भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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तृतीयोऽङ्कः२०७

शब्दमुत्पादयेत् । ( पृष्ठेन प्रतीक्ष्य कपाटमुद्घाट्य । ) भवतु, एवं तावदिदानीं परीक्षे किं लक्ष्यसुप्तम् उत परमार्थसुप्तमिदं द्वयम् ? ( त्रासयित्वा परीक्ष्य च ) अये ! परमार्थसुप्तेनानेन भवितव्यम् । तथाहि—

निःश्वासोऽस्य न शङ्कितः सुविशदः तुल्यान्तरं वर्त्तते
दृष्टिर्गाढनिमीलिता न विकला नाभ्यन्तरे चञ्चला ।
गात्रं स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलं शय्याप्रमाणाधिकं
दीपञ्चापि न मर्षयेदभिमुखं स्याल्लक्ष्यसुप्तं यदि ॥ १८ ॥

करे। तो ऐसा करूँ। ( पीठ से सहारे से किवाड़ को हटाकर अथवा पीछे देखकर और खोलकर ) अच्छा, अब इस प्रकार से परीक्षा लेता हूँ कि ये दोनों क्या छल से सोये हुये हैं अथवा वास्तव में सोये हुये हैं ? ( डराकर और परीक्षा करके ) अरे ये दोनों वास्तव में सोये हुये हैं, जैसा कि—

अन्वयः— अस्य, निःश्वासः, शङ्कितः, न, ( अपि तु ) सुविशदः, तुल्यान्तरम्, वर्तते, दृष्टिः, गाढनिमीलिता, ( अस्ति ), विकला, न, अभ्यन्तरे, चञ्चला, न, वर्तते, गात्रम्, स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलम्, शय्याप्रमाणाधिकम्, च, ( वर्तते, ) यदि, लक्ष्यसुप्तम्, स्यात्, तदा, अभिमुखम्, दीपम्, च, अपि, न, मर्षयेत् ॥ १८ ॥

शब्दार्थ— अस्य = सोये हुये पुरुषद्वय का, निःश्वासः = सांस लेना, शङ्कितः = शङ्कायुक्त, न = नहीं ( अर्थात् स्वाभाविक गति से चलने वाला है ) सुविशदः = साफ साफ, तुल्यान्तरम् = समान अन्तर वाली, वर्तते = है, दृष्टिः = आँखें, गाढनिमीलिता = अच्छी प्रकार से बन्द है, न विकला = व्याकुल नहीं है, और, न चञ्चला = न तो चञ्चल = फड़कने वाली ही है, गात्रम् = शरीर, स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलम् = शरीर की सन्धियों = जोड़ों के ढीले होने से शिथिल, शय्याप्रमाणाधिकम् = पलंग की लम्बाई चौड़ाई से अधिक है, यदि लक्ष्यसुप्तम् = यदि बहाने से सोया हुआ होता, तदा = तब तो, अभिमुखम् = सामने जलते हुये, दीपम् = दीपक को, अपि = भी, न = नहीं, मर्षयेत् = सहन कर पाता ॥ १८ ॥

अर्थ— दोनों व्यक्तियों का सांस लेना शंकायुक्त नहीं है, साफ साफ है और उनमें समान अन्तर है। आँख अच्छी प्रकार बन्द है, न तो व्याकुल है और न भीतर चञ्चल है। शरीर के जोड़ों ( सन्धियों ) के ढीले हो जाने से शिथिल और पलंग के परिमाण की अपेक्षा अधिक अर्थात् पलंग से बाहर शरीर है। और यदि बहाने से सोये हुये होते तो सामने जलते हुये दीपक को भी सहन नहीं कर पाते। ( अतः वास्तव में ही सोये हैं ।) ॥ १८ ॥

टीका— पुरुषद्वयस्य परमार्थसुप्ततां साधयितुं परमार्थसुप्तिलक्षणानि वर्णयति—निःश्वास इति । अस्य = पुरुषद्वयस्य, निःश्वासः = नासिकारन्ध्रविनिर्गतः