भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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तृतीयोऽङ्कः २२९

मैत्रेय ! गच्छ रत्नावलीमादाय वसन्तसेनायाः सकाशम्; वक्तव्या च सा मद्वचनात्—“यत् खल्वस्माभिः सुवर्णभाण्डमात्मीयमिति कृत्वा विश्रम्भात् द्यूते हारितम्, तस्य कृते गृह्यतामियं रत्नावली” इति ।

विदूषकः—मा दाव अक्खाइदस्स अभुत्तस्स अप्पमुल्लस्स चोरेहिं अवहदस्स कारणादो चदुस्समुद्दसारभूदा रअणावली दीअदि । ( मा तावत् अखादितस्य अभुक्तस्य अल्पमूल्यस्य चौरैरपहृतस्य कारणात् चतुःसमुद्रसारभूता रत्नावली दीयते ।)

चारुदत्तः—वयस्य ! मा मैवम् ।

यं समालम्ब्य विश्वासं न्यासोऽस्मासु तया कृतः ।
तस्यैतन्महतो मूल्यं प्रत्ययस्यैव दीयते ॥ २६ ॥


**विमर्श—**हर स्थिति में निर्वाह कर लेनेवाली पत्नी, हर दशा में साथ निभाने वाला मित्र और सत्यवचन की रक्षा — ये तीनों चारुदत्त अपने पास समझ रहा है । अतः वह दरिद्र नहीं है । दरिद्र नहीं है — इसके लिये तीन कारणों का उल्लेख करने से समुच्चय अलंकार है । पथ्यावक्त्र छन्द है ॥ २८ ॥

अर्थ—मैत्रेय ! रत्नावली लेकर वसन्तसेना के पास जाओ । और मेरी ओर से कहना — “सुवर्णभाण्ड को अपना समझ कर विश्वास से जुये में हार गया, उसके बदले में यह रत्नावली ले लो ।”

विदूषक— ( जो बेंचकर ) न खाया गया, न भोगा गया, अल्प मूल्यवाला, चोरों द्वारा चुराया गया जो सुवर्णभाण्ड था उसके बदले में चारों समुद्रों की सारभूत रत्नावली दी जा रही है ।

टीका—सकाशम् = समीपम्, विश्रम्भात् = विश्वासात्, हारितम्=पराजितम्, अखादितम्=विक्रीय धनं प्राप्य न भक्षितम्, अभुक्तस्य = धारणादिना अनुपयुक्तस्य, चतुःसमुद्रसारभूता=चतुर्णां सागराणाम्, तत्त्वभूता अतिमूल्यवतीति भावः ।

**अन्वयः—**तया, यम्, विश्वासम्, समालम्ब्य, अस्मासु, न्यासः, कृतः, तस्य, महतः, प्रत्ययस्य, एव एतत्, मूल्यम्, प्रदीयते ॥ २९ ॥

शब्दार्थ—तया=उस वसन्तसेना ने, यम् = जिस, विश्वासम्=विश्वास को, समालम्ब्य = मानकर, अस्मासु = हम लोगों के पास, न्यासः=धरोहर, कृतः=रखी, तस्य=उस, महतः = महान्, प्रत्ययस्य = विश्वास का, एव = ही, मूल्यम्=कीमत, प्रदीयते=दी जा रही है ॥ २६ ॥

**अर्थ—चारुदत्त—**मित्र ! ऐसा मत कहो—

उस वसन्तसेना ने जिस विश्वास को मानकर हम लोगों के पास धरोहर रखी थी, उस महान् विश्वास का ही यह मूल्य चुकाया जा रहा है ॥ २९ ॥