मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ || मृच्छकटिकम्
तद्यावत् मदनिकाया निष्क्रयणार्थं वसन्तसेनागृहं गच्छामि । ( परिक्रम्य अवलोक्य च ) अये ! पदशब्द इव । मा नाम रक्षिणः । भवतु, स्तम्भीभूत्वा तिष्ठामि । अथवा ममापि नाम शर्विलकस्य रक्षिणः ? योऽहम्—
मार्जारः क्रमणे, मृगः प्रसरणे, श्येनो ग्रहालुञ्चने सुप्तासुप्तमनुष्यवीर्यतुलने श्वा, सर्पणे पन्नगः । माया रूप-शरीर-वेश-रचने, वाग् देशभाषान्तरे, दीपो रात्रिषु, सङ्कटेषु डुडुभो, वाजी स्थले, नौर्जले ॥ २० ॥
पौरुषम्--इति पाठे अगणितपौरुषम्, दारिद्र्यम् = निर्धनत्वम्, खलु = निश्चयेन, धिक्=धिक्कृतम्, अस्तु = भवतु, यत्=यस्मात् ( अहं दरिद्रः ) एतत्=क्रियमाणं परधनापहरणस्वरूपम्, कर्म=चौर्यम्, निन्दामि = अपवदामि, करोमि च=सम्पादयामि च । अत्र काव्यलिङ्गं दीपकञ्च अलङ्कारः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ १९ ॥
विमर्श—अनिवेदितपौरुषम्=इसके स्थान पर 'अनिर्वेदितपौरुषम्' यह भी पाठ मिलता है । 'प्रकरणनिश्चययोः निर्वेदः--इसके अनुसार अनिश्चितम्=अगणितम् पौरुषम् यत्र तादृशम् --अर्थात् जहाँ पौरुष की गणना ही नहीं हो पाती है । मूलपाठ के अनुसार जहाँ पौरुष का कथन ही नहीं हो पाता है । दोनों का तात्पर्य एक है । यहाँ उत्तरार्ध के हेतुरूपेण उपन्यस्त होने से काव्यलिङ्ग और एक कर्ता का दो क्रियाओं में सम्बन्ध होने से दीपक अलंकार है । पथ्यावक्त्र छन्द है ।। १६ ।।
अर्थ—तो अब मदनिका को ( दासीत्व से ) मुक्त कराने के लिये वसन्तसेना के घर चलता हूँ ।
( घूम कर और देख कर )
अरे, पैर की आवाज सी ( सुनाई दे रही है । ) कहीं पहरेदार न आ जायें । अच्छा, कुछ देर खम्भा के समान चुपचाप खड़ा होता हूँ । अथवा मुझ शर्विलक के लिये भी पहरेदार ( भय की चीज हैं ) ?
अन्वयः—यः, अहम्--इति गद्यस्थेनान्वयः, क्रमणे, मार्जारः; प्रसरणे, मृगः; ग्रहालुञ्चने, श्येनः; सुप्तासुप्तमनुष्यवीर्यतुलने, श्वा; सर्पणे, पन्नगः; रूप-शरीरवेश-रचने, माया; देशभाषान्तरे, वाक्; रात्रिषु, दीपः; सङ्कटेषु, डुडुभः; स्थले, वाजी; जले, नौः ( अस्मि ) ॥ २० ॥
शब्दार्थ—( यः अहम्=जो मैं ), क्रमणे = उछलने में, मार्जारः = बिलाव; प्रसरणे=शीघ्र भागने में, मृगः=हिरन; ग्रहालुञ्चने=पकड़ने और झपटने में, श्येनः=बाज; सुप्तासुप्तमनुष्यवीर्यतुलने=सोये हुये अथवा न सोये ( =जागते हुये ) मनुष्य