मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः २१७
कथमस्मिन्नपि कर्मणि कुशलता।
विदूषकः---भो वअस्स ! अअं सन्धो दुवेहिं ज्जेव दिण्णो भवे। आहु, आगन्तुएण सिक्खिदुकामेण वा। अण्णधा इध उज्जइणीए को अम्हाणं घरविहवं ण जाणादि ? । ( भो वयस्य ! अयं सन्धिर्द्वाभ्यामेव दत्तो भवेत्। अथवा आगन्तुकेन शिक्षितुकामेन वा। अन्यथा इह उज्जायिन्यां कः अस्माकं गृहविभवं न जानाति ? )
अर्थ---जिसमें ऊपरी ओर ईंटें हटाईं गयीं हैं, जो ऊपरी तरफ छोटी और बीच में चौड़ी ( अर्थात् घट के मुख और मध्यभाग के समान ) यह सेन्ध, चोर आदि अनुचित व्यक्ति के प्रवेश करने के कारण डरे हुये विशाल भवन के फटे हुये हृदय=कलेजे के समान दिखाई पड़ रही है ॥ २२ ॥
टीका---स्वोक्तं सन्धेर्दर्शनीयत्वं वर्णयन्नाह—उपरितलेति । उपरितलात्=ऊर्ध्वभागात्, निपातिता=आकृष्य अपसारिता इष्टका यस्मात् सः, कुत्रचित् उरसि=ऊर्ध्वभागात्, तलात् अधोभागात् इत्यपि व्याख्या दृश्यते, ‘उपरितन’ इति तु अपपाठः, शिरसि=उपरिभागे, मुखदेशे इति भावः, तनुः=अल्पप्रसरः, मध्ये=मध्यप्रदेशे च, विपुलः=विशालः, अयः=समक्षं दृश्यमानः सन्धिः, असदृशजनस्य—अयोग्यपुरुषस्य, संप्रयोगात्=प्रवेशात्, भीरोः=भययुक्तस्य, महागृहस्य=विशालभवनस्य, स्फुटितम्=विदीर्णम्, हृदयम्=वक्षस्थलम्, इव, दृश्यते । अत्र प्रकृते अचेतने हर्म्ये विहितस्य सन्धेः विदीर्णवक्षस्थल त्वसम्भावनयोत्प्रेक्षालंकारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ २२ ॥
विमर्शः---उपरितलनिपातितेष्टकः—इसमें उपरि = ऊर्ध्व, तल = अधः यहाँ ऊपर तथा नीचे दोनों से ईंटों का निकालना बताया है । कुछ लोग ‘उपरितन’ यह पाठ मानते हैं परन्तु “सायं चिरं प्राह्णे प्रगेऽव्ययेभ्यः” ( पा. सू. ४।३।२३ ) में कालवाची उपरि शब्द से ही प्रत्यय एवं तुडागम का विधान है । अतः स्थानवाची होने पर यह अशुद्ध होगा । घट का मुख छोटा और मध्य भाग बड़ा तथा नीचे पुनः छोटा होता है उसी प्रकार यह सेन्ध है । सेंध का फँटना उसी प्रकार है जैसा किसी महान् व्यक्ति का हृदय विदीर्ण होना । यहाँ अचेतन भवन में फोड़ी गई सेन्ध में विदीर्णवक्षस्थलत्व की सम्भावना की जाने से उत्प्रेक्षा अलंकार है । पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ २२ ॥
अर्थ---क्या इस सेन्ध लगाने के काम में भी कुशलता ( आवश्यक होती है, या सीखी जाती है ) ?
विदूषक---हे मित्र ! यह सेन्ध दो ही के द्वारा फोड़ी जा सकती है या तो बाहर से आने वाले किसी के द्वारा अथवा सीखने वाले के द्वारा । अन्यथा इस उज्जैन नगरी में हम लोगों के घर के वैभव को कौन नहीं जानता है ।