भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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तृतीयोऽङ्कः २०१

उद्घाटको भवति यन्त्रदृढे कपाटे दष्टस्य कीटभुजगैः परिवेष्टनञ्च ॥ १६ ॥

मापयित्वा कर्म्म समारभे । ( तथा कृत्वा अवलोक्य च ) एकलोष्ठावशे- षोऽयं सन्धिः । धिक् कष्टम् । अहिना दष्टोऽस्मि । (यज्ञोपवीतेनाङ्गुलीं बद्ध्वा विषवेगं नाटयति । चिकित्सां कृत्वा ) स्वस्थोऽस्मि । ( पुनः कर्म्म कृत्वा दृष्ट्वा च ) अये ! ज्वलति प्रदीपः । तथाहि--

शिखा प्रदीपस्य सुवर्णपिञ्जरा महीतले सन्धिमुखेन निर्गता । विभाति पर्यन्ततमःसमावृता सुवर्णरेखेव कषे निवेशिता ॥ १७ ॥


गहनों के जोड़ों को इससे खोलता है, सांकड़ या किल्ली आदि से बन्द किये गये दरवाजे का खोलना इससे होता है और कीड़ा तथा साँप से काटे गये व्यक्ति का ( विषप्रवाह रोकने के लिये ) लपेटना होता है ।। १६ ।।

टीका--चौरब्राह्मणस्य यज्ञोपवीतादुपकारे वैशिष्ट्यं दर्शयति-एतेनेति । अस्मद्विधः चौरः, भित्तिषु=कुड्येषु, एतेन=यज्ञोपवीतसूत्रेण, कर्ममार्गम्=चौर्य- कार्यपथम्, सन्धिमिति यावत्, मापयति = दीर्घत्वविस्तारयोः परिमितं करोति, एतेन=यज्ञोपवीतसूत्रेणैव, भूषणसम्प्रयोगान्=अलङ्काराणां दृढबन्धनानि, मोचयति= निःसारणाय शिथिलीकरोति, यन्त्रदृढे=अर्गलादिना सम्यग् दृढीकृते तेन अङ्गुष्ठादि- प्रवेशायोग्ये, कपाटे=द्वारावरके काष्ठखण्डे, उद्घाटनम्=उन्मोचनम्, भवति, कीट- भुजगैः=वृश्चिकादिभिः कीटैः सर्पश्च, दष्टस्य=सञ्जातदशनस्य, पुरुषस्य, परि- वेष्टनम्=परितः बन्धनम्, च, भवति, अत्र समुच्चयः तुल्ययोगिता चालङ्कारौ । वसन्ततिलकं वृत्तम् ।। १६ ।।

विमर्श--यहाँ यज्ञोपवीत के उत्कर्ष के प्रति बहुत कारणों का निर्देश होने से समुच्चय अलंकार है । तथा 'भवति' इसमें उद्घाटन तथा परिवेष्टन के अन्वय से तुल्ययोगिता अलंकार भी हैं । वसन्ततिलका छन्द है ।। १६ ।।

अर्थ--नाप कर सेन्ध लगाना प्रारम्भ करता हूँ । ( सेंध लगाकर और देखकर ) अब इस सेंध का एक ही ईंटा निकालना बाकी बचा है । हाय कष्ट है ! साँप ने काट लिया । ( जनेऊ से अंगुली को बांध कर विष के वेग=बढ़ने का अभिनय करता है, चिकित्सा करके ) अब स्वस्थ=ठीक हो गया हूँ । ( फिर सेंध कार्य करके और देख कर ) अरे दीपक जल रहा । जैसा कि--

अन्वयः--सुवर्णपिञ्जरा, सन्धिमुखेन, महीतले, निर्गता, पर्यन्ततमःसमावृता, प्रदीपस्य, शिखा, कषे, निवेशिता, सुवर्णस्य, रेखा, इव विभाति ॥ १७ ॥