भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ
२१४मृच्छकटिकम्

अपि च—

भुजग इव गतौ, गिरिः स्थिरत्वे, पतगपतेः परिसर्पणे च तुल्यः । शश इव भुवनावलोकनेऽहं वृक इव च ग्रहणे बले च सिंहः ॥ २१ ॥

इसमें एक शर्विलक में ही तादात्म्य से मार्जार आदि का आरोप होने से मालारूपक अलङ्कार समझना चाहिये । एक शर्विलक का ही मार्जार आदि अनेक रूपों में उल्लेख होने से उल्लेख अलंकार की शंका की जा सकती है । परन्तु यहाँ शर्विलक में मार्जारत्व आदि वास्तविकरूप में नहीं है । अतः उल्लेख मानना सम्भव नहीं है । शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ २० ॥

अन्वयः— अहम्, गतौ, भुजगः, इव, स्थिरत्वे, गिरिः, परिसर्पणे, पतगपतेः, तुल्यः, भुवनावलोकने, शशः, इव, ग्रहणे, वृकः, इव, बले, च, सिंहः, अस्मि ॥ २१ ॥

शब्दार्थ— अहम् = मैं शर्विलक, गतौ = टेढ़ी मेढ़ी चाल में, भुजगः = साँप, इव = के समान, स्थिरत्वे = अचल रहने में, गिरिः = पहाड़, परिसर्पणे = शीघ्र चलने में, पतगपतेः = पक्षिराजगरुड के, तुल्यः = समान, भुवनावलोकने = एक समय में ही सारे संसार को देख लेने में, शशः = खरगोश, ग्रहणे = झपटकर पकड़ने में, वृकः = भेड़िया, च = और, बले = शक्ति, में, सिंहः = शेर, अस्मि = हूँ ॥ २१ ॥

अर्थ— मैं (शर्विलक) वक्र चलने में साँप के समान, अडिग रहने में पर्वत, शीघ्र चलने में पक्षिराज गरुड के समान, एक साथ सारे संसार को देख लेने में खरगोश के समान, (झपटकर) पकड़ने में भेड़िया के समान और बल में सिंह हूँ ॥ २१ ॥

टीका— पूर्वोक्तमेव स्वसामर्थ्यं पुनः वर्णयति—भुजग इति । अहम् = शर्विलकः गतौ = वक्रादिगमने, भुजगः = सर्पः, इव = यथा; स्थिरत्वे = अचलत्वे, गिरिः = पर्वतः, इव, परिसर्पणे = शीघ्रगमने, पतगपतेः = पक्षिराजगरुडस्य, तुल्यः = समानः, भुवनावलोकने = जगतः दर्शने, चतुर्दिक्दर्शने इति भावः, शशः = शशक इव, ग्रहणे = आक्रम्य लक्ष्यग्रहणे, वृकः = ईहामृगः, इव, बले = सत्त्वे, च, सिंह = मृगेन्द्रः इव, अस्मि = वर्ते । अत्र उपमेयभूतस्य एकस्य शर्विलकस्य विषयविशेषेषु भुजग-गिरिपतगपत्यादिभिः बहुभिरुपमानैः साम्यकथनात् मालोपमालङ्कारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ २१ ॥

विमर्श— पूर्वोक्त श्लोक के समान ही इसमें भी शर्विलक अपनी विशेषता बताता है । यहाँ उपमेय एक शर्विलक का भुजग, गिरि, पतगपति आदि बहुत से उपमानों के साथ साम्य कहने के कारण मालोपमा अलंकार है । कुछ ने उल्लेख अलकार माना है । पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ २१ ॥

तृतीयोऽङ्कः २१५

( प्रविश्य । )

रदनिका—हद्धी ! हद्धी ! बाहिर-दुआर-सालाए पसुत्तो वड्ढमाणओ, सोवि एत्थ ण दीसइ । भोदु, अज्जमित्तेअं सद्द्दावेमि । ( हा धिक् हा धिक् ! बहिर्द्वारशालायां प्रसुप्तो बर्द्धमानकः, सोऽप्यत्र न दृश्यते । भवतु, आर्यमैत्रेयं शब्दापयामि । )

शर्विलकः—( रदनिकां हन्तुमिच्छति । निरूप्य ) कथं स्त्री ! भवतु, गच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । )

रदनिका—( गत्वा सत्रासम् ) हद्धी ! हद्धी ! अम्हाणं गेहे सन्धि कप्पिअ चोरो णिक्कमदि । भोदु, मित्तेअं गदुअ पबोधेमि । ( विदूषकमुपगम्य ) अज्जमित्तेअ ! उट्ठेहि उट्ठेहि; अम्हाणं गेहे सन्धिं कपिअ चोरो णिक्कन्तो । ( हा धिक् हा धिक् ! अस्माकं गेहे सन्धि कल्पयित्वा चोरो निष्क्रामति । भवतु, मैत्रेयं गत्वा प्रबोधयामि । आर्यमैत्रेय ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ, अस्माकं गेहे सन्धि कल्पयित्वा चौरो निष्क्रान्तः । )

विदूषकः—( उत्थाय ) आः दासीए धीए ! किं भणासि 'चोरं कप्पिअ सन्धी णिक्कन्तो ?' । ( आः दास्याः पुत्रि ! किं भणसि 'चोरं कल्पयित्वा सन्धिनिष्क्रान्तः ?' )

रदनिका—हदास ! अलं परिहासेण । किं ण पेक्खसि एणं ? । ( हताश ! अलं परिहासेन । किं न प्रेक्षसे एनम् ? )

विदूषकः—आः दासीए धीए ! किं भणासि दुदीअं विअ दुआरअं उग्-घाणिदं त्ति । वअस्स ! चारुदत्त ! उट्ठेहि, उट्ठेहि ! अम्हाणं गेहे सन्धि दइअ चोरो णिक्कन्तो । ( आः दास्याः पुत्रि ! किं भणसि द्वितीय-


( प्रवेश करके )

**अर्थ—रदनिका—**हाय ! हाय ! बाहर दरवाजे की कोठरी में वर्द्धमानक सोया हुआ था, वह भी नहीं दिखाई दे रहा है । अच्छा, आर्य मैत्रेय को बुलाती हूँ ।

शर्विलक—( रदनिका को मार डालना चाहता है । देख कर ) ओह, यह तो स्त्री है । अच्छा ( यहाँ से ) जाता हूँ । ( इस प्रकार चला जाता है । )

रदनिका—( घूम कर, भय के साथ ) हाय, हाय, हमारे घर में सेंध लगा कर चोर भागा जा रहा है । अच्छा, जाकर मैत्रेय को जगाती हूँ । ( विदूषक के समीप जाकर ) आर्य मैत्रेय । उठो, उठो, हम लोगों के घर में सेंध लगा कर चोर निकल गया ।

विदूषक—( उठ कर ) अरी दासी की पुत्री, क्या कह रही हो 'चोर कों फड़ कर सेंध निकल गई ।'

**रदनिका—**अरे मूर्ख ! हँसी मत करो । क्या इसे नहीं देख रहे हो ?

**विदूषक—**अरी दासी की पुत्री क्या कह रही हो 'दूसरा दरवाजा सा खोल

२१६ मृच्छकटिकम्

मिव द्वारकम् उद्घाटितमिति । भो वयस्य ! चारुदत्त ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ । अस्माकं गेहे सन्धिं दत्त्वा चौरो निष्क्रान्तः । )

चारुदत्त :—भवतु । भोः ! अलं परिहासेन ।

विदूषक:—भो ! ण परिहासो । पेक्खदु भवं । ( भोः ! न परिहासः प्रेक्षतां भवान् । )

चारुदत्त :—कस्मिन्नुद्देशे ? ।

विदूषक:—भो ! एसो । ( भोः एषः । )

चारुदत्त :—( विलोक्य । ) अहो ! दर्शनीयोऽयं सन्धिः ।

उपरितलनिपातितेष्टकोऽयं
शिरसि तनुर्विपुलश्च मध्यदेशे !
असदृशजन-सम्प्रयोगभीरो-
र्हृदयमिव स्फुटितं महागृहस्य ॥ २२ ॥


दिया' । हे मित्र चारुदत्त उठिये, उठिये । हम लोगों के घर में चोर सेंध लगाकर निकल गया ।

चारुदत्त-—अच्छा, अरे मित्र हँसी मत करो ।

विदूषक--अरे ! हँसी नहीं है, क्या आप नहीं देख रहे हैं ?

चारुदत्त--किस जगह ?

विदूषक--अरे, यह है ।

चारुदत्त--( देख कर ) ओह ! यह सेंध तो दर्शनीय है ।

टीका-—शब्दापथापि = आह्वयामि, कथमिति आश्चर्यं, सत्रासम् = सन्धिं विलोक्य चौरसमागमभीत्येति भावः, कल्पयित्वा = सम्पादयित्वा, निष्क्रामति = पलायते, चौरं कल्पयित्वेत्यादिकं विदूषककथनं सम्भ्रममूलकमेव, हताश इति मूर्खत्वे, उद्देशे = प्रदेशे, स्थाने दर्शनीयः = अवलोकनीयः, निर्माणनैपुण्यातिशय-दर्शनादिति भावः ।

अन्वयः-—उपरितल-निपातितेष्टकः, शिरसि, तनुः, मध्यदेशे, च, विपुलः, अयम् ( सन्धिः ) असदृशजनसम्प्रयोगभीरोः, महागृहस्य, स्फुटितम्, हृदयम्, इव, ( दृश्यते ) ॥ २२ ॥

शब्दार्थः-—उपरितलनिपातितेष्टकः=ऊपर से हटा दी गई हैं ईंटें जिससे ऐसी, शिरसि=सिर पर, ऊपर, तनुः=छोटी, मध्यदेशे=बीचवाले भाग में, विपुलः=चौड़ीं, अयम्=यह सेन्ध, असदृशजन-सम्प्रयोगभीरोः=अनुचित व्यक्ति चोर आदि के आजाने से भयभीत, महागृहस्य = विशाल भवन के, स्फुटितम् = फटे हुये, विदीर्ण, हृदयमिव=हृदय के समान, दृश्यते=दिखाई दे रही है ।। २२ ।।

तृतीयोऽङ्कः २१७

कथमस्मिन्नपि कर्मणि कुशलता।

विदूषकः---भो वअस्स ! अअं सन्धो दुवेहिं ज्जेव दिण्णो भवे। आहु, आगन्तुएण सिक्खिदुकामेण वा। अण्णधा इध उज्जइणीए को अम्हाणं घरविहवं ण जाणादि ? । ( भो वयस्य ! अयं सन्धिर्द्वाभ्यामेव दत्तो भवेत्। अथवा आगन्तुकेन शिक्षितुकामेन वा। अन्यथा इह उज्जायिन्यां कः अस्माकं गृहविभवं न जानाति ? )


अर्थ---जिसमें ऊपरी ओर ईंटें हटाईं गयीं हैं, जो ऊपरी तरफ छोटी और बीच में चौड़ी ( अर्थात् घट के मुख और मध्यभाग के समान ) यह सेन्ध, चोर आदि अनुचित व्यक्ति के प्रवेश करने के कारण डरे हुये विशाल भवन के फटे हुये हृदय=कलेजे के समान दिखाई पड़ रही है ॥ २२ ॥

टीका---स्वोक्तं सन्धेर्दर्शनीयत्वं वर्णयन्नाह—उपरितलेति । उपरितलात्=ऊर्ध्वभागात्, निपातिता=आकृष्य अपसारिता इष्टका यस्मात् सः, कुत्रचित् उरसि=ऊर्ध्वभागात्, तलात् अधोभागात् इत्यपि व्याख्या दृश्यते, ‘उपरितन’ इति तु अपपाठः, शिरसि=उपरिभागे, मुखदेशे इति भावः, तनुः=अल्पप्रसरः, मध्ये=मध्यप्रदेशे च, विपुलः=विशालः, अयः=समक्षं दृश्यमानः सन्धिः, असदृशजनस्य—अयोग्यपुरुषस्य, संप्रयोगात्=प्रवेशात्, भीरोः=भययुक्तस्य, महागृहस्य=विशालभवनस्य, स्फुटितम्=विदीर्णम्, हृदयम्=वक्षस्थलम्, इव, दृश्यते । अत्र प्रकृते अचेतने हर्म्ये विहितस्य सन्धेः विदीर्णवक्षस्थल त्वसम्भावनयोत्प्रेक्षालंकारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ २२ ॥

विमर्शः---उपरितलनिपातितेष्टकः—इसमें उपरि = ऊर्ध्व, तल = अधः यहाँ ऊपर तथा नीचे दोनों से ईंटों का निकालना बताया है । कुछ लोग ‘उपरितन’ यह पाठ मानते हैं परन्तु “सायं चिरं प्राह्णे प्रगेऽव्ययेभ्यः” ( पा. सू. ४।३।२३ ) में कालवाची उपरि शब्द से ही प्रत्यय एवं तुडागम का विधान है । अतः स्थानवाची होने पर यह अशुद्ध होगा । घट का मुख छोटा और मध्य भाग बड़ा तथा नीचे पुनः छोटा होता है उसी प्रकार यह सेन्ध है । सेंध का फँटना उसी प्रकार है जैसा किसी महान् व्यक्ति का हृदय विदीर्ण होना । यहाँ अचेतन भवन में फोड़ी गई सेन्ध में विदीर्णवक्षस्थलत्व की सम्भावना की जाने से उत्प्रेक्षा अलंकार है । पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ २२ ॥

अर्थ---क्या इस सेन्ध लगाने के काम में भी कुशलता ( आवश्यक होती है, या सीखी जाती है ) ?

विदूषक---हे मित्र ! यह सेन्ध दो ही के द्वारा फोड़ी जा सकती है या तो बाहर से आने वाले किसी के द्वारा अथवा सीखने वाले के द्वारा । अन्यथा इस उज्जैन नगरी में हम लोगों के घर के वैभव को कौन नहीं जानता है ।

२१८मृच्छकटिकम्

चारुदत्त :--

वैदेश्येन कृतो भवेन्मम गृहे व्यापारमभ्यस्यता
नासौ विदितवान् धनैर्विरहितं विस्रब्धसुप्तं जनम् ।
दृष्ट्वा प्राङ्महतीं निवाससंरचनामस्माकमाशन्वितः,
सन्धिच्छेदनखिन्न एव सुचिरं पश्चान्निराशो गतः ॥ २३ ॥

टीका :-- अस्मिन्नपि = सन्धिभेदनकार्येऽपि, कुशलता=पटुता, योग्यता, दत्त:=विदारितः, शिक्षितुकामेन=शिक्षाम्यासपरेण, तुमन्तस्य कामशब्देन समासे मकारलोपः, गृहविभवम्=गृहैश्वर्यम्, न जानाति-काकुरत्र, सर्वेऽपि जानन्तीत्यर्थः ॥

अन्वयः-- वैदेश्येन, ( अथवा ) व्यापारम्, अभ्यस्यता, मम, गृहे, ( सन्धिः ) कृतः, भवेत्, असौ, धनैः, विरहितम्, विश्रब्धसुप्तम्, जनम्, न, विदितवान्, प्राक्, महतीम्, निवाससंरचनाम्, दृष्ट्वा, आशान्वितः, सुचिरम्, सन्धिच्छेदनखिन्नः, पश्चात्, निराशः, एव, गतः ॥ २३ ॥

शब्दार्थः-- वैदेश्येन = विदेश में होनेवाले, बाहरी, अथवा व्यापारम् = सेंध लगाने की क्रिया का, अभ्यस्यता = अभ्यास करनेवाले ( किसी ने ), मम = मेरे ( चारुदत्त के ) गृहे=घर में, ( सन्धिः=सेन्ध ), कृतः=फोड़ी, भवेत्=होगी, असौ=वह, धनैः=धन से, विरहितम्=हीन, विश्रब्धसुप्तम्=निश्चिन्तता के साथ सोनेवाले, जनम्=हम लोगों को, न = नहीं, विदितवान्=जान पाया, प्राक् = पहले, महतीम्=विशाल, निवाससंरचनाम्=भवन की बनावट को, दृष्ट्वा=देखकर, आशान्वितः=आशा लगाये हुये, सुचिरम् = बहुत देर तक, सन्धिच्छेदनखिन्नः = सेंध फोड़ने से थका हुआ, पश्चात् = बाद में, निराशः = निराश होकर, एव = ही, गतः = चला गया होगा ॥ २३ ॥

अर्थ-- किसी बाहरी ने अथवा सेंध लगाने का अभ्यास करने वाले ने ही मेरे घर पर सेंध लगाई होगी। वह धन से हीन अतः निश्चिन्त होकर सोनेवाले हम लोगों को नहीं जानता रहा होगा। पहले विशाल भवन की आकृति को देख कर ( यहाँ प्रचुर धनादि मिलेगा - इस ) आशा लगाये हुये काफी देर तक सेंध फोड़ने के कार्य से थका हुआ, बाद में ( कुछ भी न प्राप्त कर सकने से ) निराश ही लौट गया होगा ॥ २३ ॥

टीका-- विदूषकस्योक्तिं समर्थयमान एवाह-वैदेश्येनेति । वैदेश्येन=विदेशे भवेन, अतो गृहवैभवमजानता इति भावः, 'अथवा' इत्यध्याहार्यम्, विदूषकोक्ति-समर्थनार्थमुक्तत्वादिति बोध्यम्, व्यापारम् = सन्धिच्छेदनरूपं कार्यम्, अभ्यस्यता=शिक्षमाणेन, जनेन, मम=चारुदत्तस्य, गृहे=भवने, सन्धिः, कृतः=विहितः, भवेत्-स्यात्; अत्र हेतुमाह -असौ = चौरः, धनैः = द्रव्यैः, विरहितम्=हीनम्, अत एव,

तृतीयाऽङ्कः २१६

ततः सुहृद्भ्यः किमसौ कथयिष्यति तपस्वी, 'सार्थवाहसुतस्य गृहं प्रविश्य न किञ्चिन्मया समासादितम्' इति ।

विदूषकः—भो ! कथं तं ज्जेव चोरहदअं अणुशोचसि । तेण चिन्तिदं महन्तं इदं गेहं, इदो रअणभण्डअं सुवण्णभण्डअं वा णिक्कामइस्सामि । (स्मृत्वा, सविषादमात्मगतम्) कहिं तं सुवण्णभण्डअं ? (पुनरनुस्मृत्य प्रकाशम्) भो वअस्स ! तुमं सव्वकालं भणासि 'मुक्खो मित्तेअओ, अपण्डिदो मित्तेअओ' त्ति । सुट्ठु मए किदं तं सुवण्णभण्डअं भवदो हत्थे समप्पअन्तेण । अण्णधा दासीए पुत्तेण अवहदं भवे । (भोः ! कथं तमेव चौरहतकमनुशोचसि । तेन चिन्तितम्—महदेतद्गेहम्, इतो रत्नभाण्डं सुवर्णभाण्डं वा निष्क्रामयिष्यामि । कुत्र तत् सुवर्णभाण्डम् ? भो वयस्य ! त्वं सर्वकालं भणसि —


विश्रब्धसुप्तम् = निःशङ्कनिद्रितम्, जनम् = पुरुषम्, माम् इति भावः, न = नैव, वेदितवान् = ज्ञातवान्, स्वार्थे णिचि बोध्यः, तत्रापि हेतुमाह — प्राक् = पूर्वम्, महतीम् = विशालाम्, निवाससंरचनाम् = भवनाकारम्, दृष्ट्वा = विलोक्य, आशान्वित = धनादिप्राप्त्याशया युक्तः, सुचिरम् = दीर्घकालपर्यन्तम्, सन्धिच्छेदनेन = सन्धिकर्तनेन, खिन्नः = परिश्रान्तः, पश्चात् = गृहप्रवेशानन्तरम्, निराशः = निष्फलप्रयासः, असफलमनोरथः, एव, गतः = प्रस्थितः, अत्र प्रथमपादं प्रति द्वितीयपादस्य हेतुतया निर्देशात् काव्यलिङ्गमलङ्कारः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।। २३ ।।

विमर्श—'वैदेश्येन' इसके बाद 'अथवा' का अध्याहार करना चाहिये । क्योंकि विदूषक के कथन—'द्वाभ्यामेव'—इत्यादि के साथ सामञ्जस्य बनाना है । वेदितवान्—यहाँ √विद् धातु से स्वार्थिक णिच् प्रत्यय करके क्त-प्रत्ययान्त रूप समझना चाहिये । महतीम्—चोर ने पहले यह देखा कि इतना विशाल भवन है तो इसी के अनुरूप सम्पत्ति भी होगी । अतः बहुत देर तक सेंध फोड़ने का परिश्रम करता रहा होगा । पश्चात् निराशः—किन्तु घर में आने पर उसे एक कौड़ी भी नहीं मिल सकी होगी । अतः निराश होकर चला गया होगा । यहाँ प्रथम पाद में जो कहा है उसी के समर्थन में हेतुरूपेण द्वितीय पाद है । अतः काव्यलिङ्ग अलंकार है । शार्दूलविक्रीडित छन्द है ।। २३ ।।

**अर्थ—**तब यह बेचारा अपने मित्रों से क्या कहेगा "सार्थवाहपुत्र के घर में घुस कर मैंने कुछ नहीं पाया ।"

**विदूषकः—**अरे ! क्यों उस नीच चोर के विषय में ही सोच रहे हो ? उसने सोचा यह विशाल घर है । इससे रत्नों का बक्स अथवा स्वर्ण का बक्स निकाल लूंगा । (सोच कर, विषाद के साथ—अपने आपमें) वह सोने के गहनों का डिब्बा

२२०मृच्छकटिकम्

'मूर्खो मैत्रेयः अपण्डितो मैत्रेयः' इति । सुष्ठु मया कृतं तत् सुवर्णभाण्डं भवतो हस्ते समर्पयता । अन्यथा दास्याः पुत्रेण अपहृतं भवेत् । )

**चारुदत्तः—**अलं परिहासेन ।

**विदूषकः—**भो ! जह णाम अहं मुक्खो, ता किं परिहासस्स वि देशआलं ण जाणामि ? । ( भोः यथा नाम अहं मूर्खः तत् किं परिहासस्यापि देशकालं न जानामि ? )

**चारुदत्तः—**कस्यां वेलायाम् ? ।

**विदूषकः—**भो ! जदा तुमं मए भणिदोऽसि—सीदलो दे अग्गहत्थो । ( भोः यदा त्वं मया भणितोऽसि—शीतलस्ते अग्रहस्तः । )

**चारुदत्तः—**कदाचिदेवमपि स्यात् ? । ( सर्वतो निरूप्य सहर्षम् ) वयस्य ! दिष्ट्या ते प्रियं निवेदयामि ।

**विदूषकः—**किं ण अवहदं ? ( किं न अपहृतम् ? )

**चारुदत्तः—**हृतम् ।

**विदूषकः—**तथा वि किं पिअं ? । ( तथापि किं प्रियम् ? )

**चारुदत्तः—**यदसौ कृतार्थो गतः ।

**विदूषकः—**णासो क्खु सो । ( न्यासः खलु सः । )


कहाँ है ? ( फिर याद करके प्रकट रूप से ) हे मित्र ! तुम हर समय कहा करते हो—'मैत्रेय मूर्ख है, मैत्रेय अज्ञानी है।' सोने के गहनों के उस डिब्बे को आपके हाथ में देते हुये मैंने बहुत अच्छा किया। नहीं तो, दासी के बच्चे चोर ने उसे चुरा लिया होता ।

**चारुदत्त—**मित्र, परिहास मत करो ।

**विदूषक—**अरे ! यद्यपि मैं मूर्ख हूँ किन्तु क्या परिहास का समय और स्थान भी नहीं समझता हूँ ।

**चारुदत्त—**किस समय ?

**विदूषक—**मित्र ! जब मैंने कहा था कि तुम्हारी अंगुली ठण्डी है ।

**चारुदत्त—**सम्भव है ऐसा हुआ भी हो ( चारों ओर देखकर हर्षपूर्वक ) मित्र ! भाग्यवश मैं तुम्हें शुभ समाचार बताता हूँ ।

**विदूषक—**क्या नहीं चुराया ?

**चारुदत्त—**चुराया ।

**विदूषक—**तब क्या शुभ समाचार है ?

**चारुदत्त—**यही कि वह सफल होकर गया ।

**विदूषक—**अरे ! वह धरोहर थी ।

तृतीयोऽङ्कः २२१

चारुदत्तः— कथं न्यासः। ( मोहमुपगतः )

विदूषकः— समस्ससदु भवं। जइ णासो चोरेण अवहदो, तुमं किं मोहं उवगदो? । ( समाश्वसितु भवान् । यदि न्यासश्चोरेणापहृतः, त्वं किं मोहमुपगतः ? )

चारुदत्तः— ( समाश्वस्य ) वयस्य !

कः श्रद्धास्यति भूतार्थं सर्वो मां तुलयिष्यति । शङ्कनीया हि लोकेऽस्मिन् निष्प्रतापा दरिद्रता ॥ २४ ॥


चारुदत्त— क्या धरोहर थी ? ( मूर्छित हो जाता है । )

विदूषक— आप धैर्य धारण करें । यदि चोर ने धरोहर चुरा ली तो आप क्यों मूच्छित हो गये ?

टीका— तपस्वी = वराकः, सार्थवाहसुतस्य = चारुदत्तस्य, समासादितम् = प्राप्तम्, चौरहतकम् = चौरश्चासौ हतकश्च इति चौरहतकः = दुष्टचौरः, निष्क्रामयिष्यामि = अपहरिष्यामि, परिहासस्य = उपहासस्य, देशकालम् = स्थानसमयम्, दिष्ट्या = भाग्येन, न्यासः = निक्षेपः, वसन्तसेनाया इति शेषः, समाश्वसितु = समाश्वस्तो भवतु ।।

अन्वयः— कः, भूतार्थम्, श्रद्धास्यति, सर्वः, माम्, तुलयिष्यति, हि, अस्मिन्, लोके, निष्प्रतापा, दरिद्रता, शङ्कनीया, ( भवति ) ॥ २४ ॥

शब्दार्थ— कः=कौन, भूतार्थम्=बीती सच बात पर, श्रद्धास्यति=विश्वास करेगा, सर्वः=सभी कोई, माम्=मुझे, तुलयिष्यति=तौलेंगे, अर्थात सन्देह करेंगे, हि=क्योंकि, अस्मिन्=इस, लोके = ससार में, निष्प्रतापा = प्रतापहीन, दरिद्रता=गरीबी, शङ्कनीया=शङ्का करने योग्य, भवति=होती है ॥ २४ ॥

अर्थ—चारुदत्त—( धैर्य धारण करके ) मित्र !

कौन बीती हुई सच बात पर विश्वास करेगा ? सभी मुझ पर सन्देह करेंगे, क्योंकि इस संसार में प्रतापशून्य निर्धनता सन्देह करने योग्य होती है, अर्थात् दरिद्र पर सभी लोग शंका करने लग जाते हैं ॥ २४ ॥

टीका वसन्तसेनायाः न्यासापहारे कथं मोह इति विदूषकोक्तिमुत्तरयन्नाह— क इति । कः = जनः, भूतार्थम् = सञ्जातं यथार्थम्, 'चौरेणेव तत्सुवर्णभाण्डमपहृतं न त्वनेन'–इत्येवं रूपम्, श्रद्धास्यति = विश्वासिष्यति, **हि=**यतः, अस्मिन् लोके= संसारे, निष्प्रतापा = प्रतापहीना, दरिद्रता = निर्धनता, **शङ्कनीया=**शङ्कास्थानम्, भवतीति भावः । अत्र सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः अलंकारः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ २४ ॥

२२२ | मृच्छकटिकम्

भोः ! कष्टम् ।

यदि तावत् कृतान्तेन प्रणयोऽर्थेषु मे कृतः । किमिदानीं नृशंसेन चारित्रमपि दूषितम् ॥ २५ ॥

विमर्श--भूतः = सत्यः, वस्तुतो जातः, अर्थः = चौरापहरणरूपः, तम् । श्रद्धास्यति = सत्यत्वेन स्वीकरिष्यति, तुलयिष्यति--इसके स्थान पर तूलयिष्यति-यह भी पाठ है-तूलमिव लघूकरिष्यति-यह अर्थ है। तुलयिष्यति-सन्देह दूर करने के लिये तुला पर बैठाकर परीक्षा लेना शास्त्रसम्मत है, वही करेंगे। निष्प्रतापा-निर्गतः प्रतापः तेजः यस्यां सा-जिसमें से तेज समाप्त हो चुका है। यहाँ उत्तरार्द्ध के सामान्य कथन से पूर्वार्द्ध के विशेष कथन का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यास अलंकार है। और पथ्यावक्र छन्द है ॥ २४ ॥

अन्वयः-कृतान्तेन, यदि, तावत्, मम, अर्थेषु, प्रणयः, कृतः, नृशंसेन, इदानीम्, मम, चारित्रम्, अपि, किम्, दूषितम् ॥ २५ ॥

शब्दार्थ--कृतान्तेन = दुर्भाग्य ने, यदि तावत् = यदि अब तक, मे = मेरे, चारुदत्त के, अर्थेषु = धन पर, प्रणयः = अनुराग, कृतः = किया अर्थात् सारा धन ले लिया, तर्हि = तो, नृशंसेन = क्रूर उस भाग्य ने, इदानीम् = इस समय, चारित्रम् = चरित्र को, अपि = भी दूषितम् = दूषित कर डाला ॥ २५ ॥

अर्थ--हाय कष्ट है।
यदि दुर्भाग्य ने मेरा धन ले लिया (तो कोई बात नहीं) किन्तु इस समय चरित्र भी दूषित कर डाला ॥ २५ ॥

टीका--धनहानिर्मां न तथा पीडयति यथा लोकैः सम्भाव्यमानः मम चरित्रे दोष-इत्याह-यदीति। कृतान्तेन = दैवेन, यदि तावत् = यदि, तावत्-वाक्यालंकारे, मे = मम, चारुदत्तस्येत्यर्थः, अर्थेषु = धनेषु, प्रणयः = प्रीतिः, कृतः = विहितः, ग्रहणाय धनेषु अनुरागः प्रदर्शितः, नृशंसेन = क्रूरेण, इदानीम् = अधुना, मम = चारुदत्तस्य, चारित्रम् = सच्चरित्रता अपि, दूषितम् = निन्दनीयं कृतम्, चारुदत्तेन वसन्तसेनायाः न्यासः स्वयमपहृत्य चौर्यरूपेण प्रख्यापित इति निन्दापि समारोपितेति भावः, पथ्यावक्रं वृत्तम् ॥ २५ ॥

विमर्श--'कृतान्तो यमदैवयोः'--कोषानुसार यहाँ दैव = भाग्य अर्थ है। तावत् = उतना, अर्थात् धन से अनुराग करके हरण कर लेना तक तो ठीक था। परन्तु अब चरित्र का विघात सह्य नहीं है। सभी यह कहेंगे कि वसन्तसेना का धन स्वयं हड़प कर चोरी का बहाना कर रहा है। यहाँ पथ्यावक्र छन्द है ॥ २५ ॥

तृतीयोऽङ्कः २२३

विदूषकः—अहं खु अवलविस्सं, केण दिण्णं ? केण गहिदं ? को वा सक्खि ? त्ति । ( अहं खलु अपलपिष्यामि, केन दत्तम् ? केन गृहीतम् ? को वा साक्षी ? इति । )

चारुदत्तः—अहमिदानीमनृतमभिधास्ये ?

भैक्ष्येणाप्यर्जयिष्यामि पुनर्न्यासप्रतिक्रियाम् ।
अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंशकारणम् ॥ २६ ॥

रदनिका—ता जाव अज्जाधूदाए गदुअ णिवेदेमि । ( तद्यावत् आर्या-धूतायै गत्वा निवेदयामि । )

( इति निष्क्रान्ता । )


**अर्थ—विदूषक—**मैं झूठ बोल दूंगा—किसने दिया ? किसने लिया ? कौन गवाह है ?

**चारुदत्त—**क्या अब मैं झूठ ( भी ) बोलूँगा ?

**अन्वयः—**भैक्ष्येण, अपि, न्यासप्रतिक्रियाम्, पुनः, अर्जयिष्यामि, चारित्रभ्रंशकारकम्, अनृतम्, न, अभिधास्यामि ॥ २६ ॥

**शब्दार्थ—**भैक्ष्येण=भीख से, अपि=भी, न्यासप्रतिक्रियाम्=धरोहर के बदले का धन, पुनः=फिर, अर्जयिष्यामि=पैदा करूँगा, किन्तु, चारित्रभ्रंशकारकम्=चरित्र को विकृत करने वाले, अनृतम् = असत्य को, न = नहीं, अभिधास्यामि=बोलूँगा ॥ २६ ॥

अर्थ—( मैं ) भीख से ( अर्थात् भीख माँग कर ) भी धरोहर के बदले का धन पुनः पैदा करूँगा परन्तु चरित्र को विकृत कर देने वाले असत्य को नहीं बोलूँगा ॥ २६ ॥

**टीका—**ममानृतभाषणमसम्भवमित्यत आह—भैक्ष्येणेति । भैक्ष्येण=भिक्षया, अपि, अपिना अन्येन केनापि समुचितेनोपायेन न्यासप्रतिक्रियाम्=मत्सविधे रक्षितधनस्य शोधनोपायम्, पुनः, अर्जयिष्यामि=आहरिष्यामि, किन्तु, चारित्रभ्रंशकारणम्=सदाचरणच्युतिकारकम्, अनृतम्=असत्यम्, न=नैव, अभिधास्यामि=वदिष्यामि । एवञ्चानृतभाषणापेक्षया भिक्षाटनं वरमिति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २६ ॥

**विमर्श—**भैक्ष्येण—यहाँ चारुदत्त की सच्चारित्रता का अच्छा वर्णन है । वह अपने सदाचार के विषय में लोकप्रवाद और असत्यभाषण से कितना अधिक भयभीत है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है । पथ्यांवक्र छन्द है ॥ २६ ॥

**अर्थ—रदनिका—**तो तब तक आर्याधूता से सारी घटना कहती हूँ ।

( यह कह कर निकल जाती है । )

२२४ मृच्छकटिकम्

( ततः प्रविशति चेटचा सह चारुदत्तवधूः । )

वधूः-- ( ससम्भ्रमम् ) अइ ! सच्चं अवरिक्खदसरोरो अज्जउत्तो अज्जमित्तेएण सह ? ( अयि ! सत्यम् अपरिक्षतशरीर आर्यपुत्र आर्यमैत्रेयेण सह ? )

चेटी - भट्टिणि ! सच्चं ! किं तु जो सो वेस्साजणकेरको अलंकारको, सो अवह्रदो । ( भट्टिनि ! सत्यम् ! किन्तु यः स वेश्याजनस्य अलंकारकः सोऽपहृतः । )

( वधूः मोहं नाटयति । )

चेटी-- समस्ससदु अज्जा धूदा । ( समाश्वसितु आर्याधूता ! )

वधूः-- ( समाश्वस्य ) हञ्जे ! किं भणासि ? 'अवरिक्खदसरोरो अज्जउत्तो' त्ति । वरं दाणि सो सरीरेण परिक्खदो, ण उण चारित्तेण । संपदं उज्जइणीए जणो एवं मन्तइस्सिदि-‘दलिद्ददाए अज्जउत्तेण ज्जेव ईदिसं अकज्जं अणुचिट्ठिदं'त्ति । ( ऊर्ध्वमवलोक्य निःश्वस्य च ) भअवं कअन्त ! पोक्खर-पत्त-पडिद-जलविन्दु-चञ्चलेहिं कीलसि दलिद्दपुरिसभ आधे-एहिं । इअं चं मे एक्का मादुघरलब्धा रअणावली चिट्ठदि, एदंपि अदिसोण्डीरदाए अज्जउत्तो ण गेण्हिस्सदि । हञ्जे ! अज्जमित्तेअं दाव सद्दावेहि । ( हञ्जे ! किं भणसि-‘अपरिक्षतशरीरः आर्यपुत्रः' इति । वरमिदानीं स शरीरेण परिक्षतः न पुनश्चारित्रेण । साम्प्रतमुज्जयिन्यां जन एवं मन्त्रयिष्यति-‘दरिद्रतया आर्यपुत्रेणैव ईदृशमकार्यमनुष्ठितमिति । भगवन् कृतान्त ! पुष्करपत्र-पतितजलबिन्दुचञ्चलैः क्रीडसि दरिद्रपुरुषभागधेयैः । इयञ्च मे एका मातृगृहलब्धा


( इसके बाद चेटी के साथ चारुदत्त की पत्नी प्रवेश करती है । )

अर्थ-वधू-- ( चारुदत्त की पत्नी ) - ( घबड़ाहट के साथ ) अरी ! आर्य मैत्रेय के साथ आर्य चारुदत्त शरीर से कुशल तो हैं ?

चेटी-- स्वामिनि ! सचमुच ( सकुशल हैं ) । परन्तु वेश्या वसन्तसेना का जो अलंकारसमूह था वह चुरा लिया गया, ( चोरी चला गया ) ।

( वधू मूच्छित होने का अभिनय करती है । )

चेटी-- आर्या धूता आप धैर्य धारण करें ।

वधू-- ( धैर्य धारण करके ) सखी क्या कह रही हो - 'आर्यपुत्र इस समय शरीर से कुशल है ।' शरीर से क्षत = घायल होना ठीक था न कि चरित्र से । ( अर्थात् शरीर में कोई घाव आदि हो जाता तो चिन्ता की बात नहीं थी परन्तु उनका चरित्र ही विकृत हो गया । ) इस समय उज्जैन नगरी में लोग ऐसा कहेंगे--“दरिद्र होने के कारण आर्यपुत्र ( चारुदत्त ) ने ही यह अनुचित कार्य ( स्वर्णाभूषण हड़प जाना ) किया है ।” भगवन् दैव ! द्ररिद्रपुरुष के, कमल-पत्र पर गिरी हुयी पानी के बूँद के समान चञ्चल, भाग्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हो । और मेरे मातृगृह ( नैहर ) से मिली हुई एक रत्नावली है ।

तृतीयोऽङ्कः २२४

रत्नावली तिष्ठति । एतामपि अतिशौण्डीरतया आर्यपुत्रो न ग्रहीष्यति । हञ्जे ! आर्यमैत्रेयं तावत् शब्दापय ।)

चेटो—जं अज्जा धूदा आणवेदि । (विदूषकमुपगम्य) अज्ज मित्तेअ ! धूदा दे सद्वावेदि । (यदार्या धूता आज्ञापयति । आर्य मैत्रेय ! धूता त्वां शब्दापयति ।)

विदूषकः—कहिं सा ? । (कस्मिन् सा ? )

चेटी—एसा चिट्ठदि, उवसप्प । (एषा तिष्ठति, उपसर्प । )

विदूषकः—(उपसृत्य) सोत्थि भोदीए । (स्वस्ति भवत्यै ।)

वधूः—अज्ज ! वन्दामि । अज्ज ! पुरत्थिआमुहो होहि । (आर्य ! वन्दे । आर्य पुरस्तान्मुखो भव ।)

विदूषकः—एसो भोदि ! पुरत्थिआमुहो संवुत्तोह्नि । (एष भवति ! पुरस्तान्मुखः संवृत्तोऽस्मि ।)

वधूः—अज्ज ! पडिच्छ इमं । (आर्य ! प्रतीच्छ इमाम् ।)

विदूषकः—किं ण्णदं ? (किं न्विदम् ? )


परन्तु अत्यधिक उदार होने के कारण आर्यपुत्र इसे भी नहीं लेंगे । सखी, आर्य मैत्रेय को बुलाओ ।

टीकावधूः=चारुदत्तस्य भार्या, अपरिक्षतशरीरः = अपरिक्षतम् = चौरादि-प्रहारेण अपरिभ्रष्टम्, शरीरं यस्य सः, वेश्याजनस्य=वसन्तसेनायाः, परिक्षतः=परिभ्रष्टः, पुनः = परन्तु, अकार्यम् = न्यासापहरणरूपम्, अनुष्ठितम् = सम्पादितम्, कृतान्त=दैव । पुष्करस्य = कमलस्य, पत्रेषु = दलेषु, पतिता ये जलविन्दवस्तद्वत् चञ्चलैः=अस्थिरैः, भाग्यधेयैः=भाग्यैरित्यर्थः, स्वार्थे धेयप्रत्ययः, क्रीडसि-विहरसि, रत्नावली=रत्नानां हारविशेषः, तिष्ठति=धार्यते, अतिशौण्डीरतया=अतीवोदारतया, ग्रहीष्यति=पत्नीधनं पुरुषेण न ग्राह्यमिति भावनया नैव स्वीकरिष्यतीति भावः ।

अर्थचेटी—जैसी आर्या धूता की आज्ञा । (विदूषक के पास जाकर) आर्य मैत्रेय ! धूता आपको बुला रही हैं ।

विदूषक — वे कहाँ है ?

चेटी—वे यहाँ हैं, चलिये ।

विदूषक—(पास जाकर) आपका कल्याण हो ।

वधू—आर्य ! आपको प्रणाम है । आर्य, सम्मुख होइये ।

विदूषक—पूजनीये ! यह मैं आपके सामने हो गया हूँ ।

वधू—आर्य ! इसे ग्रहण कर लीजिये ।

विदूषक—यह क्या है ?

१५ मृ०

२२६ मृच्छकटिकम्

वधूः—अहं क्खु रअणसट्ठि उववसिदा आसि। तंहि जहाविहवाणु- सारेण वम्हणो पडिग्गाहिदव्वो, सो अ ण पडिग्गाहिदो; ता तस्स किदे पडिच्छ इमं रअणमालिअं । ( अहं खलु रत्नषष्ठीमुपोषिता आसम् । तस्मिन् यथाविभवानुसारेण ब्राह्मणः प्रतिग्राहयितव्यः, स च न प्रतिग्राहितः, तत् तस्य कृते प्रतीच्छ इमां रत्नमालिकाम् । ) विदूषकः—( गृहीत्वा ) सोत्थि। गमिस्सं, पिअवअस्सस्स णिवेदेमि । ( स्वस्ति। गमिष्यामि। प्रियवयस्यस्य निवेदयामि । ) वधूः—अज्ज मित्तेअ ! मा क्खु मं लज्जावेहि । ( इति निष्क्रान्ता ) ( आर्य मैत्रेय ! मा खलु मां लज्जितां कुरु : ) विदूषकः—( सविस्मयम् ) अहो ! से महाणुभावदा । ( अहो ! अस्या महानुभावता । ) चारुदत्तः—अये ! चिरयति मैत्रेयः । मा नाम वैक्लव्यादकार्यं कुर्यात् । मैत्रेय ! मैत्रेय !


वधू—मैंने रत्नषष्ठी व्रत रखा था। उसमें अपनी सम्पत्ति के अनुसार ब्राह्मण को दान देना चाहिये; वह नहीं दिया है, अतः उसके लिये इस रत्नावली को ले लीजिये । विदूषक—( लेकर ) आपका कल्याण हो । प्रिय मित्र से निवेदित करूँगा । वधू—आर्य मैत्रेय ! मुझे लज्जित मत करें । ( यह कह कर निकल जाती है । )

टीका—उपसर्प=समीपं गच्छ, पुरस्तान्मुखः = पुरस्तात् = पूर्वस्यां दिशि, मुखं यस्य सः, अभिमुख इत्यर्थः, प्रतीच्छ=गृहाण, रत्नषष्ठीम्=एतन्नाम्ना प्रसिद्धं व्रतम्, यस्यां रत्नदानं विहितमिति यावत्, अत्र अत्यन्तसंयोगे द्वितीया बोध्या, न च 'अभुक्त्यर्थस्य' इत्यनेन निषेधात् कथमत्र कर्मत्वम्, "गत्यर्थ०" (पा. सू. २।३।१२ ) इति सूत्रे 'हरिदिनमुपोषितः' इत्युदाहरणदानेन वसतेरत्र स्थितिरर्थः, भोजन- निवृत्तिस्त्वार्थिकेति व्याचख्युः । यथाविभवानुसारेण=सम्पत्त्यनुरूपम्, अत्र यथा- विभवम् इत्यव्ययीभावेनैव निर्वाहे सम्भवे 'अनुसार' शब्दप्रयोगश्चिन्त्यः । प्रति- ग्राहितव्यः = दातव्यः, तस्य = व्रतस्य, मा लज्ज मदाशयं ज्ञात्वा मम लज्जाकरं न वदेति भावः ।

अर्थ—विदूषक—( आश्चर्य के साथ ) अहो, इसकी अतिशय उदारता । चारुदत्त—अरे, मैत्रेय देर कर रहा है । कहीं दुःख या व्याकुलता के कारण ( आत्महत्या आदि ) अकार्य न कर डाले । मैत्रेय ! मैत्रेय !

तृतीयोऽङ्कः २२७

विदूषकः—(उपसृत्य) एसोम्हि । गेण्ह एदं । ( एषोऽस्मि, गृहाण एताम् )
( रत्नावलीं दर्शयति । )
चारुदत्तः—किमेतत् ?
विदूषकः—भो ! जं दे सदिस--दार-सङ्ग्रहस्य फलं । ( भोः ! यत् ते सदृशदारसंग्रहस्य फलम् । )
चारुदत्तः—कथं ब्राह्मणी मामनुकम्पते ? कष्टम् ! इदानीमस्मि दरिद्रः !

आत्मभाग्यक्षतद्रव्यः स्त्रीद्रव्येणानुकम्पितः ।
अर्थतः पुरुषो नारी, या नारी सार्थतः पुमान् ॥ २७ ॥


विदूषक—( समीप आकर ) मैं यह आ गया, इसे ले लीजिये । ( रत्नावली दिखाता है । )
चारुदत्त — यह क्या है ?
विदूषक—अरे, अपने योग्य पत्नी से विवाह करने का सुपरिणाम है ।
चारुदत्त—क्या ब्राह्मणी मुझ पर अनुकम्पा कर रही है । अब मैं ( वास्तव में ) दरिद्र हो गया !

टीका—महानुभावता=महाशयत्वम्, अस्याः=चारुदत्तस्य पत्न्याः, वैक्लव्यात्=शोकातिरेकात, अकार्यम् = आत्महत्यादिरूपमनुचितं कार्यम्, चिरयति = विलम्बं करोति, सदृशदारसङ्ग्रहस्य=स्वानुरूपपत्नीग्रहणस्य, सुपत्नीलक्षणम्—

सेवादासी, रतौ वेश्या, भोजने जाननी-समा ।
विपत्काले परं मित्रं सा भार्या भुवि दुर्लभा ॥

अन्वयः—आत्मभाग्यक्षतद्रव्यः, स्त्रीद्रव्येण, अनुकम्पितः पुरुषः, अर्थतः, नारी, ( भवति ), या नारी, सा, अर्थतः पुमान्, भवति ॥ २७ ॥

शब्दार्थ—आत्मभाग्यक्षतद्रव्यः = अपने दुर्भाग्य से विनष्ट धनवाला, स्त्री-द्रव्येण=स्त्री के धन से, अनुकम्पितः=अनुगृहीत होने वाला, पुरुषः=पुरुष, अर्थतः=धन से ( अर्थात् धन के कारण ) नारी=स्त्री, ( भवति=हो जाता है और ) या नारी = जो स्त्री, होती है, सा = वह, अर्थतः=धन के कारण, पुमान् = पूरुष हो जाती है ॥ २७ ॥

अर्थ—अपने दुर्भाग्य के कारण विनष्ट धनवाला तथा स्त्री के धन से अनुगृहीत होने वाला पुरुष धन ( न होने ) के कारण स्त्री ( अर्थात् स्त्री के समान ) हो जाता है, जो स्त्री होती है वह धन ( होने ) के कारण पुरुष ( अर्थात् पुरुषतुल्य, प्रधान ) बन जाती है ॥ २७ ॥

टीका—धूताया दत्तां विदूषकहस्तस्थां रत्नावलीं विलोक्य सनिर्वेदमाह—

३२८ मृच्छकटिकम्

अथवा नाहं दरिद्रः । यस्य मम---

विभवानुगता भार्या सुखदुःखसुहृद् भवान् । सत्यञ्च न परिभ्रष्टं यद्दरिद्रेषु दुर्लभम् ॥ २८ ॥


आत्मभाग्येति । आत्मनः=स्वस्य, भाग्येन=दुर्देवेन, क्षतम्=विनष्टम्, द्रव्यम्=धनं यस्य सः, भाग्यशब्दः सौभाग्यदौर्भाग्योभयसाधारणः प्रसङ्गात् योजनीयः, स्त्री-द्रव्येण=स्त्रीधनेन, अनुकम्पितः=अनुगृहीतः, पुरुषः=जनः, अर्थतः=धनेन, धनाभावेनेति यावत्, नारी=स्त्री, या नारी = स्त्री, सा, अर्थतः = धनेन, पुमान्=पुरुषः भवति । अत्र धनस्य सत्त्वासत्त्वाभ्यामेव स्त्रीत्वं पुरुषत्वं च नियम्यते इति भावः । अत्र पुरुषस्य अर्थतो नारीत्वे पूर्वार्द्धगतपदद्वयस्य हेतुत्वेन काव्यलिङ्गमलङ्कारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २७ ॥

विमर्श---इदानीमस्मि दरिद्रः---यह चारुदत्तोक्ति अत्यन्त मार्मिक है। स्वाभिमान या पुरुषत्व पर होने वाले प्रहार को सहन करना चारुदत्त के वश के बाहर है। अर्थतः पुरुषो नारी---जब धन नहीं होता है तो पुरुष नारी बन जाता है क्योंकि उसमें शक्ति एवं सामर्थ्य नहीं रह पाते हैं। इसके विपरीत धन होने पर स्त्री पुरुष बन कर बड़े-बड़े कार्य करने में समर्थ हो जाती है। काव्यलिङ्ग अलंकार और पथ्यावक्त्र छन्द है ॥ २७ ॥

अन्वयः---( यस्य, मम-इति गद्यस्थेनान्वयः ) स्त्री, विभवानुगता, भवान्, सुखदुःखसुहृत्, सत्यम्, चं, न, परिभ्रष्टम्, यत्, दरिद्रेषु, दुर्लभम् ॥ २८ ॥

शब्दार्थः---( यस्य = जिस, मम = मेरी-इन गद्यस्थ पदों के साथ जोड़ना चाहिये ) स्त्री=पत्नी, विभवानुगता = विभव के अनुसार निर्वाह करने वाली है, भवान्=आप, सुखदुःखसुहृत्=सुख और दुःख के मित्र हैं, च=और, सत्यम्=सत्य, न=नहीं, परिभ्रष्टम् = छूटा, यत्=यह ( तीन बातें ), दरिद्रेषु = निर्धन लोगों में, दुर्लभम्=कष्ट से मिलने वाली हैं ॥ २८ ॥

अर्थ---अथवा मैं दरिद्र नहीं हूँ।

जिस मेरी पत्नी सम्पत्ति के अनुसार चलनेवाली है, आप सुख और दुःख के साथी हैं, और सत्य नहीं छूटा है, ये ( तीनों चीजें ) दरिद्रों में दुर्लभ होती हैं ॥ २८ ॥

टीका---आत्मनोऽदारिद्र्यं निरूपयन्नाह-स्त्रीति। स्त्री = पत्नी, विभवानुगता=विभवस्य = धनादेः, अनुसारिणी=अनुकूलकार्यकर्त्री, यथा धनादिकं भवति तथैव निर्वाहसमर्थेति भावः, भवान्=मैत्रेयः, सुखदुःखसुहृत्=सुखे दुःखे च, सम्पत्तौ विपत्तौ च सुहृत् = सखा, सत्यम् = सत्यभाषणम्, च, न=नैव, परिभ्रष्टम्=नष्टम्, यत्=पूर्वोक्तत्रयम्, दरिद्रेषु=निर्धनेषु, दुर्लभम्=दुष्प्रापम् । एवञ्च एषु त्रिषु सत्सु मम दारिद्र्यं नैवेति सिद्धम् । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २८ ॥

तृतीयोऽङ्कः २२९

मैत्रेय ! गच्छ रत्नावलीमादाय वसन्तसेनायाः सकाशम्; वक्तव्या च सा मद्वचनात्—“यत् खल्वस्माभिः सुवर्णभाण्डमात्मीयमिति कृत्वा विश्रम्भात् द्यूते हारितम्, तस्य कृते गृह्यतामियं रत्नावली” इति ।

विदूषकः—मा दाव अक्खाइदस्स अभुत्तस्स अप्पमुल्लस्स चोरेहिं अवहदस्स कारणादो चदुस्समुद्दसारभूदा रअणावली दीअदि । ( मा तावत् अखादितस्य अभुक्तस्य अल्पमूल्यस्य चौरैरपहृतस्य कारणात् चतुःसमुद्रसारभूता रत्नावली दीयते ।)

चारुदत्तः—वयस्य ! मा मैवम् ।

यं समालम्ब्य विश्वासं न्यासोऽस्मासु तया कृतः ।
तस्यैतन्महतो मूल्यं प्रत्ययस्यैव दीयते ॥ २६ ॥


**विमर्श—**हर स्थिति में निर्वाह कर लेनेवाली पत्नी, हर दशा में साथ निभाने वाला मित्र और सत्यवचन की रक्षा — ये तीनों चारुदत्त अपने पास समझ रहा है । अतः वह दरिद्र नहीं है । दरिद्र नहीं है — इसके लिये तीन कारणों का उल्लेख करने से समुच्चय अलंकार है । पथ्यावक्त्र छन्द है ॥ २८ ॥

अर्थ—मैत्रेय ! रत्नावली लेकर वसन्तसेना के पास जाओ । और मेरी ओर से कहना — “सुवर्णभाण्ड को अपना समझ कर विश्वास से जुये में हार गया, उसके बदले में यह रत्नावली ले लो ।”

विदूषक— ( जो बेंचकर ) न खाया गया, न भोगा गया, अल्प मूल्यवाला, चोरों द्वारा चुराया गया जो सुवर्णभाण्ड था उसके बदले में चारों समुद्रों की सारभूत रत्नावली दी जा रही है ।

टीका—सकाशम् = समीपम्, विश्रम्भात् = विश्वासात्, हारितम्=पराजितम्, अखादितम्=विक्रीय धनं प्राप्य न भक्षितम्, अभुक्तस्य = धारणादिना अनुपयुक्तस्य, चतुःसमुद्रसारभूता=चतुर्णां सागराणाम्, तत्त्वभूता अतिमूल्यवतीति भावः ।

**अन्वयः—**तया, यम्, विश्वासम्, समालम्ब्य, अस्मासु, न्यासः, कृतः, तस्य, महतः, प्रत्ययस्य, एव एतत्, मूल्यम्, प्रदीयते ॥ २९ ॥

शब्दार्थ—तया=उस वसन्तसेना ने, यम् = जिस, विश्वासम्=विश्वास को, समालम्ब्य = मानकर, अस्मासु = हम लोगों के पास, न्यासः=धरोहर, कृतः=रखी, तस्य=उस, महतः = महान्, प्रत्ययस्य = विश्वास का, एव = ही, मूल्यम्=कीमत, प्रदीयते=दी जा रही है ॥ २६ ॥

**अर्थ—चारुदत्त—**मित्र ! ऐसा मत कहो—

उस वसन्तसेना ने जिस विश्वास को मानकर हम लोगों के पास धरोहर रखी थी, उस महान् विश्वास का ही यह मूल्य चुकाया जा रहा है ॥ २९ ॥

३३० | मृच्छकटिकम्

तद्वयस्य ! अस्मच्छरीरपृष्टिकया शापितोऽसि, नैनामग्राहयित्वा अत्रा- गन्तव्यम् । वर्द्धमानक !

एताभिरिष्टकाभिः सन्धिः क्रियतां सुसंहतः शीघ्रम् । परिवाद-बहुलदोषान्न यस्य रक्षां परिहरामि ? ॥ ३० ॥


**टीका--**स्वल्पमूल्यकसुवर्णभाण्डस्य कृते महामूल्यवती-रत्नावलीदानं नोचित- मिति विदूषकोक्तिं खण्डयन्नाह-यमिति । तया = वसन्तसेनया, यम् = अनुभूतम्, विश्वासम् = प्रत्ययम्, समालम्ब्य = आश्रित्य, अस्मासु = मादृशदरिद्रजनेषु इत्यर्थः, न्यासः = निक्षेपः, कृतः = स्थापितः, तस्य = तादृशस्य, महतः = उदारस्य, प्रत्ययस्य = विश्वासस्य, एव, मूल्यम् = मूल्यस्वरूपम्, प्रतिदानमिति यावत्, दीयते = प्रत्यर्प्यते । एवञ्च नेयं सुवर्णभाण्डस्य मूल्यम्, प्रत्युत विश्वासमूल्यं मत्वा मया प्रदीयते इति भावः । अतिशयोक्तिरलंकारः पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २९ ॥

**विमर्शः--**अस्मासु-हम लोगों जैसे निर्धन व्यक्ति धरोहर के रखने योग्य नहीं होते हैं फिर भी वसन्तसेना ने हम लोगों पर विश्वास करके धरोहर रखी । अब विश्वासघात करना ठीक नहीं है । यहाँ पथ्यावक्त्र छन्द है ॥ २९ ॥

**अर्थ--**अतः हे मित्र ! मेरे शरीर का स्पर्श करके तुम्हें शपथ है कि इस रत्नावली को दिये बिना यहाँ वापस मत आना ।

**अन्वयः--**एताभिः, इष्टकाभिः, सन्धिः, शीघ्रम्, सुसंहतः, क्रियताम्, परिवाद- बहुलदोषात्, यस्य, रक्षाम्, न, परिहरामि ॥ ३० ॥

**शब्दार्थ--**एताभिः = इन (निकाली गई), इष्टकाभिः = ईंटों से, सन्धिः = सेन्ध को, शीघ्रम् = जल्दी ही, सुसंहतः = भरी हुई, क्रियताम् = कर डालो, परिवाद- बहुलदोषात् = लोकापवाद में बहुत दोष होने के कारण, यस्य = जिस, सेन्ध की, रक्षाम् = मरम्मत को, न = नहीं, परिहरामि = उपेक्षा कर सकता हूँ ॥ ३० ॥

**अर्थ--**वर्द्धमानक !

इन ईंटों से इस सेंध को शीघ्र ही भर डालो । लोगों में फैले हुये अपयश में बहुत दोष होने के कारण जिस सेन्ध की मरम्मत की उपेक्षा नहीं कर सकता हूँ ॥ ३० ॥

**टीका--**लोकापवादभीतः शीघ्रं सन्धिपूरणाय प्रयासमाह -- एताभिरिति । एताभिः = बहिर्निःसारिताभिः, इष्टकाभिः = पक्वमृत्खण्डैः सन्धिः = छिद्रम्, शीघ्रम् = सत्वरम्, संहतः = परिपूर्णः, क्रियताम् = विधीयताम् । परिवादबहुलदोषात् = लोकापवादे दोषाधिक्यात्, यस्य = सन्धेः, रक्षाम् = रक्षणम्, पुनः यथास्थानस्थापनम्, न = नैव, परिहरामि = उपेक्षे, काव्यलिङ्गमलङ्कारः, आर्या वृत्तम् ॥ ३० ॥

**विमर्श--**परिवादबहुलदोषात् -- देखने पर लोगों में यह प्रवाद फैल सकता

तृतीयोऽङ्कः

२३१

वयस्य मैत्रेय ! भवताप्यकृपणशौण्डैर्यमभिधातव्यम् ।
विदूषकः—भो ! दलिद्दो किं अकिवणं मन्तेदि ? ( भोः ! दरिद्रः किम् अकृपणं मन्त्रयति ? )
चारुदत्तः—अदरिद्रोऽस्मि सखे ! ( 'यस्य मम---विभवानुगता भार्या' इत्यादि पुनः पठति ।) तद्गच्छतु भवान् । अहमपि कृतशौचः सन्ध्या-मुपासे ।

इति निष्क्रान्ताः सर्वे ।

इति सन्धिच्छेदो नाम तृतीयोऽङ्कः ।


है कि चारुदत्त ने स्वयं ही चोरी करने के लिये सेंध लगा ली है । इसी प्रकार के अन्य दोष आरोपित किये जा सकते हैं । अतः सेंध को, जितनी जल्दी हो भर देना चाहिये । पूर्वार्द्ध के प्रति हेतुरूप से उत्तरार्द्ध का कथन होने से काव्यलिङ्ग अलंकार है और आर्या छन्द है ॥ ३० ॥

मित्र मैत्रेय ! आप को भी ( वसन्तसेना के साथ ) अत्यन्त उदारता से बात करनी है ।

विदूषक—अरे ! दरिद्र भी क्या उदारता से कह सकता है ?

चारुदत्त—मित्र मैं दरिद्र नहीं हूँ । ( जिस मेरी -धनानुसार निर्वाह करने वाली पत्नी है--इत्यादि को फिर पढ़ाता है ।) तो आप जायें । मैं भी शौच=स्नानादि से निवृत्त होकर ( प्रातःकालिक ) सन्ध्योपासना करता हूँ ।

इस प्रकार सभी निकल जाते हैं ।

॥ इस प्रकार सन्धिच्छेद ( सेंध फोड़ना ) नामक तीसरा अङ्क समाप्त हुआ है ॥

॥ जय-शङ्करलाल-त्रिपाठि-विरचित भावप्रकाशिका-व्याख्या में मृच्छकटिक का तृतीय अङ्क समाप्त हुआ ॥

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चतुर्थोऽङ्कः (मदनिका-शर्विलक)

चतुर्थोऽङ्कः

( ततः प्रविशति चेटी । )

चेटी—आणत्तह्मि अत्ताए अज्जआये सआसं गन्तु । एसा अज्जआ चित्तफलअ-णिसण्ण-दिट्ठी मंदणिआए सह किं पि मन्तअन्ती चिट्ठदि । ता जाव उपसप्पामि । ( इति परिक्रामति ) । ( आज्ञप्तास्मि मात्रा आर्यायाः सकाशं गन्तुम् । एषा आर्या चित्रफलकनिषण्णदृष्टिर्मदनिकया सह किमपि मन्त्रयन्ती तिष्ठति । तद्यादुपसर्पामि । )

( ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टा वसन्तसेना मदनिका च । )

वसन्तसेना—हञ्जे मदणिए ! अवि सुसदिसी इअं चित्ताकिदी अज्ज-चारुदत्तस्स ? ( हञ्जे मदनिके ! अपि सुसदृशी इयं चित्राकृतिः आर्यचारुदत्तस्य ?)

मदनिका—सुसदिसी । ( सुसदृशी । )

वसन्तसेना—कधं तुमं जाणासि ? । ( कथं त्वं जानासि ? )

मदनिका—जेण अज्जआए सुसिणिद्धा दिट्ठी अणुलग्गा । ( येन आर्यायाः सुस्निग्धा दृष्टिरनुलग्ना । )

वसन्तसेना—हञ्जे ! किं वेस-वास-दाक्खिण्णेण मदणिए ! एव्वं भणासि ? । ( हञ्जे ! किं वेशवासदाक्षिण्येन मदनिके ! एवं भणसि ? ) ।


( इसके बाद चेटी प्रवेश करती है । )

अर्थचेटी—[ वसन्तसेना की ] माता ने वसन्तसेना के पास जाने की आज्ञा दी है । वह वसन्तसेना चित्रफलक ( तस्वीर ) पर आँख गड़ाये हुये मदनिका के साथ ( कुछ ) बातचीत करती हुई बैठी है । तो अब उनके पास चलती हूँ । ( इस प्रकार कहकर रंगमंच पर घूमती है । )

( इसके बाद उपर्युक्त रीति से बैठी हुई वसन्तसेना और मदनिका प्रवेश करती है । )

वसन्तसेना—चेटि मदनिके ! क्या आर्य चारुदत्त की यह चित्राकृति ( चित्र में बनी हुई आकृति ) मेरी सुन्दर आकृति के योग्य है ?

मदनिका—( हाँ ), यह ( आपके ) अनुरूप ही है ।

वसन्तसेना—तुम कैसे जान रही हो ?

मदनिका—क्योंकि आर्या ( आप ) की स्नेहमयी दृष्टि इस पर लगी हुई है ।

वसन्तसेना—चेटी मदनिके ! क्या वेश्या के घर पर रहने से ( सीखी गई ) चतुरता के कारण ऐसा कह रही हो ?

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चतुर्थोऽङ्कः

मदनिका—अज्जए ! किं जो ज्जेव जणो वेसे पडिवसदि, सो ज्जेव अलीअदक्खिणो भोदि ? । (आर्ये ! किं य एव जनो वेशे प्रतिवसति, स एव अलीकदक्षिणो भवति ? )

वसन्तसेना—हज्जे ! णाणा-पुरिससङ्गेण वेस्साजणो अलीअदक्खिणो भोदि। (हञ्जे ! नानापुरुषसङ्गेन वेश्याजनः अलीकदक्षिणो भवति ।)

मदनिका—जदो दाव अज्जआए दिट्ठी इध अभिरमदि हिअअं च; तस्स कारणं किं पुच्छीअदि ? । (यतस्तावद् आर्याया दृष्टिरिह अभिरमते हृदयञ्च, तस्य कारणं किं पृच्छयते ? )

वसन्तसेना—हज्जे ! सहीजणादो उवहसणीअदां रक्खामि। (हञ्जे ! सखीजनादुपहसनीयतां रक्षामि । )

मदनिका—अज्जए ! एव्वं णेदं । सहीजणचित्ताणुवत्ती अवलाजणो भोदि। (आर्ये ! एवं नेदम् । सखीजनचित्तानुवर्त्ती अबलाजनो भवति ।)


**मदनिका—**आर्ये ! क्या जो कोई भी व्यक्ति वेश्यागृह में रहता हैं, वह असत्य बोलने में कुशल हो जाता है ?

**वसन्तसेना—**चेटी ! विभिन्न प्रकार के लोगों का साथ होने के कारण वेश्यायें असत्यभाषण में चतुर हो जाती हैं।

**टीका—**चेटी=वसन्तसेनागृहे स्थिता काचन दासी । मात्रा=वसन्तसेनायाः पालनकर्त्र्या जनन्या माधवसेनया, सकाशम् = समीपम्, चित्रफलके = चित्रपटे, निषण्णा=अनुलग्ना, दृष्टिः नेत्रद्वयं यस्याः सा, चारुदत्तचित्रावलोकनसंलग्ननेत्रा, मदनिकया=तन्नाम्न्या दास्र्या, मन्त्रयन्ती = गुप्तमालपन्ती, उपसर्पामि = समीपं गच्छामि, यथानिर्दिष्टा=चित्रफलकनिषण्णदृष्टिरिति भावः सुसदृशी=मत्सौन्दर्यानु-रूपसौन्दर्यवतीत्यर्थः, चित्राकृतिः = चित्ररूपेण विद्यमाना आकृतिः = आकारः, सुसदृशी=तवाकृतिसम्वादिनी, सुस्निग्धा=अत्यनुरापूर्णा, अनुलग्ना=संसक्ता, वेशे=वेश्यालये, वासेन=निवासेन, दाक्षिण्येन=पाटवेन, अलीके=असत्यभाषणे, दक्षिणः=कुशलः, नानापुरुषाणाम्=विविधजनानाम्, सङ्गेन=सङ्गत्या ।

**अर्थ—मदनिका—**जब आर्या की आखें और हृदय इस [ चित्रफलक ] में अनुरक्त हो रहे हैं [ अर्थात् आखों और मन दोनों से आपको यह चित्र अच्छा लग रहा है । ] तो इस ( अत्यनुराग ) का कारण क्यों पूछ रहीं हैं ?

**वसन्तसेना—**सखि ! सखी लोगों की हँसी की रक्षा करना चाहती हूँ । (उनकी हँसी=मजाक का पात्र बनने से बचना चाहती हूँ । )

**मदनिका—**आर्ये ! ऐसी बात नहीं है । स्त्रियाँ अपनी सखियों की भावना के अनुकूल व्यवहार करने वाली होती हैं ।