मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २१४ | मृच्छकटिकम् |
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अपि च—
भुजग इव गतौ, गिरिः स्थिरत्वे, पतगपतेः परिसर्पणे च तुल्यः । शश इव भुवनावलोकनेऽहं वृक इव च ग्रहणे बले च सिंहः ॥ २१ ॥
इसमें एक शर्विलक में ही तादात्म्य से मार्जार आदि का आरोप होने से मालारूपक अलङ्कार समझना चाहिये । एक शर्विलक का ही मार्जार आदि अनेक रूपों में उल्लेख होने से उल्लेख अलंकार की शंका की जा सकती है । परन्तु यहाँ शर्विलक में मार्जारत्व आदि वास्तविकरूप में नहीं है । अतः उल्लेख मानना सम्भव नहीं है । शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ २० ॥
अन्वयः— अहम्, गतौ, भुजगः, इव, स्थिरत्वे, गिरिः, परिसर्पणे, पतगपतेः, तुल्यः, भुवनावलोकने, शशः, इव, ग्रहणे, वृकः, इव, बले, च, सिंहः, अस्मि ॥ २१ ॥
शब्दार्थ— अहम् = मैं शर्विलक, गतौ = टेढ़ी मेढ़ी चाल में, भुजगः = साँप, इव = के समान, स्थिरत्वे = अचल रहने में, गिरिः = पहाड़, परिसर्पणे = शीघ्र चलने में, पतगपतेः = पक्षिराजगरुड के, तुल्यः = समान, भुवनावलोकने = एक समय में ही सारे संसार को देख लेने में, शशः = खरगोश, ग्रहणे = झपटकर पकड़ने में, वृकः = भेड़िया, च = और, बले = शक्ति, में, सिंहः = शेर, अस्मि = हूँ ॥ २१ ॥
अर्थ— मैं (शर्विलक) वक्र चलने में साँप के समान, अडिग रहने में पर्वत, शीघ्र चलने में पक्षिराज गरुड के समान, एक साथ सारे संसार को देख लेने में खरगोश के समान, (झपटकर) पकड़ने में भेड़िया के समान और बल में सिंह हूँ ॥ २१ ॥
टीका— पूर्वोक्तमेव स्वसामर्थ्यं पुनः वर्णयति—भुजग इति । अहम् = शर्विलकः गतौ = वक्रादिगमने, भुजगः = सर्पः, इव = यथा; स्थिरत्वे = अचलत्वे, गिरिः = पर्वतः, इव, परिसर्पणे = शीघ्रगमने, पतगपतेः = पक्षिराजगरुडस्य, तुल्यः = समानः, भुवनावलोकने = जगतः दर्शने, चतुर्दिक्दर्शने इति भावः, शशः = शशक इव, ग्रहणे = आक्रम्य लक्ष्यग्रहणे, वृकः = ईहामृगः, इव, बले = सत्त्वे, च, सिंह = मृगेन्द्रः इव, अस्मि = वर्ते । अत्र उपमेयभूतस्य एकस्य शर्विलकस्य विषयविशेषेषु भुजग-गिरिपतगपत्यादिभिः बहुभिरुपमानैः साम्यकथनात् मालोपमालङ्कारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ २१ ॥
विमर्श— पूर्वोक्त श्लोक के समान ही इसमें भी शर्विलक अपनी विशेषता बताता है । यहाँ उपमेय एक शर्विलक का भुजग, गिरि, पतगपति आदि बहुत से उपमानों के साथ साम्य कहने के कारण मालोपमा अलंकार है । कुछ ने उल्लेख अलकार माना है । पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ २१ ॥