र चारुदत्त उठिये, उठिये । हम लोगों के घर में चोर सेंध लगाकर निकल गया ।
चारुदत्त-—अच्छा, अरे मित्र हँसी मत करो ।
विदूषक--अरे ! हँसी नहीं है, क्या आप नहीं देख रहे हैं ?
चारुदत्त--किस जगह ?
विदूषक--अरे, यह है ।
चारुदत्त--( देख कर ) ओह ! यह सेंध तो दर्शनीय है ।
टीका-—शब्दापथापि = आह्वयामि, कथमिति आश्चर्यं, सत्रासम् = सन्धिं विलोक्य चौरसमागमभीत्येति भावः, कल्पयित्वा = सम्पादयित्वा, निष्क्रामति = पलायते, चौरं कल्पयित्वेत्यादिकं विदूषककथनं सम्भ्रममूलकमेव, हताश इति मूर्खत्वे, उद्देशे = प्रदेशे, स्थाने दर्शनीयः = अवलोकनीयः, निर्माणनैपुण्यातिशय-दर्शनादिति भावः ।
अन्वयः-—उपरितल-निपातितेष्टकः, शिरसि, तनुः, मध्यदेशे, च, विपुलः, अयम् ( सन्धिः ) असदृशजनसम्प्रयोगभीरोः, महागृहस्य, स्फुटितम्, हृदयम्, इव, ( दृश्यते ) ॥ २२ ॥
शब्दार्थः-—उपरितलनिपातितेष्टकः=ऊपर से हटा दी गई हैं ईंटें जिससे ऐसी, शिरसि=सिर पर, ऊपर, तनुः=छोटी, मध्यदेशे=बीचवाले भाग में, विपुलः=चौड़ीं, अयम्=यह सेन्ध, असदृशजन-सम्प्रयोगभीरोः=अनुचित व्यक्ति चोर आदि के आजाने से भयभीत, महागृहस्य = विशाल भवन के, स्फुटितम् = फटे हुये, विदीर्ण, हृदयमिव=हृदय के समान, दृश्यते=दिखाई दे रही है ।। २२ ।।
तृतीयोऽङ्कः २१७
कथमस्मिन्नपि कर्मणि कुशलता।
विदूषकः---भो वअस्स ! अअं सन्धो दुवेहिं ज्जेव दिण्णो भवे। आहु, आगन्तुएण सिक्खिदुकामेण वा। अण्णधा इध उज्जइणीए को अम्हाणं घरविहवं ण जाणादि ? । ( भो वयस्य ! अयं सन्धिर्द्वाभ्यामेव दत्तो भवेत्। अथवा आगन्तुकेन शिक्षितुकामेन वा। अन्यथा इह उज्जायिन्यां कः अस्माकं गृहविभवं न जानाति ? )
अर्थ---जिसमें ऊपरी ओर ईंटें हटाईं गयीं हैं, जो ऊपरी तरफ छोटी और बीच में चौड़ी ( अर्थात् घट के मुख और मध्यभाग के समान ) यह सेन्ध, चोर आदि अनुचित व्यक्ति के प्रवेश करने के कारण डरे हुये विशाल भवन के फटे हुये हृदय=कलेजे के समान दिखाई पड़ रही है ॥ २२ ॥
टीका---स्वोक्तं सन्धेर्दर्शनीयत्वं वर्णयन्नाह—उपरितलेति । उपरितलात्=ऊर्ध्वभागात्, निपातिता=आकृष्य अपसारिता इष्टका यस्मात् सः, कुत्रचित् उरसि=ऊर्ध्वभागात्, तलात् अधोभागात् इत्यपि व्याख्या दृश्यते, ‘उपरितन’ इति तु अपपाठः, शिरसि=उपरिभागे, मुखदेशे इति भावः, तनुः=अल्पप्रसरः, मध्ये=मध्यप्रदेशे च, विपुलः=विशालः, अयः=समक्षं दृश्यमानः सन्धिः, असदृशजनस्य—अयोग्यपुरुषस्य, संप्रयोगात्=प्रवेशात्, भीरोः=भययुक्तस्य, महागृहस्य=विशालभवनस्य, स्फुटितम्=विदीर्णम्, हृदयम्=वक्षस्थलम्, इव, दृश्यते । अत्र प्रकृते अचेतने हर्म्ये विहितस्य सन्धेः विदीर्णवक्षस्थल त्वसम्भावनयोत्प्रेक्षालंकारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ २२ ॥
विमर्शः---उपरितलनिपातितेष्टकः—इसमें उपरि = ऊर्ध्व, तल = अधः यहाँ ऊपर तथा नीचे दोनों से ईंटों का निकालना बताया है । कुछ लोग ‘उपरितन’ यह पाठ मानते हैं परन्तु “सायं चिरं प्राह्णे प्रगेऽव्ययेभ्यः” ( पा. सू. ४।३।२३ ) में कालवाची उपरि शब्द से ही प्रत्यय एवं तुडागम का विधान है । अतः स्थानवाची होने पर यह अशुद्ध होगा । घट का मुख छोटा और मध्य भाग बड़ा तथा नीचे पुनः छोटा होता है उसी प्रकार यह सेन्ध है । सेंध का फँटना उसी प्रकार है जैसा किसी महान् व्यक्ति का हृदय विदीर्ण होना । यहाँ अचेतन भवन में फोड़ी गई सेन्ध में विदीर्णवक्षस्थलत्व की सम्भावना की जाने से उत्प्रेक्षा अलंकार है । पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ २२ ॥
अर्थ---क्या इस सेन्ध लगाने के काम में भी कुशलता ( आवश्यक होती है, या सीखी जाती है ) ?
विदूषक---हे मित्र ! यह सेन्ध दो ही के द्वारा फोड़ी जा सकती है या तो बाहर से आने वाले किसी के द्वारा अथवा सीखने वाले के द्वारा । अन्यथा इस उज्जैन नगरी में हम लोगों के घर के वैभव को कौन नहीं जानता है ।
| २१८ | मृच्छकटिकम् |
|---|
चारुदत्त :--
वैदेश्येन कृतो भवेन्मम गृहे व्यापारमभ्यस्यता
नासौ विदितवान् धनैर्विरहितं विस्रब्धसुप्तं जनम् ।
दृष्ट्वा प्राङ्महतीं निवाससंरचनामस्माकमाशन्वितः,
सन्धिच्छेदनखिन्न एव सुचिरं पश्चान्निराशो गतः ॥ २३ ॥
टीका :-- अस्मिन्नपि = सन्धिभेदनकार्येऽपि, कुशलता=पटुता, योग्यता, दत्त:=विदारितः, शिक्षितुकामेन=शिक्षाम्यासपरेण, तुमन्तस्य कामशब्देन समासे मकारलोपः, गृहविभवम्=गृहैश्वर्यम्, न जानाति-काकुरत्र, सर्वेऽपि जानन्तीत्यर्थः ॥
अन्वयः-- वैदेश्येन, ( अथवा ) व्यापारम्, अभ्यस्यता, मम, गृहे, ( सन्धिः ) कृतः, भवेत्, असौ, धनैः, विरहितम्, विश्रब्धसुप्तम्, जनम्, न, विदितवान्, प्राक्, महतीम्, निवाससंरचनाम्, दृष्ट्वा, आशान्वितः, सुचिरम्, सन्धिच्छेदनखिन्नः, पश्चात्, निराशः, एव, गतः ॥ २३ ॥
शब्दार्थः-- वैदेश्येन = विदेश में होनेवाले, बाहरी, अथवा व्यापारम् = सेंध लगाने की क्रिया का, अभ्यस्यता = अभ्यास करनेवाले ( किसी ने ), मम = मेरे ( चारुदत्त के ) गृहे=घर में, ( सन्धिः=सेन्ध ), कृतः=फोड़ी, भवेत्=होगी, असौ=वह, धनैः=धन से, विरहितम्=हीन, विश्रब्धसुप्तम्=निश्चिन्तता के साथ सोनेवाले, जनम्=हम लोगों को, न = नहीं, विदितवान्=जान पाया, प्राक् = पहले, महतीम्=विशाल, निवाससंरचनाम्=भवन की बनावट को, दृष्ट्वा=देखकर, आशान्वितः=आशा लगाये हुये, सुचिरम् = बहुत देर तक, सन्धिच्छेदनखिन्नः = सेंध फोड़ने से थका हुआ, पश्चात् = बाद में, निराशः = निराश होकर, एव = ही, गतः = चला गया होगा ॥ २३ ॥
अर्थ-- किसी बाहरी ने अथवा सेंध लगाने का अभ्यास करने वाले ने ही मेरे घर पर सेंध लगाई होगी। वह धन से हीन अतः निश्चिन्त होकर सोनेवाले हम लोगों को नहीं जानता रहा होगा। पहले विशाल भवन की आकृति को देख कर ( यहाँ प्रचुर धनादि मिलेगा - इस ) आशा लगाये हुये काफी देर तक सेंध फोड़ने के कार्य से थका हुआ, बाद में ( कुछ भी न प्राप्त कर सकने से ) निराश ही लौट गया होगा ॥ २३ ॥
टीका-- विदूषकस्योक्तिं समर्थयमान एवाह-वैदेश्येनेति । वैदेश्येन=विदेशे भवेन, अतो गृहवैभवमजानता इति भावः, 'अथवा' इत्यध्याहार्यम्, विदूषकोक्ति-समर्थनार्थमुक्तत्वादिति बोध्यम्, व्यापारम् = सन्धिच्छेदनरूपं कार्यम्, अभ्यस्यता=शिक्षमाणेन, जनेन, मम=चारुदत्तस्य, गृहे=भवने, सन्धिः, कृतः=विहितः, भवेत्-स्यात्; अत्र हेतुमाह -असौ = चौरः, धनैः = द्रव्यैः, विरहितम्=हीनम्, अत एव,
तृतीयाऽङ्कः २१६
ततः सुहृद्भ्यः किमसौ कथयिष्यति तपस्वी, 'सार्थवाहसुतस्य गृहं प्रविश्य न किञ्चिन्मया समासादितम्' इति ।
विदूषकः—भो ! कथं तं ज्जेव चोरहदअं अणुशोचसि । तेण चिन्तिदं महन्तं इदं गेहं, इदो रअणभण्डअं सुवण्णभण्डअं वा णिक्कामइस्सामि । (स्मृत्वा, सविषादमात्मगतम्) कहिं तं सुवण्णभण्डअं ? (पुनरनुस्मृत्य प्रकाशम्) भो वअस्स ! तुमं सव्वकालं भणासि 'मुक्खो मित्तेअओ, अपण्डिदो मित्तेअओ' त्ति । सुट्ठु मए किदं तं सुवण्णभण्डअं भवदो हत्थे समप्पअन्तेण । अण्णधा दासीए पुत्तेण अवहदं भवे । (भोः ! कथं तमेव चौरहतकमनुशोचसि । तेन चिन्तितम्—महदेतद्गेहम्, इतो रत्नभाण्डं सुवर्णभाण्डं वा निष्क्रामयिष्यामि । कुत्र तत् सुवर्णभाण्डम् ? भो वयस्य ! त्वं सर्वकालं भणसि —
विश्रब्धसुप्तम् = निःशङ्कनिद्रितम्, जनम् = पुरुषम्, माम् इति भावः, न = नैव, वेदितवान् = ज्ञातवान्, स्वार्थे णिचि बोध्यः, तत्रापि हेतुमाह — प्राक् = पूर्वम्, महतीम् = विशालाम्, निवाससंरचनाम् = भवनाकारम्, दृष्ट्वा = विलोक्य, आशान्वित = धनादिप्राप्त्याशया युक्तः, सुचिरम् = दीर्घकालपर्यन्तम्, सन्धिच्छेदनेन = सन्धिकर्तनेन, खिन्नः = परिश्रान्तः, पश्चात् = गृहप्रवेशानन्तरम्, निराशः = निष्फलप्रयासः, असफलमनोरथः, एव, गतः = प्रस्थितः, अत्र प्रथमपादं प्रति द्वितीयपादस्य हेतुतया निर्देशात् काव्यलिङ्गमलङ्कारः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।। २३ ।।
विमर्श—'वैदेश्येन' इसके बाद 'अथवा' का अध्याहार करना चाहिये । क्योंकि विदूषक के कथन—'द्वाभ्यामेव'—इत्यादि के साथ सामञ्जस्य बनाना है । वेदितवान्—यहाँ √विद् धातु से स्वार्थिक णिच् प्रत्यय करके क्त-प्रत्ययान्त रूप समझना चाहिये । महतीम्—चोर ने पहले यह देखा कि इतना विशाल भवन है तो इसी के अनुरूप सम्पत्ति भी होगी । अतः बहुत देर तक सेंध फोड़ने का परिश्रम करता रहा होगा । पश्चात् निराशः—किन्तु घर में आने पर उसे एक कौड़ी भी नहीं मिल सकी होगी । अतः निराश होकर चला गया होगा । यहाँ प्रथम पाद में जो कहा है उसी के समर्थन में हेतुरूपेण द्वितीय पाद है । अतः काव्यलिङ्ग अलंकार है । शार्दूलविक्रीडित छन्द है ।। २३ ।।
**अर्थ—**तब यह बेचारा अपने मित्रों से क्या कहेगा "सार्थवाहपुत्र के घर में घुस कर मैंने कुछ नहीं पाया ।"
**विदूषकः—**अरे ! क्यों उस नीच चोर के विषय में ही सोच रहे हो ? उसने सोचा यह विशाल घर है । इससे रत्नों का बक्स अथवा स्वर्ण का बक्स निकाल लूंगा । (सोच कर, विषाद के साथ—अपने आपमें) वह सोने के गहनों का डिब्बा
| २२० | मृच्छकटिकम् |
|---|
'मूर्खो मैत्रेयः अपण्डितो मैत्रेयः' इति । सुष्ठु मया कृतं तत् सुवर्णभाण्डं भवतो हस्ते समर्पयता । अन्यथा दास्याः पुत्रेण अपहृतं भवेत् । )
**चारुदत्तः—**अलं परिहासेन ।
**विदूषकः—**भो ! जह णाम अहं मुक्खो, ता किं परिहासस्स वि देशआलं ण जाणामि ? । ( भोः यथा नाम अहं मूर्खः तत् किं परिहासस्यापि देशकालं न जानामि ? )
**चारुदत्तः—**कस्यां वेलायाम् ? ।
**विदूषकः—**भो ! जदा तुमं मए भणिदोऽसि—सीदलो दे अग्गहत्थो । ( भोः यदा त्वं मया भणितोऽसि—शीतलस्ते अग्रहस्तः । )
**चारुदत्तः—**कदाचिदेवमपि स्यात् ? । ( सर्वतो निरूप्य सहर्षम् ) वयस्य ! दिष्ट्या ते प्रियं निवेदयामि ।
**विदूषकः—**किं ण अवहदं ? ( किं न अपहृतम् ? )
**चारुदत्तः—**हृतम् ।
**विदूषकः—**तथा वि किं पिअं ? । ( तथापि किं प्रियम् ? )
**चारुदत्तः—**यदसौ कृतार्थो गतः ।
**विदूषकः—**णासो क्खु सो । ( न्यासः खलु सः । )
कहाँ है ? ( फिर याद करके प्रकट रूप से ) हे मित्र ! तुम हर समय कहा करते हो—'मैत्रेय मूर्ख है, मैत्रेय अज्ञानी है।' सोने के गहनों के उस डिब्बे को आपके हाथ में देते हुये मैंने बहुत अच्छा किया। नहीं तो, दासी के बच्चे चोर ने उसे चुरा लिया होता ।
**चारुदत्त—**मित्र, परिहास मत करो ।
**विदूषक—**अरे ! यद्यपि मैं मूर्ख हूँ किन्तु क्या परिहास का समय और स्थान भी नहीं समझता हूँ ।
**चारुदत्त—**किस समय ?
**विदूषक—**मित्र ! जब मैंने कहा था कि तुम्हारी अंगुली ठण्डी है ।
**चारुदत्त—**सम्भव है ऐसा हुआ भी हो ( चारों ओर देखकर हर्षपूर्वक ) मित्र ! भाग्यवश मैं तुम्हें शुभ समाचार बताता हूँ ।
**विदूषक—**क्या नहीं चुराया ?
**चारुदत्त—**चुराया ।
**विदूषक—**तब क्या शुभ समाचार है ?
**चारुदत्त—**यही कि वह सफल होकर गया ।
**विदूषक—**अरे ! वह धरोहर थी ।
तृतीयोऽङ्कः २२१
चारुदत्तः— कथं न्यासः। ( मोहमुपगतः )
विदूषकः— समस्ससदु भवं। जइ णासो चोरेण अवहदो, तुमं किं मोहं उवगदो? । ( समाश्वसितु भवान् । यदि न्यासश्चोरेणापहृतः, त्वं किं मोहमुपगतः ? )
चारुदत्तः— ( समाश्वस्य ) वयस्य !
कः श्रद्धास्यति भूतार्थं सर्वो मां तुलयिष्यति । शङ्कनीया हि लोकेऽस्मिन् निष्प्रतापा दरिद्रता ॥ २४ ॥
चारुदत्त— क्या धरोहर थी ? ( मूर्छित हो जाता है । )
विदूषक— आप धैर्य धारण करें । यदि चोर ने धरोहर चुरा ली तो आप क्यों मूच्छित हो गये ?
टीका— तपस्वी = वराकः, सार्थवाहसुतस्य = चारुदत्तस्य, समासादितम् = प्राप्तम्, चौरहतकम् = चौरश्चासौ हतकश्च इति चौरहतकः = दुष्टचौरः, निष्क्रामयिष्यामि = अपहरिष्यामि, परिहासस्य = उपहासस्य, देशकालम् = स्थानसमयम्, दिष्ट्या = भाग्येन, न्यासः = निक्षेपः, वसन्तसेनाया इति शेषः, समाश्वसितु = समाश्वस्तो भवतु ।।
अन्वयः— कः, भूतार्थम्, श्रद्धास्यति, सर्वः, माम्, तुलयिष्यति, हि, अस्मिन्, लोके, निष्प्रतापा, दरिद्रता, शङ्कनीया, ( भवति ) ॥ २४ ॥
शब्दार्थ— कः=कौन, भूतार्थम्=बीती सच बात पर, श्रद्धास्यति=विश्वास करेगा, सर्वः=सभी कोई, माम्=मुझे, तुलयिष्यति=तौलेंगे, अर्थात सन्देह करेंगे, हि=क्योंकि, अस्मिन्=इस, लोके = ससार में, निष्प्रतापा = प्रतापहीन, दरिद्रता=गरीबी, शङ्कनीया=शङ्का करने योग्य, भवति=होती है ॥ २४ ॥
अर्थ—चारुदत्त—( धैर्य धारण करके ) मित्र !
कौन बीती हुई सच बात पर विश्वास करेगा ? सभी मुझ पर सन्देह करेंगे, क्योंकि इस संसार में प्रतापशून्य निर्धनता सन्देह करने योग्य होती है, अर्थात् दरिद्र पर सभी लोग शंका करने लग जाते हैं ॥ २४ ॥
टीका वसन्तसेनायाः न्यासापहारे कथं मोह इति विदूषकोक्तिमुत्तरयन्नाह— क इति । कः = जनः, भूतार्थम् = सञ्जातं यथार्थम्, 'चौरेणेव तत्सुवर्णभाण्डमपहृतं न त्वनेन'–इत्येवं रूपम्, श्रद्धास्यति = विश्वासिष्यति, **हि=**यतः, अस्मिन् लोके= संसारे, निष्प्रतापा = प्रतापहीना, दरिद्रता = निर्धनता, **शङ्कनीया=**शङ्कास्थानम्, भवतीति भावः । अत्र सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः अलंकारः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ २४ ॥
२२२ | मृच्छकटिकम्
भोः ! कष्टम् ।
यदि तावत् कृतान्तेन प्रणयोऽर्थेषु मे कृतः । किमिदानीं नृशंसेन चारित्रमपि दूषितम् ॥ २५ ॥
विमर्श--भूतः = सत्यः, वस्तुतो जातः, अर्थः = चौरापहरणरूपः, तम् । श्रद्धास्यति = सत्यत्वेन स्वीकरिष्यति, तुलयिष्यति--इसके स्थान पर तूलयिष्यति-यह भी पाठ है-तूलमिव लघूकरिष्यति-यह अर्थ है। तुलयिष्यति-सन्देह दूर करने के लिये तुला पर बैठाकर परीक्षा लेना शास्त्रसम्मत है, वही करेंगे। निष्प्रतापा-निर्गतः प्रतापः तेजः यस्यां सा-जिसमें से तेज समाप्त हो चुका है। यहाँ उत्तरार्द्ध के सामान्य कथन से पूर्वार्द्ध के विशेष कथन का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यास अलंकार है। और पथ्यावक्र छन्द है ॥ २४ ॥
अन्वयः-कृतान्तेन, यदि, तावत्, मम, अर्थेषु, प्रणयः, कृतः, नृशंसेन, इदानीम्, मम, चारित्रम्, अपि, किम्, दूषितम् ॥ २५ ॥
शब्दार्थ--कृतान्तेन = दुर्भाग्य ने, यदि तावत् = यदि अब तक, मे = मेरे, चारुदत्त के, अर्थेषु = धन पर, प्रणयः = अनुराग, कृतः = किया अर्थात् सारा धन ले लिया, तर्हि = तो, नृशंसेन = क्रूर उस भाग्य ने, इदानीम् = इस समय, चारित्रम् = चरित्र को, अपि = भी दूषितम् = दूषित कर डाला ॥ २५ ॥
अर्थ--हाय कष्ट है।
यदि दुर्भाग्य ने मेरा धन ले लिया (तो कोई बात नहीं) किन्तु इस समय चरित्र भी दूषित कर डाला ॥ २५ ॥
टीका--धनहानिर्मां न तथा पीडयति यथा लोकैः सम्भाव्यमानः मम चरित्रे दोष-इत्याह-यदीति। कृतान्तेन = दैवेन, यदि तावत् = यदि, तावत्-वाक्यालंकारे, मे = मम, चारुदत्तस्येत्यर्थः, अर्थेषु = धनेषु, प्रणयः = प्रीतिः, कृतः = विहितः, ग्रहणाय धनेषु अनुरागः प्रदर्शितः, नृशंसेन = क्रूरेण, इदानीम् = अधुना, मम = चारुदत्तस्य, चारित्रम् = सच्चरित्रता अपि, दूषितम् = निन्दनीयं कृतम्, चारुदत्तेन वसन्तसेनायाः न्यासः स्वयमपहृत्य चौर्यरूपेण प्रख्यापित इति निन्दापि समारोपितेति भावः, पथ्यावक्रं वृत्तम् ॥ २५ ॥
विमर्श--'कृतान्तो यमदैवयोः'--कोषानुसार यहाँ दैव = भाग्य अर्थ है। तावत् = उतना, अर्थात् धन से अनुराग करके हरण कर लेना तक तो ठीक था। परन्तु अब चरित्र का विघात सह्य नहीं है। सभी यह कहेंगे कि वसन्तसेना का धन स्वयं हड़प कर चोरी का बहाना कर रहा है। यहाँ पथ्यावक्र छन्द है ॥ २५ ॥
तृतीयोऽङ्कः २२३
विदूषकः—अहं खु अवलविस्सं, केण दिण्णं ? केण गहिदं ? को वा सक्खि ? त्ति । ( अहं खलु अपलपिष्यामि, केन दत्तम् ? केन गृहीतम् ? को वा साक्षी ? इति । )
चारुदत्तः—अहमिदानीमनृतमभिधास्ये ?
भैक्ष्येणाप्यर्जयिष्यामि पुनर्न्यासप्रतिक्रियाम् ।
अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंशकारणम् ॥ २६ ॥
रदनिका—ता जाव अज्जाधूदाए गदुअ णिवेदेमि । ( तद्यावत् आर्या-धूतायै गत्वा निवेदयामि । )
( इति निष्क्रान्ता । )
**अर्थ—विदूषक—**मैं झूठ बोल दूंगा—किसने दिया ? किसने लिया ? कौन गवाह है ?
**चारुदत्त—**क्या अब मैं झूठ ( भी ) बोलूँगा ?
**अन्वयः—**भैक्ष्येण, अपि, न्यासप्रतिक्रियाम्, पुनः, अर्जयिष्यामि, चारित्रभ्रंशकारकम्, अनृतम्, न, अभिधास्यामि ॥ २६ ॥
**शब्दार्थ—**भैक्ष्येण=भीख से, अपि=भी, न्यासप्रतिक्रियाम्=धरोहर के बदले का धन, पुनः=फिर, अर्जयिष्यामि=पैदा करूँगा, किन्तु, चारित्रभ्रंशकारकम्=चरित्र को विकृत करने वाले, अनृतम् = असत्य को, न = नहीं, अभिधास्यामि=बोलूँगा ॥ २६ ॥
अर्थ—( मैं ) भीख से ( अर्थात् भीख माँग कर ) भी धरोहर के बदले का धन पुनः पैदा करूँगा परन्तु चरित्र को विकृत कर देने वाले असत्य को नहीं बोलूँगा ॥ २६ ॥
**टीका—**ममानृतभाषणमसम्भवमित्यत आह—भैक्ष्येणेति । भैक्ष्येण=भिक्षया, अपि, अपिना अन्येन केनापि समुचितेनोपायेन न्यासप्रतिक्रियाम्=मत्सविधे रक्षितधनस्य शोधनोपायम्, पुनः, अर्जयिष्यामि=आहरिष्यामि, किन्तु, चारित्रभ्रंशकारणम्=सदाचरणच्युतिकारकम्, अनृतम्=असत्यम्, न=नैव, अभिधास्यामि=वदिष्यामि । एवञ्चानृतभाषणापेक्षया भिक्षाटनं वरमिति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २६ ॥
**विमर्श—**भैक्ष्येण—यहाँ चारुदत्त की सच्चारित्रता का अच्छा वर्णन है । वह अपने सदाचार के विषय में लोकप्रवाद और असत्यभाषण से कितना अधिक भयभीत है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है । पथ्यांवक्र छन्द है ॥ २६ ॥
**अर्थ—रदनिका—**तो तब तक आर्याधूता से सारी घटना कहती हूँ ।
( यह कह कर निकल जाती है । )