मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः २१५
( प्रविश्य । )
रदनिका—हद्धी ! हद्धी ! बाहिर-दुआर-सालाए पसुत्तो वड्ढमाणओ, सोवि एत्थ ण दीसइ । भोदु, अज्जमित्तेअं सद्द्दावेमि । ( हा धिक् हा धिक् ! बहिर्द्वारशालायां प्रसुप्तो बर्द्धमानकः, सोऽप्यत्र न दृश्यते । भवतु, आर्यमैत्रेयं शब्दापयामि । )
शर्विलकः—( रदनिकां हन्तुमिच्छति । निरूप्य ) कथं स्त्री ! भवतु, गच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । )
रदनिका—( गत्वा सत्रासम् ) हद्धी ! हद्धी ! अम्हाणं गेहे सन्धि कप्पिअ चोरो णिक्कमदि । भोदु, मित्तेअं गदुअ पबोधेमि । ( विदूषकमुपगम्य ) अज्जमित्तेअ ! उट्ठेहि उट्ठेहि; अम्हाणं गेहे सन्धिं कपिअ चोरो णिक्कन्तो । ( हा धिक् हा धिक् ! अस्माकं गेहे सन्धि कल्पयित्वा चोरो निष्क्रामति । भवतु, मैत्रेयं गत्वा प्रबोधयामि । आर्यमैत्रेय ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ, अस्माकं गेहे सन्धि कल्पयित्वा चौरो निष्क्रान्तः । )
विदूषकः—( उत्थाय ) आः दासीए धीए ! किं भणासि 'चोरं कप्पिअ सन्धी णिक्कन्तो ?' । ( आः दास्याः पुत्रि ! किं भणसि 'चोरं कल्पयित्वा सन्धिनिष्क्रान्तः ?' )
रदनिका—हदास ! अलं परिहासेण । किं ण पेक्खसि एणं ? । ( हताश ! अलं परिहासेन । किं न प्रेक्षसे एनम् ? )
विदूषकः—आः दासीए धीए ! किं भणासि दुदीअं विअ दुआरअं उग्-घाणिदं त्ति । वअस्स ! चारुदत्त ! उट्ठेहि, उट्ठेहि ! अम्हाणं गेहे सन्धि दइअ चोरो णिक्कन्तो । ( आः दास्याः पुत्रि ! किं भणसि द्वितीय-
( प्रवेश करके )
**अर्थ—रदनिका—**हाय ! हाय ! बाहर दरवाजे की कोठरी में वर्द्धमानक सोया हुआ था, वह भी नहीं दिखाई दे रहा है । अच्छा, आर्य मैत्रेय को बुलाती हूँ ।
शर्विलक—( रदनिका को मार डालना चाहता है । देख कर ) ओह, यह तो स्त्री है । अच्छा ( यहाँ से ) जाता हूँ । ( इस प्रकार चला जाता है । )
रदनिका—( घूम कर, भय के साथ ) हाय, हाय, हमारे घर में सेंध लगा कर चोर भागा जा रहा है । अच्छा, जाकर मैत्रेय को जगाती हूँ । ( विदूषक के समीप जाकर ) आर्य मैत्रेय । उठो, उठो, हम लोगों के घर में सेंध लगा कर चोर निकल गया ।
विदूषक—( उठ कर ) अरी दासी की पुत्री, क्या कह रही हो 'चोर कों फड़ कर सेंध निकल गई ।'
**रदनिका—**अरे मूर्ख ! हँसी मत करो । क्या इसे नहीं देख रहे हो ?
**विदूषक—**अरी दासी की पुत्री क्या कह रही हो 'दूसरा दरवाजा सा खोल