मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २०८ | मृच्छकटिकम् |
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( समन्तादवलोक्य । ) अये ! कथं मृदङ्गः, अयं दर्दुरः, अयं पणवः, इयमपि वीणा, एते वंशाः, अमी पुस्तकाः । कथं नाट्याचार्यस्य गृहमिदम् । अथवा, भवनप्रत्ययात् प्रविष्टोऽस्मि । तत् किं परमार्थदरिद्रोऽयम् ? उत राजभयाच्चोरभयाद्वा भूमिष्ठं द्रव्यं धारयति ? । तन्ममापि नाम शर्विलकस्य भूमिष्ठं द्रव्यम् ? । भवतु, बीजं प्रक्षिपामि । (तथा कृत्वा ।) निक्षिप्तं बीजं न क्वचित् स्फारीभवति । अये ! परमार्थदरिद्रोऽयम् । भवतु, गच्छामि ।
विदूषकः---( उत्स्वप्नायते । ). भो वअस्स ! सन्धी विअ दिस्सदि, चोरं विअ पक्खामि; ता गेण्हदु भवं एदं सुवण्णभण्डअं । ( भो वयस्य ! सन्धिरिव दृश्यते, चौरमिव पश्यामि, तद् गृह्णातु भवानिदं सुवर्णभाण्डम् । )
प्राणवायुः, शक्तिः=शङ्काग्रस्तः, न=नैव, अपि तु, सुविशदः=सुस्पष्टः, तुल्यान्तरम्=तुल्यम्=समानम् अन्तरं यथा स्यात् तथा, वर्तते=विद्यते, दृष्टिः=नेत्रम्, गाढनिमीलिता=सुदृढरूपेण मुद्रिता, विकला=व्याकुला, न=नैव, आभ्यन्तरे=नेत्राभ्यन्तरे, चञ्चला=चपला, न = नैव, वर्तते, तेन नेयं कपटनिद्राग्रस्ततेति भावः । गात्रम्=शरीरम्, स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलम्=शिथिलावयवतया पतितम् तथा, शय्याप्रमाणाधिकम्=पर्यङ्कस्य प्रमाणादधिकम्=अतिरिक्तम्, वर्तते; यदि=चेत्, लक्ष्यसुप्तम्=कपटनिद्रितम्, स्यात्=भवेत्, तदा, अभिमुखम्=समक्षम्, दीपम्=प्रज्वलितदीपकम्, च, न=नैव, मर्षयेत्=सहेत । स्वभावोक्तिरलङ्कारः शार्दूलविक्रीडितं च वृत्तम् ॥१८॥
विमर्श---इस में सोते हुये व्यक्ति की स्वाभाविक स्थिति का अतीव सुन्दर वर्णन होने से स्वभावोक्ति अलङ्कार है । शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ १८ ॥
अर्थ---( चारो ओर देख कर ) अरे ! क्या मृदङ्ग है ? यह दर्दुर ( एक वाद्य-विशेष ), यह पणव, यह वीणा भी है, ये बांसुरियां हैं, ये पुस्तकें हैं । तो क्या किसी नाच गाना सिखाने वाले का घर है ? अथवा ( विशाल ) भवन का विश्वास करके घुसा हूँ । तो क्या यह वास्तव में दरिद्र है । अथवा राजा के भय से या चोर के भय से धन को जमीन में गाड़ कर रखा है । तो क्या मुझ शर्विलक के लिये भी जमीन में गाड़ा हुआ धन ( अप्राप्य ) है ? अच्छा, तो बीज फेंकता हूँ । ( बीज फेंक कर ) फेंका हुआ बीज कहीं नहीं फैल रहा है । अरे ! यह तो वास्तव में दरिद्र है । अच्छा तो यहाँ से चलता हूँ ।
विदूषकः---( स्वप्न में बड़बड़ाता है ) अरे मित्र ! सेंध जैसी दिखाई दे रही हैं । चोर जैसा देख रहा हूँ । तो इस स्वर्णभाण्ड ( गहनों के डिब्बे ) को आप ले लें ।
टीका---मृदङ्गः=वाद्ययन्त्रविशेषः । एतल्लक्षणन्तु---
चर्मणा नद्धवदनो मध्ये चैव पृथुर्भवेत् । मृत्तिकानिर्मितश्चैव मृदङ्गः परिकीर्तितः ॥