भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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तृतीयोऽङ्कः २२३

विदूषकः—अहं खु अवलविस्सं, केण दिण्णं ? केण गहिदं ? को वा सक्खि ? त्ति । ( अहं खलु अपलपिष्यामि, केन दत्तम् ? केन गृहीतम् ? को वा साक्षी ? इति । )

चारुदत्तः—अहमिदानीमनृतमभिधास्ये ?

भैक्ष्येणाप्यर्जयिष्यामि पुनर्न्यासप्रतिक्रियाम् ।
अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंशकारणम् ॥ २६ ॥

रदनिका—ता जाव अज्जाधूदाए गदुअ णिवेदेमि । ( तद्यावत् आर्या-धूतायै गत्वा निवेदयामि । )

( इति निष्क्रान्ता । )


**अर्थ—विदूषक—**मैं झूठ बोल दूंगा—किसने दिया ? किसने लिया ? कौन गवाह है ?

**चारुदत्त—**क्या अब मैं झूठ ( भी ) बोलूँगा ?

**अन्वयः—**भैक्ष्येण, अपि, न्यासप्रतिक्रियाम्, पुनः, अर्जयिष्यामि, चारित्रभ्रंशकारकम्, अनृतम्, न, अभिधास्यामि ॥ २६ ॥

**शब्दार्थ—**भैक्ष्येण=भीख से, अपि=भी, न्यासप्रतिक्रियाम्=धरोहर के बदले का धन, पुनः=फिर, अर्जयिष्यामि=पैदा करूँगा, किन्तु, चारित्रभ्रंशकारकम्=चरित्र को विकृत करने वाले, अनृतम् = असत्य को, न = नहीं, अभिधास्यामि=बोलूँगा ॥ २६ ॥

अर्थ—( मैं ) भीख से ( अर्थात् भीख माँग कर ) भी धरोहर के बदले का धन पुनः पैदा करूँगा परन्तु चरित्र को विकृत कर देने वाले असत्य को नहीं बोलूँगा ॥ २६ ॥

**टीका—**ममानृतभाषणमसम्भवमित्यत आह—भैक्ष्येणेति । भैक्ष्येण=भिक्षया, अपि, अपिना अन्येन केनापि समुचितेनोपायेन न्यासप्रतिक्रियाम्=मत्सविधे रक्षितधनस्य शोधनोपायम्, पुनः, अर्जयिष्यामि=आहरिष्यामि, किन्तु, चारित्रभ्रंशकारणम्=सदाचरणच्युतिकारकम्, अनृतम्=असत्यम्, न=नैव, अभिधास्यामि=वदिष्यामि । एवञ्चानृतभाषणापेक्षया भिक्षाटनं वरमिति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २६ ॥

**विमर्श—**भैक्ष्येण—यहाँ चारुदत्त की सच्चारित्रता का अच्छा वर्णन है । वह अपने सदाचार के विषय में लोकप्रवाद और असत्यभाषण से कितना अधिक भयभीत है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है । पथ्यांवक्र छन्द है ॥ २६ ॥

**अर्थ—रदनिका—**तो तब तक आर्याधूता से सारी घटना कहती हूँ ।

( यह कह कर निकल जाती है । )