मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ | मृच्छकटिकम्
भोः ! कष्टम् ।
यदि तावत् कृतान्तेन प्रणयोऽर्थेषु मे कृतः । किमिदानीं नृशंसेन चारित्रमपि दूषितम् ॥ २५ ॥
विमर्श--भूतः = सत्यः, वस्तुतो जातः, अर्थः = चौरापहरणरूपः, तम् । श्रद्धास्यति = सत्यत्वेन स्वीकरिष्यति, तुलयिष्यति--इसके स्थान पर तूलयिष्यति-यह भी पाठ है-तूलमिव लघूकरिष्यति-यह अर्थ है। तुलयिष्यति-सन्देह दूर करने के लिये तुला पर बैठाकर परीक्षा लेना शास्त्रसम्मत है, वही करेंगे। निष्प्रतापा-निर्गतः प्रतापः तेजः यस्यां सा-जिसमें से तेज समाप्त हो चुका है। यहाँ उत्तरार्द्ध के सामान्य कथन से पूर्वार्द्ध के विशेष कथन का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यास अलंकार है। और पथ्यावक्र छन्द है ॥ २४ ॥
अन्वयः-कृतान्तेन, यदि, तावत्, मम, अर्थेषु, प्रणयः, कृतः, नृशंसेन, इदानीम्, मम, चारित्रम्, अपि, किम्, दूषितम् ॥ २५ ॥
शब्दार्थ--कृतान्तेन = दुर्भाग्य ने, यदि तावत् = यदि अब तक, मे = मेरे, चारुदत्त के, अर्थेषु = धन पर, प्रणयः = अनुराग, कृतः = किया अर्थात् सारा धन ले लिया, तर्हि = तो, नृशंसेन = क्रूर उस भाग्य ने, इदानीम् = इस समय, चारित्रम् = चरित्र को, अपि = भी दूषितम् = दूषित कर डाला ॥ २५ ॥
अर्थ--हाय कष्ट है।
यदि दुर्भाग्य ने मेरा धन ले लिया (तो कोई बात नहीं) किन्तु इस समय चरित्र भी दूषित कर डाला ॥ २५ ॥
टीका--धनहानिर्मां न तथा पीडयति यथा लोकैः सम्भाव्यमानः मम चरित्रे दोष-इत्याह-यदीति। कृतान्तेन = दैवेन, यदि तावत् = यदि, तावत्-वाक्यालंकारे, मे = मम, चारुदत्तस्येत्यर्थः, अर्थेषु = धनेषु, प्रणयः = प्रीतिः, कृतः = विहितः, ग्रहणाय धनेषु अनुरागः प्रदर्शितः, नृशंसेन = क्रूरेण, इदानीम् = अधुना, मम = चारुदत्तस्य, चारित्रम् = सच्चरित्रता अपि, दूषितम् = निन्दनीयं कृतम्, चारुदत्तेन वसन्तसेनायाः न्यासः स्वयमपहृत्य चौर्यरूपेण प्रख्यापित इति निन्दापि समारोपितेति भावः, पथ्यावक्रं वृत्तम् ॥ २५ ॥
विमर्श--'कृतान्तो यमदैवयोः'--कोषानुसार यहाँ दैव = भाग्य अर्थ है। तावत् = उतना, अर्थात् धन से अनुराग करके हरण कर लेना तक तो ठीक था। परन्तु अब चरित्र का विघात सह्य नहीं है। सभी यह कहेंगे कि वसन्तसेना का धन स्वयं हड़प कर चोरी का बहाना कर रहा है। यहाँ पथ्यावक्र छन्द है ॥ २५ ॥