भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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तृतीयोऽङ्कः २१३


की शक्ति की जानकारी करने में, श्वा=कुत्ता; सर्पणे=सरकने में, पन्नगः=सांप; रूप-शरीर-वेशरचने=आकार, शरीर और वेशभूषा इनको बदलने में, माया=इन्द्रजाल; देशभाषान्तरे=विभिन्न स्थानों की भाषा बोलने में, वाक्=सरस्वती; रात्रिषु=रातों में, दीपः=दीपक; सङ्कटेषु=सङ्कट के समय में, डुडुभः=भेड़िया; स्थले=पृथ्वी पर, वाजी=घोड़ा; और, जले=पानी में, नौः=नाव हूँ ॥ २० ॥

**अर्थ—**जो मैं—उछलने में बिलाव, शीघ्र दौड़ने में हिरन, झपटकर पकड़ने और छीनने में बाज, सोते हुये और जागते हुये दोनों प्रकार के पुरुषों की शक्ति का पता लगाने में कुत्ता, सरकने में साँप, विभिन्न प्रकार के आकार, शरीर और वेशभूषा बनाने में इन्द्रजाल-विद्या, भिन्न-भिन्न स्थानों की भाषा बोलने में सरस्वती, रातों में दीपक, सङ्कटों में भेड़िया, जमीन पर घोड़ा और पानी में नौका हूँ ॥ २० ॥

**टीका—**सर्वत्र सर्वदा असीमप्रभावशालित्वमुपपादयितुं स्वशक्तिं वर्णयन्नाह—मार्जार इति। अत्र सर्वत्र वाक्येषु गद्यस्थेन 'योऽहम्' इत्यनेनान्वयः कार्यः। **क्रमणे=**उत्प्लवने आक्रमणे वा, **मार्जारः=**विडालः; **प्रसरणे=**त्वरितधावने, **मृगः=**हरिण; **ग्रहालुञ्चने=ग्रहः=**ग्रहणम्, **आलुञ्चनम्=**आच्छिद्य हरणञ्च इति ग्रहालुञ्चनम् तस्मिन्, **श्येनः=**दूरात् आगत्य लक्ष्यग्राही तदाख्यपक्षिविशेषः; **सुप्तासुप्तमनुष्य-वीर्यतुलने=**सुप्तस्य निद्रितस्य, असुप्तस्य=जागरितस्य च मानवस्य यत् **वीर्यम्=**शक्तिः, **तत्तुलने=**परिज्ञाने, **श्वा=**कुक्कुरः; **सर्पणे=**द्रुतवक्रगमने, **पन्नगः=**सर्पः, **रूपस्य=**सितकृष्णादिवर्णस्य, **शरीरस्य=**देहस्य, **वेशस्य=**परिच्छदस्य च सम्पादने, **माया=**चातुर्यमयी विद्या, इन्द्रजालमिति यावत्; **देशभाषान्तरे=**देशभाषाविशेषे, नानादेशीयभाषाकथने इत्यर्थः **वाक्=**सरस्वती; **रात्रिषु=**निशासु, **दीपः=**प्रदीपः, सङ्कटेषु = विपत्तिषु, दुर्गमस्थलेषु वा, **डुडुभः=**तदाख्यपशुविशेषः, (अश्वतरः इति केचित्, वृक इत्यपरे); **स्थले=**भूमौ, **वाजी=**अश्वः; **जले=**नद्यादौ, **नौ =**तरणिः अस्मि इति भावः। अत्र एकस्मिन् शर्विलके तादात्म्येन मार्जाराद्यारोपात् मालारूपकमलंकारः, शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ २० ॥

**विमर्श—**शर्विलक ने अपने अनुपम गुणों एवं शक्ति का वर्णन किया है। जहाँ जैसा बन जाने पर काम हो सकता है वहाँ वैसा बन कर काम चलाना उसके लिये अतिसरल है। **ग्रहालुञ्चने... ग्रहे=**ग्रहणे अर्थात् दूर से आकर झपट कर पकड़ने और **आलुञ्चने=**छीन कर लेने में, बाज पक्षी, सङ्कटेषु डुडुभः—संकट का अर्थ विपत्ति तथा दुर्गम स्थल हैं। दुर्गम स्थल अर्थ अधिक अच्छा है। वृक खच्चर और भेड़िया को कहा जाता है। दोनों को तात्पर्यानुसार समझना चाहिये।

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