मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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मृच्छकटिकम्
(पुनः कर्म कृत्वा) समाप्तोऽयं सन्धिः। भवतु; प्रविशामि। अथवा न तावत् प्रविशामि, प्रतिपुरुषं निवेशयामि। (तथा कृत्वा।) अये! न कश्चित्। नमः कार्त्तिकेयाय। (प्रविश्य दृष्ट्वा च) अरे! पुरुषद्वयं सुप्तम्। भवतु, आत्मरक्षार्थं द्वारमुद्घाटयामि। कथं जीर्णत्वाद् गृहस्य विरौति कपाटम्। तद् यावत् सलिलमन्वेषयामि। क्व नु खलु सलिलं भविष्यति? (इतस्ततो दृष्ट्वा सलिलं गृहीत्वा क्षिपन् सशङ्कम् ) मा तावत् भूमौ पतत्
शब्दार्थ—सुवर्णपिञ्जरा=सोने के समान पिङ्गल वर्ण वाली, सन्धिमुखेन=सेंध के रास्ते से, छिद्र से, महीतले=भूतल पर, निर्गता=निकली हुई, पर्यन्ततमस्समावृता=चारो ओर अन्धकार से घिरी हुई, प्रदीपस्य=दीपक की, शिखा=कान्ति, रोशनी, कषे=कसौटी पर, निवेशिता=खींची गई, कसी गई, सुवर्णस्य=सोने की, रेखा=लकीर के, इव=समान, विभाति=शोभित हो रही है ॥ १७ ॥
अर्थ—सोने के समान पिङ्गलवर्णवाली, सेंध के रास्ते से पृथ्वी पर निकलने वाली, चारो ओर अन्धकार से घिरी हुई, दीपक की कान्ति=रोशनी, कसौटी पर खींची गई सोने की रेखा के समान शोभित हो रही है ॥ १७ ॥
टीका—सन्धिमार्गविनिर्गतं दीपप्रभासौन्दर्यं वर्णयन्नाह—शिखेति। सुवर्णपिञ्जरा=स्वर्णवत् पिङ्गलवर्णा, सन्धिमुखेन=सन्धिविवरेण, महीतले=भूतले, बाह्यप्रदेशे इत्यर्थः, निर्गता=निःसृता, पर्यन्ततमःसमावृता=पर्यन्तेषु=प्रान्तप्रदेशेषु चतुष्पाश्र्वेषु, परिवेष्टिता, प्रदीपस्य=दीपकस्य, शिखा=कान्तिः, प्रकाश इति भावः, कषे=परीक्षणपाषाणे, निवेशिता=कषिता, अर्पिता, सुवर्णस्य=कनकस्य, रेखा=लेखा, इव=यथा, विभाति=शोभते, उपमालंकारः, वंशस्थं वृत्तम् ॥ १७ ॥
विमर्श—सन्धिमुखेन निर्गता—भीतर जलने वाले दीपक की जो रोशनी सेंध के माध्यम से बाहर पृथ्वी पर पतली रेखा के समान दिखाई दे रही है उस की वैसी ही शोभा है जैसी कसौटी पर खींची गई सोने की रेखा की। इस प्रकार शिखा और रेखा का साम्य होने से उपमा अलंकार है। पिञ्जरा—पीला लाल मिश्रित रंग। वंशस्थ छन्द है ॥ १७ ॥
अर्थ—(फिर सेंध फोड़कर) अब सेंध बन चुकी है। अच्छा, अब प्रवेश करता हूँ। अथवा पहले स्वयं प्रवेश नहीं करता हूँ, नकली पुरुष को प्रवेश कराता हूँ। (वैसा करके) अरे! कोई नहीं है। कार्त्तिकेय को नमस्कार है। (प्रवेश करके और देखकर) अरे, दो लोग सो रहे हैं। अच्छा अपनी रक्षा के लिये दरवाजा खोलता हूँ। क्यों, घर पुराना होने के कारण किवाड़ा आवाज कर रहा है। तो तब तक पानी खोजता हूँ। (इधर उधर देखकर पानी लेकर गिराता हुआ शङ्कित होते हुये) जमीन पर गिरता हुआ (यह पानी) आवाज पैदा न