मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः २२७
विदूषकः—(उपसृत्य) एसोम्हि । गेण्ह एदं । ( एषोऽस्मि, गृहाण एताम् )
( रत्नावलीं दर्शयति । )
चारुदत्तः—किमेतत् ?
विदूषकः—भो ! जं दे सदिस--दार-सङ्ग्रहस्य फलं । ( भोः ! यत् ते सदृशदारसंग्रहस्य फलम् । )
चारुदत्तः—कथं ब्राह्मणी मामनुकम्पते ? कष्टम् ! इदानीमस्मि दरिद्रः !
आत्मभाग्यक्षतद्रव्यः स्त्रीद्रव्येणानुकम्पितः ।
अर्थतः पुरुषो नारी, या नारी सार्थतः पुमान् ॥ २७ ॥
विदूषक—( समीप आकर ) मैं यह आ गया, इसे ले लीजिये । ( रत्नावली दिखाता है । )
चारुदत्त — यह क्या है ?
विदूषक—अरे, अपने योग्य पत्नी से विवाह करने का सुपरिणाम है ।
चारुदत्त—क्या ब्राह्मणी मुझ पर अनुकम्पा कर रही है । अब मैं ( वास्तव में ) दरिद्र हो गया !
टीका—महानुभावता=महाशयत्वम्, अस्याः=चारुदत्तस्य पत्न्याः, वैक्लव्यात्=शोकातिरेकात, अकार्यम् = आत्महत्यादिरूपमनुचितं कार्यम्, चिरयति = विलम्बं करोति, सदृशदारसङ्ग्रहस्य=स्वानुरूपपत्नीग्रहणस्य, सुपत्नीलक्षणम्—
सेवादासी, रतौ वेश्या, भोजने जाननी-समा ।
विपत्काले परं मित्रं सा भार्या भुवि दुर्लभा ॥
अन्वयः—आत्मभाग्यक्षतद्रव्यः, स्त्रीद्रव्येण, अनुकम्पितः पुरुषः, अर्थतः, नारी, ( भवति ), या नारी, सा, अर्थतः पुमान्, भवति ॥ २७ ॥
शब्दार्थ—आत्मभाग्यक्षतद्रव्यः = अपने दुर्भाग्य से विनष्ट धनवाला, स्त्री-द्रव्येण=स्त्री के धन से, अनुकम्पितः=अनुगृहीत होने वाला, पुरुषः=पुरुष, अर्थतः=धन से ( अर्थात् धन के कारण ) नारी=स्त्री, ( भवति=हो जाता है और ) या नारी = जो स्त्री, होती है, सा = वह, अर्थतः=धन के कारण, पुमान् = पूरुष हो जाती है ॥ २७ ॥
अर्थ—अपने दुर्भाग्य के कारण विनष्ट धनवाला तथा स्त्री के धन से अनुगृहीत होने वाला पुरुष धन ( न होने ) के कारण स्त्री ( अर्थात् स्त्री के समान ) हो जाता है, जो स्त्री होती है वह धन ( होने ) के कारण पुरुष ( अर्थात् पुरुषतुल्य, प्रधान ) बन जाती है ॥ २७ ॥
टीका—धूताया दत्तां विदूषकहस्तस्थां रत्नावलीं विलोक्य सनिर्वेदमाह—