मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २१८ | मृच्छकटिकम् |
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चारुदत्त :--
वैदेश्येन कृतो भवेन्मम गृहे व्यापारमभ्यस्यता
नासौ विदितवान् धनैर्विरहितं विस्रब्धसुप्तं जनम् ।
दृष्ट्वा प्राङ्महतीं निवाससंरचनामस्माकमाशन्वितः,
सन्धिच्छेदनखिन्न एव सुचिरं पश्चान्निराशो गतः ॥ २३ ॥
टीका :-- अस्मिन्नपि = सन्धिभेदनकार्येऽपि, कुशलता=पटुता, योग्यता, दत्त:=विदारितः, शिक्षितुकामेन=शिक्षाम्यासपरेण, तुमन्तस्य कामशब्देन समासे मकारलोपः, गृहविभवम्=गृहैश्वर्यम्, न जानाति-काकुरत्र, सर्वेऽपि जानन्तीत्यर्थः ॥
अन्वयः-- वैदेश्येन, ( अथवा ) व्यापारम्, अभ्यस्यता, मम, गृहे, ( सन्धिः ) कृतः, भवेत्, असौ, धनैः, विरहितम्, विश्रब्धसुप्तम्, जनम्, न, विदितवान्, प्राक्, महतीम्, निवाससंरचनाम्, दृष्ट्वा, आशान्वितः, सुचिरम्, सन्धिच्छेदनखिन्नः, पश्चात्, निराशः, एव, गतः ॥ २३ ॥
शब्दार्थः-- वैदेश्येन = विदेश में होनेवाले, बाहरी, अथवा व्यापारम् = सेंध लगाने की क्रिया का, अभ्यस्यता = अभ्यास करनेवाले ( किसी ने ), मम = मेरे ( चारुदत्त के ) गृहे=घर में, ( सन्धिः=सेन्ध ), कृतः=फोड़ी, भवेत्=होगी, असौ=वह, धनैः=धन से, विरहितम्=हीन, विश्रब्धसुप्तम्=निश्चिन्तता के साथ सोनेवाले, जनम्=हम लोगों को, न = नहीं, विदितवान्=जान पाया, प्राक् = पहले, महतीम्=विशाल, निवाससंरचनाम्=भवन की बनावट को, दृष्ट्वा=देखकर, आशान्वितः=आशा लगाये हुये, सुचिरम् = बहुत देर तक, सन्धिच्छेदनखिन्नः = सेंध फोड़ने से थका हुआ, पश्चात् = बाद में, निराशः = निराश होकर, एव = ही, गतः = चला गया होगा ॥ २३ ॥
अर्थ-- किसी बाहरी ने अथवा सेंध लगाने का अभ्यास करने वाले ने ही मेरे घर पर सेंध लगाई होगी। वह धन से हीन अतः निश्चिन्त होकर सोनेवाले हम लोगों को नहीं जानता रहा होगा। पहले विशाल भवन की आकृति को देख कर ( यहाँ प्रचुर धनादि मिलेगा - इस ) आशा लगाये हुये काफी देर तक सेंध फोड़ने के कार्य से थका हुआ, बाद में ( कुछ भी न प्राप्त कर सकने से ) निराश ही लौट गया होगा ॥ २३ ॥
टीका-- विदूषकस्योक्तिं समर्थयमान एवाह-वैदेश्येनेति । वैदेश्येन=विदेशे भवेन, अतो गृहवैभवमजानता इति भावः, 'अथवा' इत्यध्याहार्यम्, विदूषकोक्ति-समर्थनार्थमुक्तत्वादिति बोध्यम्, व्यापारम् = सन्धिच्छेदनरूपं कार्यम्, अभ्यस्यता=शिक्षमाणेन, जनेन, मम=चारुदत्तस्य, गृहे=भवने, सन्धिः, कृतः=विहितः, भवेत्-स्यात्; अत्र हेतुमाह -असौ = चौरः, धनैः = द्रव्यैः, विरहितम्=हीनम्, अत एव,