भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२२४ मृच्छकटिकम्

( ततः प्रविशति चेटचा सह चारुदत्तवधूः । )

वधूः-- ( ससम्भ्रमम् ) अइ ! सच्चं अवरिक्खदसरोरो अज्जउत्तो अज्जमित्तेएण सह ? ( अयि ! सत्यम् अपरिक्षतशरीर आर्यपुत्र आर्यमैत्रेयेण सह ? )

चेटी - भट्टिणि ! सच्चं ! किं तु जो सो वेस्साजणकेरको अलंकारको, सो अवह्रदो । ( भट्टिनि ! सत्यम् ! किन्तु यः स वेश्याजनस्य अलंकारकः सोऽपहृतः । )

( वधूः मोहं नाटयति । )

चेटी-- समस्ससदु अज्जा धूदा । ( समाश्वसितु आर्याधूता ! )

वधूः-- ( समाश्वस्य ) हञ्जे ! किं भणासि ? 'अवरिक्खदसरोरो अज्जउत्तो' त्ति । वरं दाणि सो सरीरेण परिक्खदो, ण उण चारित्तेण । संपदं उज्जइणीए जणो एवं मन्तइस्सिदि-‘दलिद्ददाए अज्जउत्तेण ज्जेव ईदिसं अकज्जं अणुचिट्ठिदं'त्ति । ( ऊर्ध्वमवलोक्य निःश्वस्य च ) भअवं कअन्त ! पोक्खर-पत्त-पडिद-जलविन्दु-चञ्चलेहिं कीलसि दलिद्दपुरिसभ आधे-एहिं । इअं चं मे एक्का मादुघरलब्धा रअणावली चिट्ठदि, एदंपि अदिसोण्डीरदाए अज्जउत्तो ण गेण्हिस्सदि । हञ्जे ! अज्जमित्तेअं दाव सद्दावेहि । ( हञ्जे ! किं भणसि-‘अपरिक्षतशरीरः आर्यपुत्रः' इति । वरमिदानीं स शरीरेण परिक्षतः न पुनश्चारित्रेण । साम्प्रतमुज्जयिन्यां जन एवं मन्त्रयिष्यति-‘दरिद्रतया आर्यपुत्रेणैव ईदृशमकार्यमनुष्ठितमिति । भगवन् कृतान्त ! पुष्करपत्र-पतितजलबिन्दुचञ्चलैः क्रीडसि दरिद्रपुरुषभागधेयैः । इयञ्च मे एका मातृगृहलब्धा


( इसके बाद चेटी के साथ चारुदत्त की पत्नी प्रवेश करती है । )

अर्थ-वधू-- ( चारुदत्त की पत्नी ) - ( घबड़ाहट के साथ ) अरी ! आर्य मैत्रेय के साथ आर्य चारुदत्त शरीर से कुशल तो हैं ?

चेटी-- स्वामिनि ! सचमुच ( सकुशल हैं ) । परन्तु वेश्या वसन्तसेना का जो अलंकारसमूह था वह चुरा लिया गया, ( चोरी चला गया ) ।

( वधू मूच्छित होने का अभिनय करती है । )

चेटी-- आर्या धूता आप धैर्य धारण करें ।

वधू-- ( धैर्य धारण करके ) सखी क्या कह रही हो - 'आर्यपुत्र इस समय शरीर से कुशल है ।' शरीर से क्षत = घायल होना ठीक था न कि चरित्र से । ( अर्थात् शरीर में कोई घाव आदि हो जाता तो चिन्ता की बात नहीं थी परन्तु उनका चरित्र ही विकृत हो गया । ) इस समय उज्जैन नगरी में लोग ऐसा कहेंगे--“दरिद्र होने के कारण आर्यपुत्र ( चारुदत्त ) ने ही यह अनुचित कार्य ( स्वर्णाभूषण हड़प जाना ) किया है ।” भगवन् दैव ! द्ररिद्रपुरुष के, कमल-पत्र पर गिरी हुयी पानी के बूँद के समान चञ्चल, भाग्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हो । और मेरे मातृगृह ( नैहर ) से मिली हुई एक रत्नावली है ।

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