मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० मृच्छकटिकम्
शर्विलकः—अनतिक्रमणीया भगवती गोकाम्या ब्राह्मणकाम्या च । तद् गृह्णामि । अथवा, ज्वलति प्रदीपः । अस्ति च मया प्रदीपनिवार्पणार्थमाग्नेयः कीटो धार्यते । तं तावत् प्रवेशयामि, तस्यायं देशकालः । एष मुक्तो मया कीटो यात्वेव अस्य दीपस्य उपरि मण्डलैविविचत्रैर्विचरितुम् । एष पक्षद्वयानिलैन निर्वापितो भद्रपीठेने । धिक् कृतमन्धकारम् । अथवा, मयापि अस्मद्ब्राह्मणकुले न धिक् कृतमन्धकारम् ? अहं हि चतुर्वेदविदोऽप्रतिग्राह-कस्य पुत्रः शर्विलको नाम ब्राह्मणो गणिकामदनिकार्यमकार्यमनुतिष्ठामि । इदानीं करोमि ब्राह्मणस्य प्रणयम् । ( इति जिघृक्षति । )
विदूषकः—भो वअस्स ! सीदलो दे अग्गहत्थो । ( भो वयस्य ! शीतलस्ते अग्रहस्तः । )
शर्विलकः—धिक् प्रमादः । सलिलसम्पर्कात् शीतलो मे अग्रहस्तः । भवतु, कक्षयोर्हस्तं प्रक्षिपामि । ( नाट्येन सव्यहस्तमुष्णीकृत्य गृह्णाति । )
विदूषकः—गहिदं ? । ( गृहीतम् ? )
गोब्राह्मणानामभिलाषाऽपूरणे यत् पातकं स्यात् तादृशमेवेदानीं मम हस्तात् सुवर्ण-भाण्डग्रहणे सति भविष्येति भावः ।
**अर्थ—शर्विलक—**भगवती गाय की अभिलाषा और ब्राह्मण की अभिलाषा अनुल्लङ्घनीय होती है । अतः ( सुवर्णभाण्ड ) ले लेता हूँ । किन्तु दीपक जल रहा है । दीप बुझाने के लिये मेरे पास आग्नेय कीड़ा है । तो इसे भेजता हूँ । इसे छांड़ने के लिये यही उचित स्थान और समय है । मेरे द्वारा छोड़ा गया यह कीड़ा इस दीपक के ऊपर विचित्र रूप से मंडराने के लिये उड़े । इस भद्रपीठ ( कीड़े ) ने अपने दोनों पंखों की हवा से ( यह दीपक ) बुझा दिया है । धिक्कार है, अन्धकार हो गया । अथवा मुझ ब्राह्मण ने भी क्या अपने ब्राह्मणकुल में अँधेरा नहीं कर डाला ? ( अर्थात् अवश्य कर डाला । ) मैं चारों वेद जानने वाले, दान न लेने वाले का पुत्र शर्विलक नामक ब्राह्मण वेश्या मदनिका के लिये यह अनुचित कार्य करता हूँ । अब ब्राह्मण का प्रणय ( पूरा ) करता हूँ, ( स्वर्णभाण्ड ले लेता हूँ । ) ( ऐसा कह कर ले लेना चाहता है । )
**विदूषक—**मित्र ! तुम्हारी अँगुलियाँ ठण्डी हैं ।
**शर्विलक—**ओह ! प्रमाद ( हो गया ), पानी छूने के कारण हाथ ठण्डा पड़ गया है । अच्छा, कांख में दोनों हाथ रखता हूँ । ( अभिनय के साथ दाहिना हाथ गरम करके ले लेता है । )
**विदूषक—**ले लिया ?